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गर्भावस्था के दौरान कब्ज की शिकायत होने पर किन संकेतों को भूलकर भी नहीं करना चाहिए नजरअंदाज? डॉक्टर से जाने इसके बारे में!

गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को शरीर से जुड़ी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़त है, जिसमें से एक है कब्ज की समस्या। गर्भावस्था में कब्ज की समस्या होना बहुत ही आम बात होती है। इस समस्या के कारण एक गर्भवती महिला को कई तरह की परेशानियों को उठाना पड़ता है। इस तरह की स्थिति में, महिलाओं के शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलावों की वजह से कब्ज की समस्या का निर्माण होता है। इसके साथ ही अगर कोई भी गर्भवती महिला अपनी डाइट में पर्याप्त मात्रा में फाइबर शामिल नहीं करती है, तो इसकी वजह से भी एक महिला की पाचन शक्ति पर काफी ज्यादा बुरा प्रभाव पड़ सकता है। इस तरह कि स्थिति में, महिला को अपनी सेहत का ख़ास ध्यान रखने की काफी ज्यादा जरूरत होती है। ऐसे में, महिलाओं को डॉक्टर की सलाह पर वह सभी उपायों को करना चाहिए, जो कब्ज की समस्या से जल्द छुटकारा दिला सकते हैं। हालांकि, कुछ मामलों में महिलाओं के साथ ऐसा होता है, कि कब्ज की समस्या कि स्थिति काफी ज्यादा बिगड़ जाती है, जिसकी वजह से कोई भी उपाय काम नहीं कर पाता है। वैसे भी इस बात को सभी जानते हैं, कि इन दिनों महिला के गर्भ का भार काफी ज्यादा बढ़ जाता है, जिसका दबाव पेट के निचले हिस्से पर पड़ता है और कई दिक्क्तों का कारण बनता है, जिसमें बाउल मूवमेंट में काफी ज्यादा रूकावट आना शामिल होता है। 

दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि इस समस्या के कई लक्षण होते हैं, जिन पर ध्यान देना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में, आपको इस समस्या के कई लक्षण नजर आ सकते हैं, जिसमें मल के दौरान खून आना, पेट में असहनीय दर्द होना, टॉयलेट करने के दौरान काफी दर्द महसूस होना, ब्लोटिंग महसूस होना और हफ्ते में केवल एक या फिर दो बार मल त्यागना जैसे लक्षण शामिल हो सकते हैं। अगर गर्भावस्था के दौरान मल त्याग करते वक्त खून आये, तो आपको समझ जाना चाहिए, कि यह कब्ज जैसी समस्या के गंभीर लक्षणों में से ही एक है। ऐसे में, आपको अपनी सेहत को लेकर अधिक सावधान हो जाना चाहिए। इस तरह की स्थिति में इसके लक्षणों के बारे में पता चलते ही आपको तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए और समय रहते समस्या का निदान करना चाहिए। ताकि आगे कोई बड़ी पेरशानी का सामना न करना पड़े। ध्यान न देने पर समस्या गंभीर हो सकती है, इसलिए नियमित चेकअप जरूरी होता है। आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

गर्भावस्था के दौरान कब्ज की समस्या होने पर नजर आने वाले गंभीर संकेत:

  • मल में खून आना

गर्भावस्था के दौरान, कब्ज की समस्या होना कोई बड़ी बात नहीं हैं। यह एक आम समस्या है, जो इस तरह की स्थिति में हर गर्भवती महिला को प्रभावित करती है। पर, ऐसे में जब मल के साथ काफी खून भी नजर आये, तो इसे आम समझ कर नजरअंदाज न करें। दरअसल, मल करते वक्त खून तभी आता है, जब पेट के अंदर मल काफी सख्त हो जाता है, जो सेहत के लिए ठीक नहीं होता है। ऐसे में महिला को तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। 

  • पेट दर्द होना

कब्ज के कारण मल त्याग न कर पाना एक खतरे का संकेत हो सकता है। ऐसे में, मल कई दिनों तक पेट में रहता है, जिससे गैस बनती है और गैस सही तरह से बाहर न निकलने पर, पेट में दर्द हो सकता है।

निष्कर्ष: गर्भावस्था के दौरान कब्ज की समस्या होना बहुत ही आम समस्या है, लगभग सभी महिलाएं इस समस्या की चपेट में आती हैं। गर्भावस्था के दौरान कब्ज की शिकायत होने पर, मल के दौरान खून आना, पेट में असहनीय दर्द होना, टॉयलेट करने के दौरान काफी दर्द महसूस होना, ब्लोटिंग महसूस होना और हफ्ते में केवल एक या फिर दो बार मल त्याग करना जैसे लक्षणों को भूलकर भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इन लक्षणों का भान होते ही आपको तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। ताकि इन दिनों किसी गंभीर समस्या को होने से रोका जा सके। इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए और गर्भावस्था के दौरान कब्ज जैसी समस्या का तुरंत समाधान पाने के लिए आप आज ही अमेरिटस हॉस्पिटल के विशेषज्ञों से संपर्क कर सकते हैं। 

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल 

प्रश्न 1. मल त्याग करते वक्त खून आना किस समस्या का संकेत होता है? 

दरअसल, अगर किसी व्यक्ति को मल त्याग करते वक्त खून आ रहा है, तो यह मुख्य रूप से बवासीर, गुदा विदर या फिर पुरानी कब्ज की समस्या का संकेत हो सकता है। 

प्रश्न 2. कब्ज की समस्या सबसे ज्यादा किस को प्रभावित करती है?

वैसे तो, कब्ज की समस्या विशेषकर गर्भवती महिलाओं को प्रभावित करती है, पर इसके अलावा कब्ज की समस्या 65 साल से भी ज्यादा उम्र के पुरुषों, महिलाओं, कम सक्रिय और पर्याप्त मात्रा में फाइबर न लेने वाले या फिर कम पानी का सेवन करने वाले लोगों को भी प्रभावित करती है। 

प्रश्न 3. कब्ज की समस्या में कौन से लक्षण दिखाई देते हैं?

आम तौर पर, कब्ज की समस्या के दौरान मल त्याग की फ्रीक्वेंसी में कमी होना, जी मिचलाना, भूख न लगना, सख्त मल होना, मल त्याग करने में कठिनाई होना, दर्द होना, मल त्याग अधूरा महसूस होना और पेट में कोई समस्या बनी रहना जैसे लक्षण नजर आ सकते हैं। 

प्रश्न 4. कब्ज से छुटकारा पाने के घरेलू उपाय क्या हो सकते हैं? 

दरअसल, कब्ज जैसी समस्या से छुटकारा पाने के लिए आप कई घरेलू उपायों को अपना सकते हैं, जिसमें फाइबर का सेवन बढ़ाना, खूब तरल पदार्थों का सेवन करना, नियमित व्यायाम करना, सुबह के समय मल त्याग करने के लिए निश्चित समय तय करना, टॉयलेट में ज्यादा देर तक बैठने से बचना और सुबह खाली पेट गुनगुने पानी में नींबू का रस और काला नमक मिलाकर पीना जैसे कुछ घरेलू उपायों का इस्तेमाल शामिल हो सकता है।

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लिवर की सेहत सुधारने के लिए डाइट और लाइफस्टाइल से जुड़े किन उपायों को अपनाना हो सकता है फायदेमंद? डॉक्टर से जानें इसके बारे में!

वैसे तो, शरीर के सभी अंग काफी महत्वपूर्ण होते हैं, पर कुछ महत्वपूर्ण अंगों का बेहद ख़ास ख्याल रखना सेहत के लिए महत्वपूर्ण होता है। जैसे कि लिवर। शरीर के दूसरे हिस्सों की तरह लिवर भी एक जरूरी हिस्सा होता है, जिसका ध्यान रखना और इस की सेहत को बनाए रखना सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिए जरूरी होता है। अगर आपका लिवर ठीक नहीं होता है, तो इसकी वजह से आपको सेहत से जुड़ी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए, शरीर के साथ-साथ लिवर पर भी ध्यान देना जरूरी होता है। लिवर की सेहत को सुधारने के लिए आप नींबू पानी का सेवन करना, खाने में हल्दी शामिल करना, रोज आंवले का सेवन करना, रोजाना त्रिफला के सप्लीमेंट का सेवन करना, रोजाना एलोवेरा जूस पीना, योग करना, रोजाना की डाइट में सेहतमंद फैट्स शामिल करना, डैंडेलियन रूट चाय पीना, रोजाना हरी सब्जियों का सेवन करना, एक्सरसाइज करना और रोजाना डीप ब्रीदिंग और मेडिटेशन का अभ्यास करना जैसे कुछ उपायों को अपना सकते हैं। आइये इस लेख के माध्यम से डॉक्टर से इसके बारे में जानकारी प्राप्त करते हैं। 

लिवर को सेहतमंद रखने के लिए अपनाये जाने वाले टिप्स!

आम तौर पर, लिवर को सेहतमंद रखने के लिए आप निम्नलिखित टिप्स को अपना सकते हैं, जैसे कि 

  1. रोजाना नींबू पानी का सेवन करना 

दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि रोजाना सुबह खाली पेट नींबू पानी का सेवन करने से न केवल लिवर की सेहत में बढ़ोतरी होती है, बल्कि इससे पाचन क्रिया भी तेज होती है और साथ में शरीर भी डिटॉक्स हो जाता है। आम तौर पर, रोजाना खाली पेट नींबू पानी का सेवन करने से बाइल जूस का प्रोडक्शन बढ़ता है और शरीर लंबे वक्त तक सेहतमंद बना रहता है। 

  1. खाने में हल्दी का सेवन शामिल करना 

हालांकि, सभी जानते हैं, कि हल्दी में एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-बैक्टीरियल जैसे कई तरह के गुण पाए जाते हैं, जो एक व्यक्ति की सेहत के लिए काफी ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं। इसके रोजाना सेवन से लिवर को डिटॉक्स करने में काफी ज्यादा सहायता प्राप्त होती है, जिससे शरीर में दर्द और सूजन भी काफी कम हो जाती है। इसलिए, आपको अपनी डाइट में हल्दी को जरूर शामिल करना चाहिए। 

  1. रोजाना आंवले का सेवन करना 

जो व्यक्ति रोजाना आंवले का सेवन करता है, दरअसल इससे उसकी लिवर की सेहत भी सेहतमंद बनी रहती है। इससे लिवर की सेहत को काफी ज्यादा फायदा प्राप्त हो सकता है। आंवले में विटामिन-सी और एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे कई गुण पाए जाते हैं, जो न केवल ऑक्सीडेटिव तनाव को कम करने में मदद करते हैं, बल्कि शरीर को डिटॉक्स करने में भी काफी ज्यादा सहायता प्रदान करते हैं। 

  1. त्रिफला के सप्लीमेंट्स का सेवन करना 

हालांकि, लिवर को ठीक करने के लिए और उसको साफ़ रखने के लिए त्रिफला पाउडर का सेवन करना काफी ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है। दरअसल, अगर आप रोजाना त्रिफला के सप्लीमेंट्स का सेवन करते हैं, तो इससे न केवल आपकी पाचन क्रिया ठीक रहती है, बल्कि इससे शरीर से टॉक्सिन बाहर निकालने में भी काफी ज्यादा सहायता प्राप्त होती है। 

  1. एलोवेरा जूस का सेवन करना 

एलोवेरा न केवल त्वचा के लिए फायदेमंद होता है, बल्कि यह लिवर की सेहत के लिए भी काफी ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है। हालांकि, लिवर की सेहत को बनाए रखने के लिए आप एलोवेरा जूस का सेवन कर सकते हैं, जिससे सेहत को कई लाभ प्राप्त हो सकते हैं। दरअसल, एलोवेरा में एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-बैक्टीरियल जैसे कई गुण मौजूद होते हैं, जो लिवर की सूजन को कम करने के साथ-साथ लिवर डिटॉक्सिफिकेशन में भी काफी ज्यादा सहायता कर सकते हैं 

  1. रोजाना योग करना 

दरअसल, रोजाना योग करने से लिवर की हेल्थ को बनाए रखने में मदद मिल सकती है। आम तौर पर, ऐसे कुछ योगासन करने से लिवर की सेहत को बढ़ाया जा सकता है। अपने लिवर को सेहतमंद रखने के लिए आप रोजाना कम से कम 3 से 4 मिनट तक हाफ स्पाइनल ट्विस्ट पोज कर सकते हैं। इससे न केवल आपका लिवर सेहतमंद रहेगा, बल्कि इससे पाचन शक्ति में भी मजबूत बनी रहेगी दरअसल, अगर रोजाना इस योगासन का अभ्यास किया जाए, तो इससे आपके लिवर डिटॉक्सिफिकेशन में काफी ज्यादा सहायता प्राप्त हो सकती है। 

  1. डाइट में सेहतमंद फैट्स को शामिल करना 

दरअसल, अगर हम अपनी डाइट में सेहतमंद फैट्स को शामिल करते हैं, तो इससे लिवर की सेहत बनी रहती है। लिवर की सेहत में बढ़ोतरी करने के लिए आप अपनी डाइट में सेहतमंद फैट्स जैसे नट्स, सीड्स, ऑलिव ऑयल और कोकोनट ऑयल को शामिल कर सकते हैं। इससे सम्पूर्ण स्वास्थ्य को लाभ प्राप्त होता है और शरीर तरह तरह की समस्याओं से बचा रहता है। अगर आप रोजाना अपनी डाइट में इन सेहतमंद फैट वाले भोजन को शामिल करते हैं, तो इससे लिवर फंक्शन ठीक रहता है और साथ में शरीर में हार्मोन प्रोडक्शन भी ठीक हो जाती है। 

निष्कर्ष: लिवर शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है, जो एक व्यक्ति के शरीर में खून को फिल्टर करने में काफी सहायता करता है। इस में होने वाली बीमारियां हमारे सम्पूर्ण स्वास्थ्य को कमजोर और बिगाड़ सकती हैं, इसलिए लिवर की सेहत को मजबूत बनाकर रखना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में, अगर आप अपनी जीवनशैली में कुछ चीजों का महत्वपूर्ण ध्यान रखते हैं, या फिर उनको अपनी जिन्दगी में अपनाते हैं, तो इससे आप अपने लिवर की सेहत में और भी ज्यादा सुधार कर सकते हैं। इस लेख में गए कुछ डाइट और लाइफस्टाइल से जुड़े उपायों को अपनाकर आप अपनी लिवर की सेहत में सुधार कर सकते हैं। यह काफी ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकते हैं। लिवर से जुड़ी कोई भी समस्या होने पर आपको तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए और लिवर से जुड़ी किसी भी समस्या का तुरंत समाधान पाने के लिए आप आज ही अमेरिटस हॉस्पिटल में जाकर इसके विशेषज्ञों से इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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क्या गर्भावस्था के पहले तीन महीने में महिलाएं दूध का सेवन कर सकती हैं? डॉक्टर से जानिए इसके फायदों के बारे में!

गर्भावस्था बहुत सी महिलाओं के लिए एक वरदान होता है। इसलिए इस दौरान गर्भवती महिलाओं को अपनी सेहत के साथ-साथ अपनी डाइट का भी ध्यान रखना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। इस दौरान गर्भवती महिलाओं को कई तरह के हार्मोनल बदलावों से गुजरना पड़ता है, जिसमें वह काफी ज्यादा परेशान हो जाती हैं। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को अपना विशेष ध्यान रखने के लिए अपनी डाइट पर ध्यान देने की काफी ज्यादा जरूरत होती है। इस तरह की स्थिति में, उन को हर चीज का सेवन काफी ज्यादा सोच समझ कर करना चाहिए। आम तौर पर, इस दौरान गर्भवती महिलाओं को जंक फूड, प्रोसेस्ड फूड और प्रिजर्व्ड फूड जैसे खाने का सेवन करने से बचना चाहिए। दरअसल, इस तरह के भोजन का सेवन न केवल महिला के लिए हानिकारक साबित हो सकता है, बल्कि गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए भी यह काफी ज्यादा नुकसानदायक साबित हो सकता है। इस तरह के खाने में, पोषक तत्वों की काफी ज्यादा कमी होती है और इन में गैर सेहतमंद फैट मौजूद होता है, जो गर्भ में पल रहे बच्चे के विकास में काफी ज्यादा रुकावट पैदा कर सकता है। हालांकि, इस तरह की स्थिति में, ज्यादातर गर्भवती महिलाओं को इस तरह के खाने से परहेज करना चाहिए और गर्भावस्था के पहले तीन महीने में उन को केवल सेहतमंद चीजों को ही अपनी डाइट में शामिल करना चाहिए। इस तरह की स्थिति में, गर्भवती महिलाएं अपनी डाइट में कई तरह की सेहतमंद चीजों को शामिल कर सकती हैं, जिसमें ज्यादातर मौसमी सब्जियां और फल आदि शामिल हो सकते हैं। रोजाना इन का सेवन न केवल एक माँ की सेहत के लिए लाभदायक साबित होता है, बल्कि यह गर्भ में पल रहे बच्चे की सेहत के लिए भी काफी ज्यादा लाभदायक साबित होता है। ऐसे में, बहुत सी महिलाओं के मन में सवाल उठता है, कि क्या वह गर्भावस्था के पहले तीन महीने में दूध का सेवन कर सकती हैं? दरअसल, इस पर डॉक्टर का कहना है, कि इस में किसी भी तरह का कोई शक नहीं है, कि दूध सेहत के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद होता है। हाँ, गर्भावस्था के पहले तीन महीने में महिलाएं दूध का सेवन कर सकती हैं और यह एक महिला की सेहत के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद साबित होता है। दूध में कई तरह के पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो माँ और बच्चे दोनों की सेहत के विकास के लिए लाफ़ी ज्यादा लाभदायक साबित होता है। आइये इस लेख के माध्यम से इस के बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

गर्भावस्था के पहले तीन महीने में महिलाओं को दूध पीना चाहिए या फिर नहीं?

दरअसल, NHS में छपे एक आर्टिकल के मुताबिक, गर्भावस्था के दौरान महिलाएं दूध और दूध से बनी चीजों का सेवन कर सकती हैं। आम तौर पर, दूध से बनी इन चीजों में दही, क्रीम, छाछ, चीज, कॉटेज चीज और पनीर आदि शामिल हो सकता है, जिन का सेवन गर्भवती महिलाएं अपनी डाइट में शामिल कर सकती हैं। डॉक्टर के अनुसार, गर्भावस्था के पहले तीन महीने में महिलाओं के लिए दूध का सेवन करना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। दूध कई तरह के पोषक तत्वों से भरपूर होता है, जिस में कैल्शियम, प्रोटीन और विटामिन बी12 शामिल होता है। NCBI की एक रिपोर्ट के अनुसार, रोजाना दूध का सेवन न केवल एक माँ की सेहत के लिए बेहतरीन माना जाता है, बल्कि इससे गर्भ में पल रहे बच्चे की सेहत का विकास भी काफी बेहतरीन तरीके से होता है। 

गर्भावस्था के पहले तीन महीने में महिलाएं कितनी मात्रा में दूध का सेवन कर सकती हैं? 

डॉक्टर के अनुसार, ज्यादातर गर्भवती महिलाओं को इस तरह की स्थिति में लगभग 400 से 500 मिलीलीटर तक ही दूध का सेवन करना चाहिए। इस दौरान, महिलाओं के लिए रोजाना पाश्चुराइज्ड, लो फैट और फैट फ्री दूध का सेवन करना काफी ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकता है। यह माँ और गर्भ में पल रहे बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए काफी ज्यादा लाभदायक साबित होता है। 

गर्भावस्था के पहले तीन महीने में दूध पीने के क्या-क्या फायदे हो सकते हैं?

दरअसल, गर्भावस्था के पहले तीन महीने में, दूध के सेवन से बच्चे और माँ को कई तरह के लाभ प्राप्त होते हैं, जिस में से कुछ निम्नलिखित शामिल हो सकते हैं, जैसे 

  1. दूध कैल्शियम की मात्रा से भरपूर होता है, जिससे गर्भ में पल रहे बच्चे की हड्डियों और दांतों का विकास अच्छे तरीके से होता है। 
  2. कैल्शियम के साथ- साथ दूध में प्रोटीन की भी भरपूर मात्रा मौजूद होती है, जो गर्भ में पल रहे बच्चे के अंगों के विकास में काफी ज्यादा महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 

निष्कर्ष: सभी बातों को सामने रखते हुए महिलाएं गर्भावस्था के पहले तीन महीने में दूध का सेवन कर सकती हैं। दूध पोषक तत्वों से भरपूर होता है, जो माँ और बच्चे की सेहत के लिए काफी ज्यादे लाभदायक साबित होता है। ध्यान रहे, इस तरह की स्थिति में अगर किसी महिला को दूध का सेवन करना बिल्कुल भी पसंद नहीं है या फिर वो लैक्टोज इनटॉलेरेंस है, तो इस दौरान उस को दूध और दूध से बनी किसी भी चीज का सेवन करने से बचना चाहिए। दूध सेहत के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद होता है, पर गर्भावस्था के दौरान अगर कोई समस्या होती है, तो आप इसका सेवन डॉक्टर की सलाह के बिना बिल्कुल भी न करें। इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए और गर्भावस्था में किस चीज का सेवन कर सकते हैं और किस का नहीं इसके बारे में जानने के लिए और इसके अलावा गर्भावस्था के दौरान होने वाली किसी भी तरह की समस्या का तुरंत समाधान पाने के लिए आप आज ही अमेरिटस हॉस्पिटल में जाकर इस के विशेषज्ञों से इस के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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महिलाओं में डिलीवरी के बाद आखिर क्यों बढ़ जाती है बवासीर की समस्या? डॉक्टर से जानें इसके बारे में!

गर्भावस्था के दौरान और गर्भावस्था के बाद में महिलाओं को अनगिनत मुसीबतों का सामना करना पड़ता है, जिसमें शारीरिक और मानसिक बदलाव भी शामिल होते हैं। असल में, गर्भावस्था एक महिला के लिए वो खूबसूरत पल होता है, जिसके वह सपने पहले से ही अपने मन में संजोकर रखती है। वह इसके लिए कई तरह की समस्याओं से भी लड़ने के लिए त्यार हो जाती है। यह तो सच है, कि गर्भावस्था के दौरान एक महिला को कई ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिसकी वजह से उसके शरीर में कई तरह के बदलाव देखे जा सकते हैं। वहीं जब बात एक महिला की डिलीवरी की आती है, मतलब कि जब एक गर्भवती महिला एक बच्चे को जनम देने वाली होती है या फिर उसको जनम दे रही होती है, तो वह पल एक महिला के लिए काफी ज्यादा महत्वपूर्ण और खुशियों से भरा हुआ होता है। वह इस दौरान उन सभी चीजों के बारे में सोच लेती है, जो उसके बच्चे के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद साबित होते हैं। आम तौर पर, इस दौरान जब वह अपने बच्चे को गोद में लेती है, तो वह अपने आप को कंट्रोल नहीं कर पाती है और अपने बच्चे को खूब सारा प्यार करने लग जाती है। असल में, यह पल एक औरत की ज़िंदगी की नई शुरुआत का होता है, जो उसके जीवन में खुशियों की बौछार ले आता है। 

दरअसल, यह हम आपको पहले भी बता चुके हैं, कि एक गर्भवती महिला को न केवल गर्भावस्था के दौरान, बल्कि डिलीवरी के बाद भी बहुत सी ऐसी तकलीफों से गुजरना पड़ता है, जिसकी वजह से उसको कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। वैसे तो, डिलीवरी के बाद महिलाओं को कई तरह की शारीरिक और मानसिक दिक्क्तों से गुजरना पड़ता है, जिसमें से बवासीर की समस्या होना काफी ज्यादा आम होता है। ऐसा बहुत बार देखने को मिलता है, कि डिलीवरी हम में से बहुत सी महिआएं बवासीर जैसी समस्या को काफी ज्यादा आम समझ लेती हैं और इस समस्या में दिखाई देने वाले लक्षणों पर महत्वपूर्ण ध्यान नहीं देती हैं, जिसकी वजह से उन को आगे चलकर कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यहां तक कि अगर इस समस्या पर ध्यान न दिया जाये, तो ये समस्या आगे चलकर अपना गंभीर रूप धारण कर लेती है, जो काफी परेशानी को खड़ा कर देती है। इसी उलझन

में फंसी कई महिलाएं जानना चाहती हैं, आखिर डिलीवरी के बाद उनको बवासीर जैसी समस्या क्यों इतनी ज्यादा बढ़ जाती है? आपका इसी सवाल का जवाब देते हुए डॉक्टर का कहना है, कि हार्मोनल बदलाव, पेल्विक ब्लड वेसल्स पर दबाव पड़ना और डिलीवरी के दौरान काफी ज्यादा जोर लगाना जैसे कारणों की वजह से डिलीवरी के बाद एक महिला को बवासीर जैसी समस्या का सामना करना पड़ता है। आइये इस लेख के माध्यम से इस के बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

डिलीवरी के बाद महिलाओं में बवासीर की समस्या क्यों बढ़ जाती है?

दरअसल, गर्भावस्था के दौरान और डिलीवरी के बाद में महिलाओं को अनगिनत समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिसमें बवासीर की समस्या होना बहुत ही ज्यादा आम मानी जाती है। महिलाओं में डिलीवरी के बाद बवासीर की समस्या होने के कुछ कारण निम्नलिखित अनुसार हो सकते हैं, जैसे कि 

  1. हार्मोनल बदलाव होना 

हार्मोनल बदलाव के कारण महिलाओं में डिलीवरी के बाद बवासीर की समस्या हो सकती है। ऐसे में, महिलाओं में प्रोजेस्टेरोन हार्मोन बढ़ता है और शरीर की आंतों की मसल्स रिलैक्स हो जाती हैं, जिससे कि मल त्याग की प्रक्रिया काफी ज्यादा धीमी हो जाती है और कब्ज जैसी समस्या का निर्माण होता है और यह बवासीर जैसी समस्या का एक बहुत बड़ा कारण बनता है। 

  1. पेल्विक रक्त वाहिकाओं पर दबाव पड़ना 

यह सभी जानते हैं, कि गर्भावस्था के दौरान एक महिला के गर्भाशय का आकार धीरे-धीरे बढ़ जाता है, जिससे कि मलद्वार क्षेत्र की नसों पर काफी ज्यादा दबाव पड़ता है। इसके कारण महिला को काफी परेशानी का सामना करना पड़ता है। इसका प्रभाव पेट के निचले हिस्से पर भी पड़ता है, जिसकी वजह से एक महिला के शरीर में खून का संचार काफी ज्यादा धीमा हो जाता है और गुदा के आस-पास की नसें दबाव केकारण फूलने लग जाती हैं। इससे न केवल पेट साफ होने में काफी दिक्कत होती है, बल्कि इसकी वजह से एक महिला धीरे-धीरे बवासीर की बीमारी का शिकार हो जाती है। ऐसे में, एक महिला को मल त्याग करते वक्त काफी ज्यादा दर्द और साथ में खून निकलने जैसी समस्या का सामना करना पड़ सकता है। 

डिलीवरी के बाद बवासीर की समस्या से कैसे बचा जा सकता है?

अगर आप डिलीवरी के बाद वाली समस्या यानी कि बवासीर से अपना बचाव करना चाहते हैं, तो आप इसके लिए निम्नलिखित उपायों का इस्तेमाल कर सकते हैं, जैसे कि 

  1. भोजन करने का एक समय तय करें और केवल तय किए गए समय पर ही भोजन का सेवन करें। 
  2. इस तरह की समस्या से बचने के लिए दिन में खूब पानी पीना काफी ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। रोजाना कम से कम 8 से 10 गिलास पानी के जरूर पिएं। 

निष्कर्ष: गर्भावस्था और प्रसव के बाद बवासीर की समस्या होना आम होता है। पर, इसे नज़रअंदाज करना सेहत के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं होता है। हार्मोनल बदलाव, पेल्विक ब्लड वेसल्स पर दबाव पड़ना और डिलीवरी के दौरान काफी ज्यादा जोर लगाना जैसे कारणों के कारण ही महिलाओं में बवासीर की समस्या काफी ज्यादा बढ़ जाती है। अगर वक्त रहते बवासीर की समस्या की पहचान कर ली जाए, तो इसे कंट्रोल किया जा सकता है। नहीं तो, कई मामलों में सर्जरी की आवश्यकता हो सकती है। मिनिमली इनवेसिव और लेज़र-बेस्ड जैसे तरीकों से बवासीर का इलाज सही तरीके से हो सकता है। इस के बारे में ज्यादा जानने के लिए और गर्भावस्था के दौरान या फिर बाद में होने वाली किसी भी समस्या का समाधान पाने के लिए आप आज ही अमेरिटस हॉस्पिटल के विशेषज्ञों से संपर्क कर सकती हैं।

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क्या त्वचा और पेट से जुड़े यह लक्षण हो सकते हैं लिवर में खराबी का संकेत? डॉक्टर से जानें इसके बारे में!

आम तौर पर, इस बात से कोई भी अनजान नहीं है, कि हमारे शरीर के सभी अंग किसी न किसी तरह एक दूसरे से जुड़े हुए हैं, जो शरीर को चलाने में हमारी काफी ज्यादा सहायता करते हैं। दरअसल, ये हमारे शरीर के लिए बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं। आम तौर पर, शरीर के इन्ही अंगों में से एक है, लिवर जो न केवल हमारे शरीर के लिए जरूरी होता है, बल्कि यह हमारे शरीर को बिल्कुल ठीक तरीके से काम करने और साथ में शरीर को बेहतर रखने में हमारी काफी ज्यादा सहायता करता है। इसलिए, शरीर के सम्पूर्ण स्वास्थ्य के लिए लिवर को सेहतमंद रखना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि एक सेहतमंद लिवर शरीर के पाचन को बेहतर रखने के साथ -साथ, शरीर के मेटाबॉलिज्म को भी बढ़ाने में हमारी काफी ज्यादा मदद करता है। इसलिए, इस तरह की स्थिति में लिवर का एक बेहतर तरीके से काम करना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। आम तौर पर, अगर किसी कारण वर्ष आपका लिवर काम करना बंद कर दे, या फिर समय के साथ खराब होने लगे, तो इसके खराब होने के लक्षण आपको अपने शरीर के कई हिस्सों पर नज़र आने लग जाते हैं, जिसमें विशेष तौर पर त्वचा और पेट से जुड़े बहुत से लक्षण शामिल होते हैं। दरअसल, इस तरह के लक्षणों को बहुत से लोग आम समझ कर यूं ही नज़रअंदाज कर देते हैं, जो न केवल लिवर के लिए बल्कि हमारी शारीरिक सेहत के लिए काफी ज्यादा नुकसानदायक होते हैं। आम तौर पर, लिवर खराब होने पर आपको कई तरह के लक्षण नज़र आ सकते हैं, जिसमें त्वचा और आंखों का पीला पड़ जाना मतलब की पीलिया होना, त्वचा पर असहनीय खुजली होना, पैरों और एड़ियों में सूजन की समस्या होना, काफी लंबे समय से थकान होना और पेट का फूलना जैसे यह लक्षण त्वचा और पेट में नज़र आ सकते हैं। दरअसल, इन लक्षणों को आम समझ कर नज़रअंदाज करना सेहत के लिए काफी ज्यादा हानिकारकर साबित हो सकते हैं। वक्त रहते इन का इलाज न होने पर लिवर खराब भी हो सकता है। इसलिए, लिवर की सेहत को बनाए रखने के लिए त्वचा और पेट में दिखाई देने वाले इन लक्षणों पर ध्यान देना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। आम तौर पर, लिवर से जुड़ी गंभीर समस्या होने पर आपको तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए और इसका इलाज करवाना चाहिए। आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

त्वचा और पेट में लिवर खराब होने के संकेत क्या हो सकते हैं?

आम तौर पर, त्वचा और पेट में दिखाई देने वाले लक्षण जो लिवर के खराब होने का संकेत हो सकते हैं, दरअसल वह निम्नलिखित अनुसार हो सकते हैं, जैसे कि 

  1. त्वचा और आंखों का पीला पड़ना (पीलिया) 

दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि एक व्यक्ति को पीलिया जैसी समस्या तब होती है, जब उस व्यक्ति के शरीर के खून के प्रवाह में बिलीरुबिन की मात्रा काफी ज्यादा बढ़ जाती है, जिसकी वजह से उसकी आँखें और त्वचा काफी ज्यादा पिली दिखाई देने लग जाती हैं। आम तौर पर, इस तरह की स्थिति आपको बताती है, कि आपका लिवर बिलीरुबिन को अच्छे तरीके से प्रोसेस नहीं कर पा रहा है। जिसकी वजह से आपको हेपेटाइटिस या फिर सिरोसिस जैसी लीवर से जुड़ी गंभीर बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। इसे नज़रअंदाज करने की बजाए आपको तुरंत अपने डॉक्टर से सम्पर्क करना चाहिए। 

  1. त्वचा पर खुजली होना 

आम तौर पर, हम में से ज्यादातर लोग यह मानते हैं, कि त्वचा पर लगातार खुजली होना सिर्फ एक ड्राई त्वचा का ही लक्षण होता है। पर, ऐसा बिल्कुल भी नहीं है, त्वचा पर लगातार होने वाली खुजली सिर्फ ड्राई त्वचा का लक्षण नहीं होता, दरअसल यह लिवर के ठीक से काम न करने का भी संकेत हो सकता है। आम तौर पर, इस तरह की स्थिति में, पित्त एसिड खून के प्रवाह में जमा हो जाता है, जिसकी वजह से त्वचा में खुजली जैसी समस्या बनने लग जाती है। दरअसल, इस तरह की स्थिति को अक्सर प्रुरिटस के नाम से जाना जाता है। 

  1. पैरों और एड़ियों में सूजन की समस्या होना 

आम तौर पर, पैरों और एड़ियों में होने वाली सूजन की वजह से शरीर में तरल पदार्थ का जमाव काफी ज्यादा हो जाता है। क्योंकि, लीवर शरीर में पानी के संतुलन को

कंट्रोल करने का काम करता है, पर जब लिवर की कार्यप्रणाली किसी कारण वर्ष बुरी तरीके से प्रभावित हो जाती है, तो इससे फ्लूड का निर्माण होता है, जिसकी वजह से पैरों और एड़ियों में सूजन की समस्या होने लग जाती है, जिसको एडिमा के नाम से भी जाना जाता है। 

निष्कर्ष : हमारे शरीर के सभी अंग काफी ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं, जो सेहत को बनाए रखने में हमारी काफी ज्यादा सहायता करते हैं। लिवर शरीर के सभी महत्वपूर्ण अंगों में से एक माना जाता है, जो शरीर की सेहत के लिए और शरीर को ठीक तरीके से काम करने और शरीर को बेहतर रखने में मदद करता है। सेहतमंद लिवर शरीर के पाचन को बेहतर रखने के साथ -साथ, शरीर के मेटाबॉलिज्म को भी बढ़ाने में मदद करता है। लिवर में होने वाली खराबी सेहत के साथ-साथ पाचन को भी खराब कर सकती है। इसलिए, लिवर का सेहतमंद होना जरूरी होता है। त्वचा और आंखों का पीला पड़ना, त्वचा पर असहनीय खुजली होना और पेट फूलना जैसे लक्षण लिवर के खराब होने का संकेत हो सकते हैं। वक्त रहते इन पर ध्यान देना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। अगर आप भी अपने शरीर में इन लक्षणों को देखते हैं, तो आपको तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। इसके बारे में ज्यादा जानने के लिए और लिवर से जुड़ी किसी भी समस्या के समाधान के लिए आप आज अमेरिटस हॉस्पिटल में जाकर इसके विशेषज्ञों से इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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क्या यह 3 लक्षण हो सकते हैं लिवर की बीमारी का संकेत? डॉक्टर से जानें, लिवर की बीमारियों से बचने के उपाय!

लिवर शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग होता है, जो शरीर में मौजूद जहरीले रसायनों को फिल्टर करके मल या फिर पेशाब के रूप में शरीर से बाहर निकालने में हमारी काफी ज्यादा सहायता करता है। दरअसल, शरीर की इन वेस्ट चीजों को पित्त भी कहा जाता है, जिसका निर्माण लिवर में होता है। हालांकि, मल का भूरा रंग इसकी वजह से ही होता है। दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि शरीर में ब्लड शुगर को कंट्रोल करना, शरीर में ग्लूकोज को ऊर्जा में बदलना और शरीर में प्रोटीन के संतुलन को बनाए रखना यह लिवर के मुख्य कामों में ही शामिल होते हैं। आम तौर पर, अगर किसी वजह से आपके लिवर के काम -काज में किसी भी तरह की कोई गड़बड़ी आ जाती है, तो इस से शरीर की बहुत सी चीजें काफी ज्यादा प्रभवित हो जाती हैं। महत्वपूर्ण ध्यान न देने पर लिवर में कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं, जिसमें लिवर में ट्यूमर का बनना और लिवर में कैंसर होना जैसी समस्याएं काफी ज्यादा गंभीर होती हैं, जिन पर ध्यान देना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। आम तौर पर, इसके अलावा भी लिवर से जुड़ी कुछ आम बीमारियां होती हैं, जिन को अपने लाइफस्टाइल में सुधार करके ठीक किया जा सकता है। दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि एक व्यक्ति को बार-बार पीलिया होना, पेट दर्द और सूजन रहना, त्वचा में खुजली, जी मिचलाना और उल्टी होना जैसे लक्षण लिवर की बीमारी का संकेत हो सकते हैं। आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

लिवर से जुड़ी आम बीमारियां कौन सी होती हैं?

लिवर से जुड़ी आम बीमारियों में निम्नलिखित बीमारियां शामिल हो सकती हैं, जैसे कि 

  1. हेपेटाइटिस। 
  2. फैटी लिवर। 
  3. ऑटोइम्यून स्थितियां। 

लिवर से जुड़ी गंभीर बीमारियां कौन सी होती हैं?

लिवर से जुड़ी गंभीर बीमारियों में शामिल हो सकती हैं, जैसे कि 

  1. लिवर में शुरुआती ट्यूमर होना। 
  2. सेकंडरी लिवर ट्यूमर होना। 

लिवर से जुड़ी बीमारियों के आम कारण क्या हो सकते हैं?

लिवर की बीमारियों के आम कारण निम्नलिखित अनुसार हो सकते हैं, जैसे कि 

  1. वायरल संक्रमण होना। 
  2. एंटीबायोटिक दवाओं का सेवन करना। 
  3. मेटाबोलिज्म का खराब होना। 
  4. इंडस्ट्रियल केमिकल्स के संपर्क में आना। 
  5. शराब का ज्यादा सेवन करना। 
  6. लाइफस्टाइल का खराब होना 

3 लक्षण जो लिवर से जुड़ी बीमारी का संकेत देते हैं!

  1. बार-बार पीलिया का शिकार होना 

आम तौर पर, अगर किसी व्यक्ति का लिवर अच्छे तरीके से काम नहीं करता, तो वह पीलिया जैसी बीमारी का शिकार जो सकता है। दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि ज्यादातर बिलीरुबिन की वजह से ही पीलिया होता है और इसका निर्माण शरीर में तब होता है, जब पुराने या फिर खराब रेड ब्लड सेल्स को रीसायकल करने की आम प्रक्रिया में हीमोग्लोबिन टूट जाता है। हालांकि, बिलीरुबिन लिवर से निर्मित होकर पाचन तंत्र में मिल जाता है। पर, जब इसमें किसी भी तरह की कोई भी गड़बड़ी होती है, तो यह पीलिया जैसी समस्या का कान बन सकता है। 

  1. त्वचा में खुजली होना 

दरअसल, लिवर से जुड़ी गंभीर समस्या से पीड़ित लोगों की त्वचा में खुजली के साथ-साथ रैशेज भी हो सकते हैं। हालांकि, त्वचा से जुड़े यह लक्षण शरीर के दूसरे लक्षणों के साथ भी दिखाई दे सकते हैं। ऐसा होने पर आपको तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। 

  1. गहरे रंग का पेशाब आना 

गहरे नारंगी, एम्बर और भूरे रंग का पेशाब कहीं न कहीं लिवर की बीमारी का संकेत हो सकता है। इसलिए, अगर आपको अपने मल या फिर मूत्र के रंग में किसी भी तरह का कोई भी बदलाव नज़र आता है, तो आपको तुरंत अपने डॉक्टट से संपर्क करना चाहिए, क्योंकि यह लिवर की गतिविधियों के खराब होने का एक बहुत बड़ा लक्षण हो सकता है। 

लिवर की बीमारियों से बचने के उपाय क्या हो सकते हैं 

लिवर से जुड़ी बीमारियों से बचने के लिए लाइफस्टाइल में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव करने की काफी ज्यादा जरूरत होती है। इन समस्याओं से बचने के उपाय निम्नलिखित अनुसार हो सकते हैं, जैसे कि 

  1. शराब का सेवन काम करना। 
  2. अपने शरीर के वजन को संतुलित रखना। 
  3. अधिक मात्रा में पानी का सेवन करना। 
  4. अपनी डाइट में भरपूर मात्रा में फाइबर को शामिल करना। 

निष्कर्ष: हाँ, व्यक्ति को बार-बार पीलिया होना, पेट दर्द और सूजन रहना, त्वचा में खुजली, जी मिचलाना और उल्टी होना जैसे लक्षण लिवर की बीमारी का संकेत हो सकते हैं। नज़रअंदाज करने की बजाए इन लक्षणों पर ध्यान देना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। लिवर से जुड़ी बीमारियों का पता एक दिन में नहीं चल सकता, बल्कि यह बीमारियां धीरे- धीरे बढ़ती हैं और आगे चलकर किसी बड़ी बीमारी का रूप धारण कर लेती हैं। इसलिए, किसी भी गंभीर बीमारी से बचने के लिए इन लक्षणों इलाज करना बहुत ही ज्यादा जरूरी होता है। लिवर की बीमारी से बचने के लिए आप इस लेख में बताए गए उपायों का इस्तेमाल कर सकते हैं, पर गंभीर समस्या होने पर आपको अपने डॉक्टर से ही संपर्क करना चाहिए। इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए और लिवर से जुड़ी किसी भी तरह की समस्या का तुरंत समाधान पाने के लिए आप आज ही अमेरिटस हॉस्पिटल में जाकर इसके विशेषज्ञों से इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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प्रदूषण से बचने के लिए गर्भवती महिलाओं को किन टिप्स को अपनाना चाहिए? डॉक्टर से जानें इसके बारे में!

दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि आज भी लगभग 400 के आस- पास एयर क्वालिटी इंडेक्स देखा गया है। जो एक व्यक्ति की सेहत के लिए काफी ज्यादा नुकसानदायक साबित हो सकता है। आम तौर पर, इस तरह की स्थिति के दौरान किसी भी व्यक्ति को सांस लेने में दिक्कत और फेफड़ों की दिक्कत जैसी कई दूसरी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि यह दूसरे सेहतमंद लोगों के मुकाबले गर्भवती महिलाओं को काफी ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है। कई महिलाएं प्रदूषण भरी इस स्थिति को आम समझ लेती हैं और घर से बाहर निकल जाती है, जो कि उनकी और उनके बच्चे की सेहत के लिए काफी ज्यादा हानिकारक साबित हो सकता है। 

असल में, डॉक्टर का कहना है कि अगर महिलाओं को पॉल्यूशन जैसी हालत से बचाया नहीं गया और साथ में इसे नॉर्मल ही माना गया, तो इसकी वजह से गर्भावस्था के तीसरे महीने के दौरान गर्भ में पल रहे बच्चे को ऑटिज़्म जैसी गंभीर बीमारी हो सकती है, और इस दौरान महिला को खुद अस्थमा और बीपी जैसी हेसेहत समस्या का सामना करना पड़ सकता है। दरअसल, इतना ही नहीं वातावरण में बढ़ते प्रदूषण की वजह से एक गर्भवती महिला को मिसकैरेज और प्री-मेच्योर बेबी होने जैसी स्थितियों का खतरा भी काफी ज्यादा बढ़ सकता है। 

आम तौर पर, इस तरह की स्थितियों से आप अंदाजा लगा सकते हैं, कि एक आम इंसान को बढ़ते पॉल्यूशन से इतना ज्यादा खतरा नहीं होता है, जितना कि गर्भवती महिलाओं को होता है। दरअसल, इस तरह की स्थिति से बचने के लिए गर्भवती महिलाएं कुछ टिप्स को अपना सकती हैं, जिसमें एयर क्वालिटी इंडेक्स पर नज़र रखना, घर से बाहर निकलने से बचना, स्मोकिंग से दूर रहना और साथ में प्रदूषण के प्रति सजग रहना जैसे कुछ टिप्स शामिल हो सकते हैं। यह टिप्स माँ और बच्चे दोनों की हेल्थ के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकते हैं। आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। 

गर्भवती महिलाएं किस तरह बढ़ते प्रदूषण में अपना बचाव कर सकती हैं? 

वैसे तो, गर्भवती महिलााओं को बढ़ते प्रदूषण में अपना बचाव करने के लिए बहुत से उपायों का इस्तेमाल करना चाहिए, जिससे माँ और बच्चे दोनों की सेहत बनी रहे। ऐसी स्थिति में प्रेग्नेंट महिलाएं बढ़ते प्रदूषण से खुद को बचाने के लिए नीचे दिए गए कुछ टिप्स अपना सकती हैं, जैसे:

  1. एयर क्वालिटी इंडेक्स पर नजर रखना 

हालांकि, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि गर्भवती महिलाओं को दिन- ब- दिन बदलते एयर क्वालिटी इंडेक्स का ध्यान रखना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है, दरअसल यह महत्वपूर्ण होने के साथ- साथ काफी ज्यादा फायदेमंद भी साबित हो सकता है। क्योंकि, इस की मदद से समय- समय पर गर्भवती महिलाओं को पता चलता रहता है, कि उन को घर से कब बाहर निकलना है और कब नहीं निकलना है। दरअसल, एयर क्वालिटी इंडेक्स के बारे में जानने के लिए आप किसी ऑथेंटिक वेबसाइट पर विजिट कर सकती हैं। हालांकि, इसके बारे में जानने का बाद आप यह भी जान सकती हैं, कि आपको घर के मुख्य दरवाजों को कब खोलना है और कब बंद रखना है। 

  1. स्मोकिंग से दूर रहना 

वैसे तो, ज्यादातर गर्भवती महिलाएं स्मोकिंग का सेवन बिल्कुल भी नहीं करती है, क्योंकि स्मोकिंग करने से न केवल एक माँ की सेहत प्रभावित होती है, बल्कि इससे होने बाले बच्चे की सेहत पर भी काफी ज्यादा बुरा प्रभाव पड़ता है, जिससे बच्चे को शुरुआत में ही फेफड़ों से जुडी समस्या या फिर कोई अन्य समस्या हो सकती है। पर, अपने कभी न कभी यह देखा होगा है, कि बहुत सी गर्भवती महिलाओं के घर में, एक ऐसा व्यक्ति जरूर होता ही है, जो रोजाना स्मोकिंग करता है। दरअसल, इस तरह की स्थिति उत्पन्न होने पर गर्भवती महिलाओं को चाहिए, कि वो स्मोकिंग में उड़ने वाले धुएं से दूर रहें। क्योंकि, स्मोकिंग का धुआं न केवल एक माँ की सेहत को प्रभावित करता है, बल्कि होने वाले बच्चे की सेहत पर भी बुरा प्रभाव डाल सकता है। 

निष्कर्ष: बढ़ते प्रदूषण के कारण लोगों को सांस से जुडी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जिसमें उन को सांस लेने में दिक्क्त और फेफड़ों में कई तरह कि दिक्कतें हो सकती हैं। यह दूसरे सेहतमंद लोगों के मुकाबले गर्भवती महिलाओं को काफी ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए, इस तरह की स्थिति में गर्भवती महिलाओं को अपना ध्यान रखने के लिए एयर क्वालिटी इंडेक्स पर नज़र रखना, घर से बाहर निकलने से बचना, स्मोकिंग से दूर रहना और साथ में प्रदूषण के प्रति सजग रहना जैसे कुछ टिप्स को अपना सकती है। इससे न केवल माँ कि सेहत बनी रहती है, बल्कि बच्चे की सेहत भी ठीक रहती है। गर्भावस्था के दौरान किसी भी तरह की गंभीर समस्या होने पर आपको तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए और गर्भावस्था से जुड़ी किसी भी समस्या का समाधान पाने के लिए आप आज ही अमेरिटस हॉस्पिटल में जाकर इस के विशेषज्ञों से इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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सर्दियों में गर्भवती महिलाएं अपना ख्याल कैसे रख सकती हैं? डॉक्टर से जानें देखभाल करने के कुछ आसान तरीके!

ज्यादातर, सर्दियों के मौसम में अपने आप को सेहतमंद और सुरक्षित रखना किसी चुनौती से कम नहीं होता है, क्योंकि इस दौरान ज्यादातर लोगों को सेहत और त्वचा से जुड़ी तरह -तरह की समस्याओं का होना काफी ज्यादा आम होता है। इसमें, सर्दी- जुकाम, बुखार और बहुत सी दूसरी समस्याएं जैसे वायरल संक्रमण शामिल हो सकते हैं। इसके अलावा, इस दौरान ठंड की वजह से एक व्यक्ति के सिर में दर्द और बुखार जैसी समस्या होना बहुत ही आम होता है। दरअसल, इस बात को तो लगभग सभी जानते ही होंगे, कि सर्दियों के मौसम में एक आम इंसान का सेहतमंद रहना कितना ज्यादा मुश्किल हो जाता है, तो इस तरह की स्थिति में जब एक गर्भवती महिला की बात आती है, तो उस को इस दौरान अपनी और अपने बच्चे की सेहत का ध्यान रखना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। 

दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि इस दौरान गर्भवती महिला को थोड़ी- सी भी ठंड लगने पर न केवल वह बीमार पड़ सकती है, बल्कि इससे उस के गर्भ में पल रहे बच्चे की सेहत पर भी बुरा प्रभाव पड़ सकता है। इसके अलावा, इस दौरान गर्भवती महिलाओं को किसी भी तरह की कोई भी दवा का सेवन करने से बचने की सलाह प्रदान की जाती है, क्योंकि इससे गर्भ में पल रहे बच्चे को काफी नुकसान पहुंच सकता है। आम तौर पर, इसी के चलते गर्भवती महिलाओं को सर्दी के दौरान अपना विशेष ध्यान रखने की सलाह प्रदान की जाती है। ऐसे में, बहुत सी महिलाएं काफी सोच में पड़ जाती हैं, कि आखिर वह सर्दियों के मौसम में अपना किस तरीके से ख्याल रख सकती हैं? तो ऐसे में वह कुछ आसान और सरल उपायों का इस्तेमाल करके सर्दियों के मौसम में अपने आप को स्वस्थ रख सकती हैं। दरअसल, सर्दियों में गर्भवती महिलाओं को अपना ख्याल रखने के लिए अच्छी डाइट लेना, हाइड्रेटेड रहना, घर के अंदर रहना, एक्टिव रहना, फ्लू का टीका लगवाना, सही जूतों को पहनना और अपने रोजाना के विटामिन्स को लेना न भूलना जैसे कुछ आसान और असरदार टिप्स को आजमा सकती हैं। यह आसान तरीके सर्दी के मौसम में आपको स्वस्थ रखने में आपकी काफी ज्यादा सहायता कर सकते हैं। आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

सर्दियों के मौसम में गर्भवती महिलाओं की देखभाल के लिए टिप्स

  1. सेहतमंद डाइट का सेवन करना 

दरअसल, ज्यादातर गर्भवती महिलाओं को अपने और अपने बच्चे को सेहतमंद और सुरक्षित रखने के लिए सेहतमंद और पोषक तत्वों से भरपूर डाइट का सेवन करना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। आम तौर पर, इससे न केवल आपकी इम्यूनिटी मजबूत होती है, बल्कि इससे आप जल्दी बीमार होने से बची रहती हैं। 

  1. हाइड्रेट रहना 

आम तौर पर, चाहे वो कोई आम इंसान हो या फिर गर्भवती महिआएं हो, दरअसल सर्दियों के मौसम में हम में से किसी का भी पानी पीने का बिल्कुल भी मन नहीं करता है। पर, सच बात तो यह है, कि शरीर को हाइड्रेट रखना गर्मियों में जितना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है, दरअसल उतना ही महत्वपूर्ण सर्दियों में होता है। ख़ास तौर पर गर्भवती महिलाओं को इस चीज का ध्यान रखना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। दरअसल, यह सर्दियों के मौसम में ड्राईनेस जैसी समस्या से बचने में भी काफी ज्यादा सहायता प्रदान करता है।

  1. जितना संभव हो घर के अंदर ही रहना 

हालांकि, डॉक्टरों द्वारा ज्यादातर गर्भवती महिलाओं को घर के अंदर ही रहने की सलाह प्रदान की जाती है, क्योंकि घर के अंदर का वातावरण गर्म और काफी ज्यादा आरामदायक होता है, जो माँ और बच्चे की सेहत के लिए काफी ज्यादा लाभदायक होता है। दरअसल, इस दौरान बहुत जरूरी काम होने पर ही ठंड के दौरान गर्भवती महिला को घर से बाहर निकलने के लिए कहा जाता है। 

  1. फ्लू का टीका लगवाना 

दरअसल, गर्भवती महिलाओं की इम्यूनिटी कमजोर होने की वजह से उन को खांसी और सर्दी जैसी तरह-तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जिसके लिए फ्लू का टीका लगवाना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है। 

  1. सही जूते पहनें

दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि सर्दियों के मौसम में शरीर को गर्म के साथ -साथ आरामदायक महसूस करना भी काफी ज्यादा जरूरी होता है। इसलिए, इस दौरान अपने शरीर को आरामदायक महसूस कराने के लिए सही कपड़ों के साथ-साथ आरामदायक जूतों का भी चुनाव करना महत्वपूर्ण होता है, क्योकि इससे माँ और बच्चे दोनों को काफी आराम मिलता है। दरअसल, इस तरह की स्थिति के दौरान अगर आपके इलाके में बर्फ पड़ रही है, तो जितना हो सके फिसलने से बचें, क्योंकि इससे बच्चे और आपकी सेहत पर असर पड़ सकता है। इस दौरान, पक्का करें कि आप सही और आरामदायक जूतों को पहन रही हैं, ताकि इस तरह की स्थिति के दौरान आप खुद को गिरने से बचा सकें और सर्दियों की दुनिया में पूरे कॉन्फिडेंस के साथ घूम सकें।

निष्कर्ष: सर्दियों के मौसम में, गर्भावस्था के दौरान अपना ख्याल रखने के लिए आप इस लेख में बताये गए कुछ आसान घरेलू उपायों को अपना सकते हैं। इससे आपको और आपके गर्भ में पल रहे बच्चे को सुरक्षा प्राप्त होती है और आप सेहतमंद रहती हैं। इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए और गर्भावस्था से जुड़ी किसी भी तरह की गंभीर और आम समस्या का समाधान पाने के लिए आप आज ही अमेरिटस हॉस्पिटल में जाकर इसके विशेषज्ञों से इसके इलाज बारे में जानकारी प्राप्त कर सकती हैं।

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क्या आपको भी प्रेग्नेंसी में सीट बेल्ट पहनने में परेशानी होती है? प्रेग्नेंसी में सीट बेल्ट पहनने के लिए अपनाएं ये आसान टिप्स

दरअसल, गर्भधारण करना सभी महिलाओं का अपना एक ख़ास सपना होता है, जिसके लिए वह बहुत उत्सुक और कई तैयारियां करके रखती हैं। पर गर्भधारण उनके लिए काफी ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकता है, क्योंकि इस दौरान उनके शरीर में ऐसे कई बदलाव आते हैं, जिन से वह बहुत ही ज्यादा परेशान हो जाती हैं। आम तौर पर, महिलाओं में यह बदलाव खाने पीने, पहनने और कार में बैठने के तौर- तरीकों से जुड़े हुए हो सकते हैं। 

दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि ऐसे में गर्भावस्था के दौरान, महिलाओं को जी मिचलाना, थकान होना, सिर में दर्द होना, उलटी आना, मूड में बदलाव होना और काफी ज्यादा गर्मी लगना जैसी कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वहीं इसके चलते बहुत सी ऐसी चीजें होती हैं, जिन पर हमारा बिल्कुल भी ध्यान नहीं जाता है और शायद हम उनको ऐसे ही समझकर नज़रअंदाज कर देते हैं। दरअसल, इन चीजों में कार में बैठने जैसी स्थिति के दौरान सीट बेल्ट लगाने में काफी ज्यादा परेशानी का सामना करना शामिल होता है। जी हाँ, यह बात बिल्कुल सच है, कि गर्भावस्था के दौरान बहुत सी महिलाओं को सीट बेल्ट लगाने में काफी ज्यादा दिक्कत का अनुभव हो सकता है। 

इस तरह की स्थिति में, अगर आपको भी कार में बैठने के दौरान सीट बेल्ट लगाने में काफी दिक्कत महसूस होती है, तो इसके लिए आप कुछ आसान टिप्स को अपना सकते हैं। आम तौर पर, गर्भावस्था के दौरान सीट बेल्ट लगाने पर होने वाली परेशानी को कम करने के लिए आप सीट बेल्ट को कुछ आसान तरीकों से लगा सकते हैं, जिसमें गर्भावस्था के दौरान हमेशा तीन पॉइंट वाली सील्ट बेल्ट को पहनना, तीन पॉइंट वाली सीट बेल्ट में 1 स्ट्रैप तिरछा कंधे पर और दूसरा स्ट्रैप गोद में होना, सीट बेल्ट को हमेशा हिप्स के आसपास आराम से बांधना, गर्भावस्था के दौरान शुरुआती दिनों में सीट बेल्ट को पहले की तरह पहनना, पेट के पास काफी जगह बनाने के लिए सीट को पीछे की ओर झुका कर सीट बेल्ट पहनना और बच्चे को किसी भी तरह की चोट से बचाने के लिए लैप बेल्ट को पेट के नीचे की तरफ पहनना आदि शामिल हो सकता है। आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

प्रेगनेंसी में सीट बेल्ट किस तरह पहनी जा सकती है?

आम तौर पर, गर्भावस्था के दौरान सीट बेल्ट सही तरीके से न पहनने कि वजह से आपको बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, जिसमें विशेष तौर पर बच्चों को तकलीफ होना शामिल हो सकता है। प्रेगनेंसी में सीट बेल्ट पहनने के आसान उपाय क्या हो सकते हैं?

गर्भावस्था के दौरान सीट बेल्ट पहनने के आसान टिप्स

दरअसल, गर्भावस्था के दौरान सीट बेल्ट पहनने के लिए आपको कुछ आसान टिप्स अपनाने कि काफी ज्यादा जरूरत होती है, ताकि आपको इस दौरान किसी भी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े, जैसे कि 

  1. लैप बेल्ट को पेट के नीचे की तरफ ही रखना 

इस दौरान, कार में बैठने के दौरान सीट बेल्ट का निचला हिस्सा आपकी जांघों और हिप बोन जिसे कूल्हे की हड्डियां कहा जाता है उस पर और पेट के ठीक  नीचे की तरफ होनी चाहिए, ना कि पेट के ऊपर। ऐसा करने से कोई भी दुर्घटना के दौरान प्रेशर आपके हिप्स पर ही पड़ेगा, न कि आपके पेट पर, जिससे कि बच्चा बिल्कुल सुरक्षित रहेगा। 

  1. शोल्डर बेल्ट को सही पोजीशन में लगाना 

दरअसल, इस तरह की स्थिति में शोल्डर बेल्ट केवल आपकी छाती, गर्दन और कंधों के बीच से ही होकर गुजरनी चाहिए। इस दौरान इस बात का ख़ास ध्यान रखें कि यह बेल्ट आपकी गर्दन के ऊपर या फिर आपकी बाजू के नीचे से होकर बिल्कुल भी नहीं गुजारनी चाहिए। ऐसे में, अगर हो सके तो अपनी सीट के ऊपर के बेल्ट पॉइंट को बदलें, ताकि बेल्ट सही ऊंचाई पर हो सके।  

  1. सीट और स्टीयरिंग व्हील को बदलें 

इस तरह की स्थिति में आप अपनी सीट और स्टीयरिंग व्हील को बदल सकते हैं। जैसे कि इस दौरान कार में बैठे हुए आप अपनी सीट को थोड़ा पीछे की तरफ करें और स्टीयरिंग व्हील को ऊपर की तरफ करें, ताकि इस से आपके पेट और स्टीयरिंग व्हील के बीच काफी जगह बन सके। यह तरीका काफी ज्यादा फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि यह बच्चे और माँ दोनों को बचा सकता है। इस के अलावा, इस दौरान कार चलाते वक्त एयरबैग को कभी भी बंद न करें, क्योंकि यह सीट बेल्ट के साथ मिलकर आपको बचाने का काम करता है। 

  1. अगर हो सके तो ज्यादातर पिछली सीट पर ही बैठने की कोशिश करें 

दरअसल, गर्भावस्था के दौरान जितना हो सके पिछली सीट पर ही बैठने की कोशिश करें, क्योंकि पिछली सीट पर बैठना अक्सर आगे की सीट से ज़्यादा सुरक्षित होता है। इसके अलावा, एक्सीडेंट के दौरान पीछे बैठने वालों के घायल होने का चांस काफी कम होता है।

निष्कर्ष: गर्भावस्था के दौरान बहुत सी चीजों का ध्यान रखना जरूरी होता है। गर्भावस्था के दौरान सीट बेल्ट लगाने पर होने वाली परेशानी को कम करने के लिए आप इस लेख में बताए गए सीट बेल्ट को लगाने के कुछ आसान तरीकों को अपना सकते हैं। गलत तरीके से लगाई गई सीट बेल्ट खाली पेट से कई बेहतर होती है, पर सही तरीका महत्वपूर्ण होता है। इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए और गर्भावस्था के दौरान किसी भी समस्या का समाधान पाने के लिए आप आज ही अमेरिटस हॉस्पिटल में जाकर इसके विशेषज्ञों से इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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क्या गर्भावस्था के दौरान नारियल का सेवन किया जा सकता है? डॉक्टर से जाने प्रेगनेंसी में नारियल खाने के फायदे

गर्भावस्था के दौरान तो एक महिला को अपनी सेहत का विशेष ध्यान रखने की जरुरत होती है। डॉक्टर भी गर्भावस्था के दौरान एक महिला को सेहत और खानपान का विशेष ध्यान रखने की सलाह प्रदान करते हैं। क्योंकि, इस तरह की स्थिति में माँ और  च्चे की सेहत काफी ज्यादा नाजुक होती है, जिसका ख़ास ध्यान रखना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। आम तौर पर, गर्भावस्था जैसी स्थिति में एक महिला के शरीर में कई तरह के हार्मोनल बदलाव होते हैं, जिसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर काफी ज्यादा बुरा प्रभाव पड़ता है। दरअसल, इस तरह की स्थिति के दौरान शरीर में हार्मोन को बैलेंस करने के लिए अपने खान -पान पर विशेष ध्यान दिया जाता है। आम तौर पर, इस दौरान होने वाली कई तरह की समस्याओं से निपटने के लिए खानपान सेहतमंद और बिल्कुल सही होना चाहिए। 

इस दौरान, कई ऐसी सेहतमंद चीजें हैं, जैसे कि पपीता और पाइनएप्पल जो विटामिन सी से भरपूर होते हैं, इन्हें महिलाओं को खाने से मना किया जाता है। वहीं, इस तरह की स्थिति में कई महिलाओं के मन में सवाल उठता है, कि क्या गर्भावस्था के दौरान नारियल का सेवन किया जा सकता है? दरअसल, अगर आपके मन में भी इस तरह का कोई सवाल उठता है, तो हाँ गर्भावस्था के दौरान नारियल का सेवन किया जा सकता है। इसका सेवन करने के कई फायदे हो सकते हैं, जिस में शरीर में एनीमिया की कमी को दूर करना, यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन की परेशानी को खत्म करना, मोर्निंग सिकनेस और ब्लड सर्कुलेशन की समस्या के जोखिम को कम करना शामिल हो सकते हैं। आइये इस लेख के माध्यम से इस के बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

क्या प्रेगनेंसी में नारियल का सेवन किया जा सकता है? 

दरअसल, डॉक्टर के अनुसार गर्भवती महिलाएं नारियल का सेवन कर सकती हैं, क्योंकि यह माँ और बच्चे दोनों की सेहत के लिये काफी ज्यादा फायदेमंद साबित होते हैं। आम तौर पर, नारियल में कई तरह के डायट्री फाइबर, पोटेशियम, सोडियम और कैल्शियम जैसे पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जो शरीर में एनीमिया की परेशानी को कम करने में काफी ज्यादा सहायता प्रदान करते हैं। इसके अलावा, यह आयरन का भी काफी अच्छा सोर्स माना जाता है, जो माँ और बच्चे की सेहत को बेहतर रखता है। 

गर्भावस्था के दौरान नारियल का सेवन करने से सेहत को होने वाले फायदे

प्रेगनेंसी में नारियल खाने से एक महिला को कई तरह के फायदे प्राप्त हो सकते हैं, जिसमें से कुछ निम्नलिखित अनुसार हो सकते हैं: 

  1. दरअसल, रोजाना नारियल का सेवन एक महिला के शरीर में एनीमिया की कमी को दूर करता है। इसके अलावा, गर्भावस्था के दौरान बहुत सी महिलाओं के शरीर में खून की कमी हो जाती है, तो ऐसे में सीमित मात्रा में नारियल का सेवन करना शरीर के लिए काफी ज्यादा फायदेमंद हो सकता है। 
  2. आम तौर पर, इस दौरान नारियल का सेवन करने पर गर्भावस्था के दौरान होने वाली यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन से काफी ज्यादा राहत प्राप्त होती है। 
  3. नारियल का सेवन गर्भावस्था के दौरान होने वाले मोर्निंग सिकनेस और ब्लड सर्कुलेशन जैसी समस्या को दूर करने में काफी ज्यादा सहायता प्रदान करता है। इसके साथ ही, यह प्रेगनेंसी में ज्यादातर महिलाओं को होने वाली पैरों में सूजन की परेशानी को भी कम करने में मदद करते हैं। 
  4. दरअसल, पेट से जुड़ी कई तरह की समस्याओं को भी कम करने के लिए नारियल का सेवन सबसे ज्यादा अच्छा माना जाता है। 
  5. इसके साथ ही, गर्भावस्था के दौरान बहुत सी महिलाओं को होने वाली कब्ज की शिकायत को भी कम करने में नारियल का सेवन काफी फायदेमंद होता है। 

निष्कर्ष: दरअसल, डॉक्टरों द्वारा गर्भवती महिलाओं को अपनी सेहत और खान -पान का विशेष ध्यान रखने की काफी ज्यादा जरूरत होती है। क्योंकि, इस दौरान माँ और बच्चे दोनों की सेहत काफी ज्यादा नाजुक होती है, इसलिए इस दौरान खाने पीने का विशेष ध्यान रखने की सलाह प्रदान की जाती है। गर्भावस्था के दौरान महिलाएं कई तरह की सेहतमंद चीजों का सेवन कर सकती हैं, बजाए पपीता और पाइनएप्पल के। गर्भावस्था के दौरान नारियल का सेवन किया जा सकता है। प्रेगनेंसी में नारियल का सेवन करने से सेहत को कई तरह के लाभ प्राप्त हो सकते हैं, जिसमें मोर्निंग सिकनेस और ब्लड सर्कुलेशन की समस्या के जोखिम को कम करना, शरीर में एनीमिया की कमी को दूर करना, यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन की परेशानी को खत्म करना और पेट में होने वाली परेशानियों को खत्म करना जैसे लाभ शामिल होते हैं। इस दौरान किसी भी तरह की समस्या होने पर आपको तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने और गर्भावस्था के दौरान किसी भी तरह की समस्या का समाधान पाने के लिए आप आज ही अमेरिटस हॉस्पिटल में जाकर इस के विशेषज्ञों से इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। 

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गर्भावस्था के दौरान कीवी का सेवन करने से क्या- क्या फायदे मिल सकते हैं? कितनी मात्रा में खाना चाहिए? डॉक्टर से जानें!

वैसे तो, सभी लोगों को अपनी रोजाना की डाइट का ख्याल रखना बहुत ही ज्यादा जरूरी होता है, पर गर्भवती महिलाओं को इस पर अपना विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है, क्योंकि खराब डाइट माँ और बच्चे दोनों की सेहत पर बुरा प्रभाव डाल सकती है। दरअसल, इस तरह की स्थिति में महिला को अपना और अपने बच्चे की सेहत का विशेष ध्यान रखने की जरूरत होती है। इसलिए, ज्यादातर महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान कई तरह के फलों का सेवन करने की सलाह प्रदान की जाती है। जिस में कीवी का सेवन करना काफी ज्यादा लाभदायक माना जाता है। दरअसल, कीवी में विटामिन ए, विटामिन सी, प्रोटीन, फोलेट, फाइबर, आयरन, पोटैशियम और एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे कई तरह के पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जिससे गर्भवती महिलाओं को कई तरह के फायदे प्राप्त हो सकते हैं, जिसमें इम्यूनिटी मजबूत होना, डायबिटीज कंट्रोल होना, गर्भ में पल रहे बच्चे का तेजी से विकास होना, एनीमिया जैसी समस्या से छुटकारा मिलना और पाचन को सेहतमंद रखना जैसे कई तरह के लाभ शामिल होते हैं। आम तौर पर, कीवी का रोजाना और नियमित सेवन करने से गर्भवती महिलाओं और गर्भ में पल रहे बच्चे दोनों की सेहत बनी रहती है। आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में इस के डॉक्टर से और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

गर्भावस्था के दौरान कीवी करने से मिलने वाले फायदे 

दरअसल, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि गर्भावस्था के दौरान कीवी का सेवन करना बहुत ही ज्यादा लाभदायक सिद्ध होता है। नियमित कीवी का सेवन करने से गर्भवती महिलाओं को कई तरह के फायदे प्राप्त हो सकते हैं, जिसमें से कुछ निम्नलिखित अनुसार हो सकते हैं, जैसे कि 

  1. इम्यूनिटी मजबूत होना 

दरअसल, गर्भावस्था के दौरान कीवी फल का सेवन महिलाओं की इम्यूनिटी को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। आम तौर पर, कीवी में विटामिन-सी और एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे कई तरह के पोषक तत्व भरपूर मात्रा में मौजूद होते हैं, जो इम्यून सिस्टम को मजबूत करने में काफी ज्यादा सहायता प्रदान करते हैं। दरअसल, रोजाना कीवी का सेवन आपको कई तरह की समस्याओं से बचा सकता है। 

  1. गर्भ में पल रहे बच्चे का अच्छे से विकास होना 

आम तौर पर, कीवी में फोलिक एसिड भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो गर्भ में पल रहे बच्चे का विकास करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दरअसल, यह शरीर में कोशिकाओं का निर्माण करने के साथ -साथ दिमाग और तंत्रिका तंत्र का भी विकास करने में काफी ज्यादा सहायता प्रदान करते हैं। आम तौर पर, इसके नियमित सेवन से गर्भवती महिला के पेट में पल रहे बच्चे के कई महत्वपूर्ण अंगों का विकास होता है। इसके अलावा, यह गर्भपात के खतरे को भी कम करने में काफी ज्यादा सहायता प्रदान करता है। 

  1. पाचन तंत्र को सेहतमंद रखना 

दरअसल, गर्भावस्था के दौरान कीवी फल का सेवन करने से एक सेहतमंद पाचन प्रणाली को बनाए रखने में काफी ज्यादा सहायता प्राप्त होती है। आम तौर पर, इस फल में फाइबर जैसे गुण भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो गर्भावस्था के दौरान महिला की पाचन क्रिया को मजबूत करने में मदद करते हैं। इसके अलावा, इसके रोजाना सेवन से कब्ज, दस्त, सूजन, मतली और पेट में होने वाले दर्द से छुटकारा मिलता है। 

  1. एनीमिया से छुटकारा मिलना 

हालांकि, आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि गर्भावस्था के दौरान ज्यादातर महिलाओं को एनीमिया और कैल्शियम की कमी जैसी कई समस्यायों का सामना करना पड़ता है। इस तरह की स्थिति में, कीवी फल का सेवन करना उनके लिए काफी ज्यादा लाभदायक साबित हो सकता है। कयोंकि, कीवी में आयरन भरपूर मात्रा में पाया जाता है, जो शरीर में हीमोग्लोबिन के स्तर को बढ़ान में काफी ज्यादा सहायता प्रदान करता है। इससे गर्भवती महिला को कई फायदे मिलते हैं, जिसमें खून की कमी दूर होना और शरीर में ऊर्जा का स्तर बढ़ना शामिल होता है। 

गर्भावस्था के दौरान कितनी मात्रा में कीवी का सेवन किया जा सकता है?

दरअसल, डॉक्टर के अनुसार गर्भावस्था के दौरान रोजाना 1 से 2 कीवी का सेवन आराम से किया जा सकता है। इससे महिलाओं को कई तरह के फायदे प्राप्त हो सकते हैं। पर अगर आप इस तरह की स्थिति में, किसी गंभीर समस्या का सामना कर रही हैं, तो इसका सेवन करने से पहले एक बार अपने डॉक्टर से जरूर संपर्क करें। 

निष्कर्ष:

डॉक्टरों द्वारा, गर्भावस्था के दौरान ज्यादातर महिलाओं को अपनी हेल्थ का ध्यान रखने के लिए हेल्दी डाइट के साथ रोज फल खाने की सलाह दी जाती है। फलों में कीवी का सेवन गर्भवती महिलाओं और गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए काफी ज्यादा लाभदायक माना जाता है। इसके सेवन से कई फायदे प्राप्त होते हैं, जिसमें इम्यूनिटी मजबूत होना, डायबिटीज कंट्रोल होना, गर्भ में पल रहे बच्चे का तेजी से विकास होना और एनीमिया जैसी समस्या से छुटकारा मिलना शामिल होता है। गर्भावस्था के दौरान रोजाना 1 से 2 कीवी का सेवन किया जा सकता है। गंभीर समस्या होने पर आपको इसका सेवन करने से पहले तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए। अगर आपको भी इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करनी है, या फिर आप इस दौरान किसी गंभीर समस्या का सामना कर रहीं हैं और आप इसका समाधान चाहती हैं, तो आप आज ही अमेरिटस हॉस्पिटल में जाकर इसके विशेषज्ञों से जानकारी ले सकती हैं।

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असामान्य गर्भाशय रक्तस्राव क्या होता है? डॉक्टर से जानें इसके कारण और उपचार के बारे में

दरअसल, इस बात से कोई भी अनजान नहीं है, कि मासिक धर्म चक्र सभी महिलाओं में 11से 12 वर्ष की आयु से लेकर लगभग 50 वर्ष की आयु तक रहता है। आम तौर पर, 40 की उम्र में महिलाओं को कभी-कभी असामान्य रक्तस्राव जैसी समस्या हो सकती है। दरअसल, अगर मासिक धर्म में यह अनियमितता लगातार बनी रहती है, तो यह एक चिंता का विषय हो सकता है, जिसके लिए तुरंत स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह लेना बहुत ही ज्यादा जरूरी होता है। हालांकि, रक्तस्राव के दिनों की गिनती में काफी ज्यादा बढ़ोतरी हो सकती है। इसके साथ ही, क्लॉट के साथ भारी ब्लीडिंग, दर्द या फिर अनियमित ब्लीडिंग जैसी समस्या हो सकती है। असल में, महिलाओं में 7 दिनों तक मासिक धर्म का रक्तस्राव होना एक आम बात होती है। 

आम तोर पर, अब सवाल यह है, कि आखिर असामान्य गर्भाशय रक्तस्राव क्या होता है? तो असामान्य रक्तस्राव जैसी समस्या तब होती है, जब मासिक धर्म चक्र नियमित नहीं होता है, रक्तस्राव नॉर्मल से बहुत ज्यादा होता है, यानी कि चक्र 35 दिनों से ज़्यादा या फिर 21 दिनों से कम होता है, तो इस को असामान्य माना जाता है। इस तरह की स्थिति में, क्तस्राव का पैटर्न बिलकुल बदल जाता है। इसके कारणों में, किसी विशेष हार्मोन का काफी ज्यादा या फिर बहुत कम उत्पादन होना और गर्भावस्था से जुड़े कारण शामिल हो सकते हैं। अगर समय रहते इस समस्या का उचार न किया जाये, तो यह समस्या आगे चलकर काफी ज्यादा परेशान कर सकती है। दरअसल इसका उपचार कई कारणों पर निर्भर कर सकता है। आइये इस लेख के माध्यम से इस के डॉक्टर से इस के बारे में और विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

सामान्य मासिक धर्म चक्र क्या होता है?

आपकी जानकारी के लिए आपको बता दें, कि सामान्य मासिक चक्र वो होता है, जो हर 28 से 35 दिनों के अंदर महिअलों को आता है और इसके साथ ही लगभग 7 से 8 दिनों तक चलता है। इसके अलावा, सामान्य मासिक धर्म चक्र के दौरान दर्द या फिर क्लॉट्स जैसी समस्या नहीं होती है। दरअसल, दो हार्मोन एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन, जो मासिक धर्म चक्र के दौरान, गर्भाशय की परत (एंडोमेट्रियम) पर काम कर उसे बढ़ने में सहायता प्रदान करते हैं। आम तौर पर, एक औसत मासिक चक्र लगभग 28 दिनों तक का होता है। हालांकि, यह छोटा भी हो सकता है और लंबा भी हो सकता है। 

असामान्य रक्तस्राव के कारण:

  1. दरअसल, इस तरह की स्थिति, तब उत्पन्न हो सकती है, जब शरीर किसी विशेष हार्मोन का बहुत ज्यादा या बहुत कम उत्पादन करने लगता है। 
  1. गर्भनिरोधक तरीकों से जुड़ी समस्याएं, जैसे कि इंट्रा यूटेराइन डिवाइस या फिर गर्भनिरोधक गोलियां। 
  1. गर्भावस्था से जुड़े कारण भी असामान्य रक्तस्राव का कारण बन सकते हैं। 
  1. इसके कारणों में गर्भाशय का कैंसर या फिर ट्यूमर भी शामिल हो सकता है। 

असामान्य रक्तस्राव का उपचार:

आम तौर पर, असामान्य रक्तस्राव का उपचार असल में, कई कारकों पर निर्भर करता है, जिस में समस्या का कारण, महिलाओं की उम्र, रक्तस्राव की गंभीरता और साथ में, भविष्य में गर्भधारण की इच्छा शामिल होती है। असामान्य रक्तस्राव के उपचारों में, निम्नलिखित विकल्प शामिल हो सकते हैं, जैसे कि 

  1. दवाओं या फिर सर्जरी के माध्यम से असामान्य रक्तस्राव जैसी समस्या का इलाज किया जा सकता है। और इसके साथ ही, दवा का असर महसूस होने में कुछ पीरियड्स चक्र लग सकते हैं।
  1. दरअसल, उपचार की पहली लाइन नॉन-हार्मोनल दवाएं को माना जाता है, जो आम तौर पर, पीरियड्स के दौरान दर्द और ब्लीडिंग को कम करने में काफी ज्यादा सहायता प्रदान करते हैं। 
  1. दरअसल, एंडोमेट्रियल हाइपरप्लासिया जैसी गंभीर समस्या को रोकने और इसका इलाज करने में प्रोजेस्टेरोन हार्मोन काफी ज्यादा सहायता करता है। 
  1. अगर दवाओं से किसी भी तरह का कोई फायदा नहीं मिलता है, तो इस दौरान सर्जरी का सहारा लिया जा सकता है। 
  1. दरअसल, इस तरह की स्थिति में हार्मोन उपचार से रक्तस्राव को कंट्रोल करने में कुछ महीनों का समय लग सकता है। 

असामान्य रक्तस्राव के लक्षण 

  1. सेक्स के बाद रक्तस्राव जैसी समस्या होना। 
  2. एक महिला को मासिक धर्म के बीच रक्तस्राव होना। 
  3. मासिक धर्म चक्र के दौरान, महिला को कभी भी रक्तस्राव होना। 
  4. आम से ज्यादा और लम्बे समय तक रक्तस्राव जैसी समस्या बनी रहना। 
  5. किसी महिला को तीन नॉर्मल साइकिल या फिर छह महीनों तक पीरियड न आना

निष्कर्ष:  जब मासिक धर्म चक्र नियमित नहीं होता है, रक्तस्राव नॉर्मल से बहुत ज्यादा होता है, यानी कि चक्र 35 दिनों से ज़्यादा या फिर 21 दिनों से कम होता है, तो इस को असामान्य गर्भाशय रक्तस्राव कहा जाता है। इसके कारणों में, गर्भाशय का कैंसर या फिर ट्यूमर आदि शामिल हो सकता है। असामान्य रक्तस्राव का उपचार असल में, कई कारकों पर निर्भर करता है, जिस में समस्या का कारण, महिलाओं की उम्र, रक्तस्राव की गंभीरता आदि शामिल होती है। अगर आपको भी असामान्य रक्तस्राव जैसी कोई समस्या है और इसका समाधान चाहती हैं, तो आप आज ही अमेरिटस अस्पताल में जाकर इसके विशेषज्ञों से इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकती हैं।

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क्या महिलाओं की उम्र बढ़ने के साथ-साथ पीरियड का दर्द भी बढ़ जाता है? जानें डोक्टोर से

दरअसल, सभी महिलाओं को हर महीने पीरियड्स जैसी स्थिति से गुजरना पड़ता है। आपको बता दें, कि इस तरह की स्थीति में सभी महिलाओं को काफी ज्यादा दर्द और क्राप्स जैसी समस्या से गुजरना पड़ता है। लगभग सभी महिलाएं इस तरह की स्थिति का अनुभव करती हैं। दरअसल, महिअलों में यह स्थिति एक उम्र के बाद ही शुरू होती है। आम तौर पर, यह सोचकर अकसर बहुत सारी महिलाओं को काफी ज्यादा हैरानी होती है, कि जैसे-जैसे उनकी उम्र में बढ़ोतरी होती है, उसी तरह पीरियड्स के साथ जुड़े उनके अनुभव भी काफी ज्यादा बदलने लगते हैं। आम तौर पर, इस तरह की स्थिति में कई महिलाओं को लगता है, कि उनका पीरियड्स यानी मासिक धर्म हल्का और काफी ज्यादा आसान हो गया है, तो उसी तरह, इस दौरान कई महिलाओं को लगता है, कि उनके पीरियड्स में दर्द और परेशानी काफी ज्यादा बढ़ गयी है। पर, क्या सच में ऐसा होता है? क्या महिलाओं की उम्र बढ़ने के साथ-साथ पीरियड के दर्द और परेशानी में बढ़ोतरी होती है, या फिर यह एक सिर्फ मिथक की तरह है? इस तरह के सवाल हर उस महिला के मन में उठते हैं, जो आमतौर पर, 25 से 35 की उम्र के बाद भी पीरियड्स जैसी स्थिति में, काफी ज्यादा तेज दर्द, क्रैम्प्स, मांसपेशियों में खिंचाव और काफी ज्यादा ब्लीडिंग होना जैसी स्थिति को महसूस करती हैं। तो आइये इस लेख माध्यम से इसके बारे में इसके डॉक्टर से विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं, कि क्या सच में महिलाओं की उम्र बढ़ने के साथ पीरियड के दर्द में भी बढ़ोतरी होती है?

क्या पीरियड का दर्द उम्र के साथ बढ़ जाता है?

डॉक्टर के अनुसार, गर्भाशय की मांसपेशियों में संकुचन की वजह से महिलाओं को पीरियड के दौरान दर्द होता है। आपको बता दें, कि पीरियड के दौरान महिला का शरीर एक तरीके से केमिकल को छोड़ता है, जो गर्भाशय से खून और टिश्यू निकालता है। अगर, किसी महिला के शरीर में इस केमिकल की मात्रा काफी ज्यादा हो जाती है, तो वह पीरियड्स के दौरान काफी ज्यादा दर्द महसूस करती है। 

दरअसल, कई महिलाओं में यह देखने को मिलता है, कि 30 की उम्र के बाद उनके पीरियड, पहले से ज्यादा दर्दनाक हो गए हैं। दरअसल, इस पर डॉक्टर का कहना है, कि एक महिला की उम्र बढ़ने के साथ पीरियड का दर्द बढ़ सकता है, पर यह अक्सर आम नहीं होता है। आम तौर पर, बहुत बार इसका कारण एक महिला के शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव या फिर कुछ बीमारियां भी हो सकती हैं। यानी कि दूसरे शब्दों में, इस तरह की स्थिति के दौरान दर्द का बढ़ना एक संकेत भी हो सकता है, कि उसके शरीर में इसे कई बदलाव हो रहे हैं, जिन पर उसका ध्यान देना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण है। जैसे कि 

  1. हार्मोनल असंतुलन के कारण गर्भाशय में सूजन और क्रैम्प्स बढ़ना। 
  2. 25 से 35 की उम्र में एंडोमेट्रियोसिस के लक्षण दिखने पर गर्भाशय की परत जैसी कोशिकाओं का दूसरी जगह बढ़ना और तेज दर्द होना। 

निष्कर्ष

उम्र बढ़ने के साथ पीरियडस के दर्द में बढ़ोतरी होना एक आम बात नहीं होती है, बल्कि, यह कई बार किसी छिपी बीमारी का संतत भी हो सकती है। दर्द बढ़ने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें, क्योंकि सही समय पर मिलने वाला इलाज दर्द और फर्टिलिटी को सुरक्षित रखता है। अगर आपको भी उम्र बढ़ने के साथ पीरियडस में काफी ज्यादा दर्द का अनुभव होता है और आप इसका इलाज चाहती हैं, तो आप आज ही अमेरिटस हॉस्पिटल में जाकर इसके विशेष्ज्ञों से जानकारी ले सकती हैं।

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क्या विटामिन-ई कैप्सूल का सेवन गर्भावस्था के दौरान किया जा सकता है? जानें डॉक्टर से

दरअसल, गर्भावस्था के दौरान एक महिला की अच्छे तरीके से देखभाल करना बहुत ही ज्यादा जरूरी होता है। गर्भावस्था के दौरान होने वाली माँ और बच्चे दोनों के लिए पोषण की काफी ज्यादा जरूरत होती है। आपको बता दें कि अलग-अलग प्रकार के पोषक तत्व न सिर्फ एक माँ की सेहत को बेहतर बनाने का काम करते हैं, बल्कि गर्भ में पल रहे बच्चे के विकास में भी एक महत्वपूर्ण भूमिका को निभाते हैं। दरअसल, गर्भावस्था के आम दिनों में, अक्सर जो महिलाएं सप्लीमेंट, प्रोटीन और विटामिन्स का सेवन करती हैं, आम तौर पर, उनको गर्भावस्था के दौरान इन सप्लीमेंट का सेवन करना चाहिए या नहीं, दरअसल इस तरह की स्थिति को लेकर सभी महिलाओं में एक चिंता जैसी स्थिति बनी रहती है। आम तौर पर, इन्हीं चिंताओं में से एक, क्या विटामिन-ई के कैप्सूल का सेवन करना, गर्भावस्था के दौरान सुरक्षित होता है? तो आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में इस के डॉक्टर से विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

क्या गर्भावस्था के दौरान विटामिन-ई के कैप्सूल लेना सुरक्षित है?

आम तौर पर, गर्भावस्था के दौरान विटामिन-ई के कैप्सूल लेना सुरक्षित होता है, या नहीं, इसके बारे में डॉक्टर का कहना है, कि गर्भावस्था के दौरान एक महिला के शरीर में विटामिन-ई की जरूरत को पूरा करना बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। इसलिए, गर्भावस्था के दौरान सभी महिलाएं, बिना किसी डर और संकोच के विटामिन-ई के कैप्सूल को खा सकती हैं। असल में, इस तरह की स्थिति में, डॉक्टर के द्वारा एक गर्भवती महिला को तीसरे महीने के बाद ही विटामिन-ई के कैप्सूल का सेवन करने की सलाह प्रदान की जाती है। आम तौर पर, जो शरीर की कोशिकाओं को होने वाले नुकसान से बचाता है, विटामिन ई कैप्सूल में एक ऐसा ही एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है। गर्भावस्था के दौरान, विटामिन-ई के कैप्सूल का सेवन करने से एक महिला को कई तरह के लाभ मिलते हैं, जैसे कि इससे महिलाओं की त्वचा, बाल और स्किन बेहतर बने रहते हैं। आम तौर पर, स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान महिलाओं का शरीर काफी ज्यादा कमजोर और सेंसिटिव होता है, इसलिए विटामिन-ई कैप्सूल को खाने से पहले एक बार अपने डॉक्टर की सलाह जरूर लें। गर्भावस्था के दौरान, किसी भी प्रकार के दर्द और स्किन सेंसिटिविटी जैसी स्थिति होने पर, महिलाओं को विटामिन-ई कैप्सूल का सेवन नहीं करना चाहिए।

निष्कर्ष

गर्भावस्था के दौरान होने वाली माँ और बच्चे दोनों के लिए पोषण की काफी ज्यादा जरूरत होती है। गर्भावस्था के दौरान एक महिला के शरीर में विटामिन-ई की जरूरत को पूरा करना महत्वपूर्ण होता है। इसलिए, गर्भावस्था के दौरान सभी महिलाएं, बिना किसी संकोच के विटामिन-ई के कैप्सूल का सेवन कर सकती हैं। गर्भावस्था के दौरान महिलाओं का शरीर कमजोर और सेंसिटिव होता है, इसलिए, विटामिन-ई कैप्सूल को खाने से पहले एक बार अपने डॉक्टर की सलाह जरूर लें। अगर आपको भी इस दौरान किसी समस्या का सामना करना पड़ रहा है और आप इसका समाधान चाहते हैं, तो आप आप ही अमेरिटस हॉस्पिटल के विशेष्ज्ञो के साथ सपर्क कर सकते हैं।

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ओव्यूलेशन के बाद अंडा कितने दिन तक जीवित रहता है? डॉक्टर से जानें इसके कितने दिन बाद ठहरता है, गर्भ

आपको बता दें कि ओवुलेशन, सभी महिलाओं के शरीर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव होता है, जिसमें आम तौर पर, एक माहिला के लिए गर्भधारण करने के मोके सबसे ज्यादा मौजूद होते हैं। आम तौर पर, इस तरह की स्थिति में, अगर कोई जोड़ा बच्चा पैदा करने की कामना करता है, तो इस दौरान, अगर वह आपस में सबंध बनाते हैं और वह इस पड़ाव को बिलकुल सही तरीके से पूरा करते हैं, तो इस दौरान, सफलतापूर्ण एक महिला के गर्भधारण हो सकता है। पर आपको इसके बारे में बता दें, कि कई आम लोगों में, बाकी लोगों के मुकाबले ओवुलेशन जैसी स्थिति को लेकर समझ काफी ज्यादा कम होती है। आम तौर पर, इसके कारण ही कई बार व्यक्ति जानकर भी सफलतापूर्वक गर्भधारण नहीं कर पाता है। इस तरह की स्थिति में कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है, कि आखिर ओव्यूलेशन के बाद अंडा कितने दिन तक जीवित रहता है और इसके कितने दिन बाद महिला प्रेग्नेंट होती है? तो आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में इस के डॉक्टर से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

ओव्यूलेशन कितने घंटे तक रहता है और इसके बाद कब तक अंडा जीवित रहता है?

आपको बता दें, कि ओव्यूलेशन आम तौर पर, सिर्फ थोड़े वक्त तक के लिए ही होता है जो लगभग 12 से 24 घंटे तक रहता है, जिसके दौरान, अंडाशय से एक अंडा निकलता है। लगभग 12 से 24 घंटे तक अंडा, इस रिलीज के बाद, फर्टिलाइजेशन के लिए जीवित रहता है, जिस से आम तौर पर, गर्भधारण करने के लिए, ओव्यूलेशन का समय बहुत ही ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। आम तौर पर, अगर इस समय के दौरान महिला प्रजनन पथ में शुक्राणु की मौजूदगी होती है, तो इस तरह की स्थिति में, निषेचन यानी कि गर्भ धारण हो सकता है। आपको बता दें कि अगर, ओव्यूलेशन के बाद, निषेचन की प्रक्रिया सफलतापूर्वक हो जाती है, तो इस दौरान एक महिला में गर्भधारण की प्रक्रिया शुरू हो सकती है। इस तरह की प्रक्रिया ओव्यूलेशन के कुछ दिनों के भीतर शुरू हो सकती है, क्योंकि आम तौर पर एक महिला के शरीर में, 5 दिनों तक शुक्राणु जिन्दा रह सकते हैं। यह एक महिला की गर्भावस्था को संभव बनाता है, चाहें अंडे के निकलने से पहले संभोग की प्रक्रिया हुई हो। आपको बता दें कि जबकि अंडे का जीवनकाल काफी ज्यादा छोटा होता है, पर फिर भी गर्भधारण का समय ओव्यूलेशन से पहले और बाद में कई दिनों तक चलता रहता है। जो आम तौर पर, कंसीव करने की कोशिश कर रही महिलाओं के लिए इस समय को समझने के महत्व पर काफी ज्यादा जोर देता है।

ओव्यूलेशन के बाद अंडा कितने समय तक जीवित रहता है?

आपको बता दें, कि ओव्यूलेशन के बाद अंडा 12 से 24 घंटे तक जिन्दा रहता है। आम तौर पर, अगर इस समय के अंदर इस को उपजाऊ नहीं बनाया जाएगा, तो यह एक महिला की माहवारी के दौरान खराब हो जाएगा और गिर जाएगा। आम तौर पर, इसलिए अगर आप गर्भवती होने की कोशिश कर रही हैं, तो आपको इस समय के दौरान विशेष ध्यान केंद्रित करने की काफी ज्यादा जरूरत होती है। 

ओव्यूलेशन के कितने दिन बाद एक महिला के गर्भधारण होता है?

आम तौर पर, अगर एक शुक्राणु ओव्यूलेशन के 12 से 24 घंटे के अंदर अंडे को निषेचित करता है, तो एक महिला का सफलतापूर्वक गर्भधारण हो सकता है। बता दें कि इसके बाद फिर फर्टिलाइज्ड अंडा फैलोपियन ट्यूब से नीचे की तरफ गति करता है और बच्चेदानी के अंदर प्रत्यारोपित हो जाता है, जो आम तौर पर, गर्भधारण करने के 6 से 10 दिन बाद होता है। 

निष्कर्ष

ओवुलेशन, सभी महिलाओं के शरीर का एक महत्वपूर्ण पड़ाव होता है, जिस में एक महिला के प्रेग्नेंट होने के मौके ज्यादा होते हैं। ओव्यूलेशन के बाद अंडा 12 से 24 घंटे तक जिन्दा रहता है। अगर एक शुक्राणु ओव्यूलेशन के 12 से 24 घंटे के अंदर अंडे को निषेचित करता है, तो एक महिला का सफलतापूर्वक गर्भधारण हो सकता है। यहां पर, ध्यान देने वाली बात यह है, कि हर महिला का चक्र अलग होता है, और इसके साथ ही ओव्यूलेशन और निषेचन का सही वक्त भी काफी ज्यादा अलग-अलग हो सकता है। इसलिए अपने लिए इस प्रक्रिया को तय न समझें। ओव्यूलेशन से लेकर गर्भावस्था तक की प्रक्रिया को बेहतर ढंग से समझने के लिए आप अपने डॉक्टर से संपर्क कर सकते हैं। अगर आप को भी इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करती है, या फिर आप इसके लिए एक अच्छे डॉक्टर की तलाश कर रहे हैं, तो आप आज ही अमेरिटस हॉस्पिटल में जाकर अपनी अपॉइंटमेंट को बुक करवा सकते हैं, और इसके विशेषज्ञों से इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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क्या गर्भावस्था के शुरुआती दिनों में ऐंठन होना आम बात है? डॉक्टर से जानें इसके कारण?

शादी के बाद माँ बनना हर लड़की का एक सपना होता है और माँ बनने के इस सफर में उनको कई तरह की समस्यायों का सामना करना पड़ता है। जैसे कि एक महिला को गर्भावस्था के शुरुआती दौर में कई ऐसी समस्यायों का सामना करना पड़ता है, जिनको एक आम इंसान नहीं झेल सकता। आम तौर पर, इन समस्याओं में उल्टी, जी मिचलाना, चक्कर आना, बार-बार मूड बदलना, पेट फूलना, अनिद्रा जैसी कई समस्याएं शामिल होती हैं। 

यहाँ तक कि इन दिनों हल्की स्पॉटिंग जैसी समस्या भी बहुत सारी महिलाओं को होती है। इस अवस्था के दौरान, ऐसा भी देखा गया है, कि बहुत सारी महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान पेट में ऐंठन जैसी समस्या भी महसूस होती है, हालांकि इस दौरान एक महिला के पेट में ऐंठन होना कोई आम बात नहीं होती है। आम तौर पर, इसलिए इस तरह की स्थिति में, यह जान लेना बहुत ही ज्यादा जरूरी होता है, कि क्या हर महिला को गर्भावस्था के शुरुआती दौर में पेट में ऐंठन जैसी कोई समस्या होती है और अगर यह होती भी है, तो क्या इसे एक आम समस्या माना जा सकता है? तो आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में इस के डॉक्टर से विस्तार से जानकारी प्राप्त करते हैं।

क्या अर्ली प्रेगनेंसी में ऐंठन होना आम बात है?

दरअसल, गर्भावस्था के दौरान एक महिला कई तरह के बदलावों से गुज़रती है और इस दौरान हार्मोनल बदलाव होना एक आम बात है। इस बात का ध्यान रखें, कि इस तरह की स्थिति में, भ्रूण का विकास हो रहा होता है, इसलिए गर्भवती महिअलों के शरीर में उतार चढ़ाव होना स्वाभाविक होता है। इस तरह की स्थिति में, महिअलों का मूड भी बार बार बदलता रहता है 

आम तौर पर, जहां तक सवाल उठता है कि क्या गर्भावस्था के शुरुआती दौर में किसी महिला को पेट में ऐंठन हो सकती है और  होना आम बात है? तो इस पर डॉक्टर का कहना है, कि हाँ, बहुत सारी महिलाओं को गर्भावस्था के शुरुआती दौर में पेट में ऐंठन जैसी समस्या का एहसास हो सकता है। हालांकि यह भी जरूरी नहीं है, कि सभी गर्भवती महिलाओं के साथ ऐसा हो। वैसे तो, गर्भावस्था के दौरान पेट में ऐंठन की समस्या, हार्मोनल बदलावों और गर्भाशय के फैलाव की वजह से होती है, पर आम तौर पर, अगर कोई महिला इस तरह की समस्या से लंबे समय से जूझ रही है, तो उसे इस परेशानी को लेकर बैठे रहना नहीं चाहिए, बल्कि तुरंत डॉक्टर इसका इलाज करवाना चाहिए। 

गर्भावस्था के शुरुआती दिनों में पेट में ऐंठन के कारण

  1. इंप्लांटेशन: दरअसल, इस दौरान एक महिला के गर्भधारण के 6 से 12 दिनों के भीतर, अंडे निषेचित होकर महिला की गर्भाशय की दीवार से जुड़ जाते हैं। आम तौर पर इस तरह की स्थिति में, एक महिला को पेट में ऐंठन जैसी समस्या हो सकती है, हालांकि यह एक महिला के लिए आम दर्द होता है। 
  2. गर्भाशय का फैलना : अमेरिकन प्रेगनेंसी एसोसिएशन के अनुसार, महिला के शरीर में सबसे ज़्यादा हार्मोनल बदलाव उसकी गर्भावस्था की शुरुआत में होते हैं। और गर्भावस्था के शुरूआती तीन महीनों के बाद, गर्भाशय का आकार बड़ा होने लग जाता है। इस तरह की स्थिति में दबाव के कारण पेट में ऐंठन जैसी समस्या हो सकती है। 

कब जाए डॉक्टर के पास

सभी महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान शरीर में होने वाले बदलावों पर कड़ी नज़र रखनी चाहिए। अगर किसी महिला को गर्भावस्था जैसी स्थिति में, पेट में ऐंठन के साथ-साथ चक्कर आना, थकान, कमजोरी, बेहोशी जैसी समस्या का अनुभव हो, तो तुरंत डॉक्टर के साथ संपर्क करें।

निष्कर्ष

गर्भावस्था के दौरान, किसी भी महिला को लापरवाही नहीं बरतनी चाहिए। इस दौरान थोड़ी सी भी लापरवाही को बरतना सही नहीं होता है। डॉक्टर के अनुसार हाँ, बहुत सारी महिलाओं को गर्भावस्था के शुरुआती दौर में पेट में ऐंठन जैसी समस्या का एहसास हो सकता है। पर जरूरी नहीं है, कि ऐसा सभी को महसूस हो। अगर किसी महिला को इस तरह की समस्या लंबे समय तक बनी रहे, तो इंतज़ार न करें तुरंत डॉक्टर के पास जाएँ। अगर आपको भी इसके बारे में ज्यादा जानकरी प्राप्त करनी है, या फिर आपको भी गर्भावस्था के शुरूआती समय में पेट में ऐंठन जैसी समस्या या फिर इससे जुडी किसी और समस्या का सामना करना पड़ रहा है और आप इसका इलाज चाहते हैं, तो आप आज ही अमेरिटस हॉस्पिटल में जाकर अपनी अपॉइंटमेंट को बुक करवा सकते हैं और इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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क्या गर्भावस्था के दौरान, पेट में पल रहे बच्चे का वजन दूध पीने से बढ़ जाता है? विशेषज्ञों से जाने

गर्भावस्था एक माँ का सबसे बड़ा सपना होता है और इस दौरान कई चीज़ें ऐसी होती हैं, जो बहुत मुश्किल हो जाती हैं, जैसे इस दौरान महिला के लिए अपना खानपान सही रखना बहुत मुश्किल हो जाता है। अक्सर इस दौरान, मूड स्विंग्स के साथ-साथ अपने खान-पान को संतुलन में रखना एक बहुत ही बड़ी समस्या होती है। दरअसल, इस तरह की स्थिति में डॉक्टर के द्वारा बताए गए, डाइट चार्ट का पालन करना बहुत ही ज्यादा मुश्किल हो जाता है, जैसे कि डॉक्टर के द्वारा, रोजाना दूध पीने की सलाह प्रदान करना। आम तौर पर, एक महिला को गर्भावस्था के दौरान दूध पीने के लिए क्यों कहा जाता है? क्या रोजाना दूध का सेवन करने से माँ के गर्भ में पल रहे बच्चे का वजन बढ़ जाता है? और इस तरह की स्थिति में दूध पीने के क्या क्या फायदे होते हैं? तो आइये इस लेख के माध्यम से इसके बारे में इस के डॉक्टर से जानकारी प्राप्त करते हैं। 

क्या दूध का सेवन करने से गर्भ में पल रहे बच्चे का वजन बढ़ जाता है? 

हां, गर्भावस्था के दौरान, ऐसा हो सकता है, कि दूध का सेवन करने से गर्भ में पल रहे बच्चे का स्वस्थ विकास हो सकता है, पर यह असल में, गर्भ में पल रहे बच्चे के वजन को बढ़ाने का सीधा फॉर्मूला बिलकुल नहीं है। आपको बता दें, कि दूध में कैल्शियम, प्रोटीन, B12 और D जैसे महत्वपूर्ण विटामिन भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो आम तौर पर, एक बच्चे के विकास में महत्वपूर्ण योगदान प्रदान करते हैं। इसमें एक बच्चे की हड्डियों की मजबूती और मांसपेशियों का निर्माण शामिल होता है। आपको बता दें कि डॉक्टरों के अनुसार, गर्भावस्था के दौरान 1 से 2 सर्विंग दूध या फिर डेयरी उत्पाद शामिल करने से मां और गर्भ में पल रहे बच्चे दोनों के लिए लाभदायक और पोषण के साथ जुड़ी जरूरतों को पूरा करने में काफी ज्यादा मदद प्राप्त हो सकती है। 

गर्भावस्था में दूध पीने के फायदे 

गर्भावस्था के दौरान, दूध एक सम्पूर्ण आहार की तरह काम करता है। दरअसल, इसमें बहुत सारे विटामिन, प्रोटीन और मिनरल्स होते हैं, जो आम तौर पर गर्भावस्था के दौरान एक माँ को स्वस्थ रखने के साथ-साथ होने वाले बच्चे को भी सेहतमंद रखने में काफी ज्यादा मदद प्रदान करता है। आपको बता दें, कि यह शरीर के सभी अंगों को सेहतमंद बनाने में मदद प्रदान करने के साथ साथ कई तरह के लाभ पहुंचता है, जैसे कि 

  1. प्रोटीन का सोर्स है

प्रोटीन का एकमात्र सोर्स दूध को कहा जाता है, जो एक माँ को सेहतमंद रखने के साथ साथ बच्चे की हड्डियों और मांसपेशियों के निर्माण में सहायता प्रदान करता है। आपको बता दें कि गर्भावस्था के बाद भी दूध का सेवन हड्डियों की रिकवरी में काफी ज्यादा सहायता प्रदान करता है। इसके साथ ही, दूध में मौजूद प्रोटीन शरीर के सभी नसों, मांसपेशियों और टिशूज के लिए बहुत जरूरी होता है। 

  1. विटामिन डी से भरपूर

दूध में विटामिन डी भरपूर मात्रा में मौजूद होता है, जो असल में माँ और बच्चे दोनों के लिए काफी ज्यादा महत्वपूर्ण होता है। आपको बता दें कि विटामिन डी सेहतमंद हड्डियों को और कैल्शियम के अवशोषणों को बनाकर रखने में काफी ज्यादा मदद प्रदान करता है। गर्भावस्था के दौरान, विटामिन डी हार्मोनल सेहत को सेहतमंद बना के रखने के साथ-साथ गर्भ में पल रहे बच्चे के न्यूरल सेहत को सेहतमंद रखने में सहायता प्रदान करता है। 

निष्कर्ष: एक महिला के लिए उसका सबसे ज्यादा कीमती समय उसकी गर्भावस्था होती है, जिसमें कई चीज़ें ऐसी होती हैं, जो उसके लिए बहुत मुश्किल हो जाती हैं, जैसे कि इस दौरान अपने खानपान को सही रखना बहुत ही ज्यादा मुश्किल हो जाता है। इस दौरान वह डॉक्टर द्वारा बताई रोजाना दूध पीने की सलाह का भी पालन नहीं कर पाती हैं। गर्भावस्था के दौरान, दूध का सेवन, गर्भ में पल रहे बच्चे के वजन को बढ़ाने का सीधा फॉर्मूला बिल्कुल नहीं है, पर हाँ गर्भावस्था के दौरान, ऐसा हो सकता है, कि यह गर्भ में पल रहे बच्चे के स्वस्थ विकास को बड़ा सकता है। गर्भावस्था के दौरान, दूध का सेवन माँ और गर्भ में पल रहे बच्चे दोनों के लिए कई फायदों को प्रदान कर सकता है। अगर आपको भी इसके बारे में अधिक जानकारी प्राप्त करनी है या फिर गर्भावस्था के दौरान क्या खाना और क्या नहीं खाना चाहिए, बारे में जानना चाहते हैं, तो आप ही अमेरिटस अस्पताल में जाकर अपनी अपॉइंटमेंट को बुक करवा सकते हैं और इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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ज्यादा कॉफी पीने से पेट को कैसे नुकसान पहुंचता है, डॉक्टर से जानें

कॉफी असल में, दुनिया भर में सब से ज्यादा मशहूर पीने वाले पदार्थों में से एक है और यह आज की तेज़ रफ़्तार भरी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बन चिका है। द फॉल 2025 नेशनल कॉफी डेटा ट्रेंड्स रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में तो ज़्यादातर लोग कॉफी के ही दीवाने हैं। आम तौर पर सुबह की नींद खोलने से लेकर देर तक अपने ऑफिस में काम करने तक, कॉफी हमारी साथी बन चुकी है, दरअसल, कॉफी के बहुत सारे स्वास्थ्य फायदे हैं, लेकिन क्या अपने कभी इसके बारे में सोचा है, कि रोजाना काफी पीना, मतलब ज्यादा मात्रा में काफी पीना आपके पेट की परत के लिए कितना ज्यादा नुक्सान दायक हो सकता है? आज के इस लेख में हम, डॉक्टर से इसके बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे कि क्या सच में लोगों का ज्यादा कॉफी पीना उनके पेट की परत के लिए हानिकारक हो सकता है?

क्या सच में ज्यादा कॉफी पेट की परत को नुकसान पहुंचाती है? 

बेशक, कॉफी के बहुत सारे फायदे होते हैं, पर डॉक्टर के अनुसार बहुत ज्यादा कॉफी पीना पेट की परत के लिए हानिकारक साबित हो सकता है, जैसे कि, ज्यादा मात्रा में कॉफी पीने से पेट में जलन, एसिडिटी, गैस्ट्राइटिस, अपच या फिर दर्द जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। वास्तव में, कॉफी में मौजूद एक उत्तेजक तत्व, जिस को कैफीन के नाम से जाना जाता है, आम तौर पर यह एक व्यक्ति के पेट में गैस्ट्रिक एसिड के रिलीज को बढ़ाता है, जिसकी वजह से व्यक्ति के पेशाब में काफी ज्यादा बढ़ोतरी हो सकती है। आपको बता दें, कि जब यह एसिड काफी ज्यादा मात्रा में हमारे शरीर में बनने लगता है, तो इस की वजह से पेट की मुलायम परत को काफी ज्यादा नुकसान पहुंचाता है। इसके साथ ही, अगर हम कॉफी को खाली पेट पीते हैं, तो इसकी वजह से शरीर में पानी की कमी बढ़ सकती है, विशेष रूप से जब आपके शरीर में पहले से ही पानी की कमी मौजूद हो। 

हमारे लिए कितनी कॉफी पीना सुरक्षित हो सकता है?

दरसअल, डॉक्टर के अनुसार, हमारे लिए एक दिन में 200 से 300 मिलीग्राम कैफीन, इसका मतलब है, कि हमारे लिए कॉफी का सेवन लगभग 2 कप तक सुरक्षित रहता है। आपको बता दें कि अगर आप दिन में इससे ज्यादा मात्रा में कॉफी का सेवन करते हैं, तो इसकी वजह से आपके पेट पर ही नहीं, बल्कि इसकी वजह से आपके दिल, नींद और मानसिक सेहत पर भी भूरा प्रभाव पड़ सकता है। सुबह उठते ही कॉफी पीने की आदत बहुत से लोगों को होती है, लेकिन उनकी ये आदत उनके पेट के लिए बहुत ही ज्यादा नुक्सान दायक हो सकती है। और आपको बता दें कि एक व्यक्ति के खाली पेट कॉफी पीने की वजह से पेट में एसिड का लेवल अचानक से ही बढ़ जाता है, जिससे पेट की दीवारों पर बुरा प्रभाव पड़ता है और साथ में जलन जैसी समस्या को पैदा करता है। लम्बे समय से काफी का सेवन, असल में पेट की परत को पतला कर देता है, जिससे पाचन शक्ति बिगड़ जाती है। आम तोर पर इस लिए कॉफी का सेवन हमेशा हल्का नाश्ता करने के बाद ही करना चाहिए, जिस की डॉक्टर भी सलाह देते हैं।

कॉफी से होने वाले नुकसान को कैसे कम करें?

  1. कभी भी खाली पेट कॉफी का सेवन ना करें। 
  1. कॉफी का सेवन करने के साथ- साथ पर्याप्त मात्रा में पानी का सेवन करें, ताकि आपके पेट पर कैफीन का प्रभाव कम पड़े।
  1. कॉफी के बाद भुनी सौंफ या मिश्री खाने से कॉफी की गर्मी कम होती है।
  1. आप धीरे-धीरे कॉफी के सेवन को कम करें, इसे सीधे बंद करने पर आपको सिरदर्द और थकान महसूस हो सकती है। 

डॉक्टर से कब संपर्क करें?

कॉफी पीने के बाद, अगर आपको पेट में दर्द, एसिडिटी, मतली, उल्टी या काले रंग का मल आ रहा है, तो आप तुरंत गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट से संपर्क करें। यह मामला आपके पेट की परत में गंभीर सूजन या अल्सर से जुड़ा हो सकता है। 

निष्कर्ष

कॉफी का ज्यादा सेवन पेट की परत को काफी ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है, जिसकी वजह से गैस्ट्राइटिस, एसिडिटी, अपच, पेट की परत में गंभीर सूजन या अल्सर जैसी समस्याएं हो सकती हैं। असल में, कॉफी का सीमित सेवन आपके शरीर को एक्टिव और एनर्जेटिक बनाता है, इसलिए अगर आप कॉफी को काफी हद तक पसंद करते हैं, तो इसका संतुलन बनाए रखना ही एक समझदारी है, जिस की डॉक्टर भी सलाह प्रदान करते हैं। अगर आपको कॉफी की वजह से, पेट में किसी भी तरह की कोई समस्या बन गई है, जिसकी वजह से आप परेशान रहते हैं और आप इसका समाधान चाहते हैं, तो आप आज ही अमेरिटस अस्पताल में जाकर आपकी अपॉइंटमेंट को बुक करवा सकते हैं और इसके विशेषज्ञों से इसके बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

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क्या आप भी हैं पेट की समस्या से परेशान, तो अपनाएं ये घरेलू उपाय

आज के समय में सभी लोगों का खान पान बदल गया है। लोगों का लाइफस्टाइल और खान-पान सही नहीं होने के कारण उनको कई तरह की समस्याएं होने लगती हैं, लोगों का पेट का अच्छे तरिके से साफ़ ना होना भी उन्हीं में से एक समस्या है। अपने पेट को साफ़ रखना न केवल आपके शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बल्कि मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी बहुत जियादा जरूरी होता है। जब कभी भी हमारा पेट खराब होता है या फिर इसमें अपच की समस्या हो जाती है, तो हमारा पूरा दिन खराब हो जाता है आप इससे बुरी तरह से परेशान हो जातें हैं हमारा न तो किसी काम में मन लगता है और न ही कुछ खाने की इच्छा होती है। और तो और कई बार पेट साफ़ न होने की वजह से पेट में गैस बनने लगती है, जो न सिर्फ हमारा पेट दर्द को बढ़ाती है, बल्कि हमारे सिरदर्द का भी कारण बनती है। इसके इलावा अगर आपका पेट साफ़ नहीं रहता तो आपको गैस, कब्ज, अपच और अन्य परेशानिओं का सामना भी करना पड़ सकता है। 

वैसे तो लोगों का पेट साफ़ न होने के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन विशेष रूप से लोगों का गलत खान-पान करना, समय पर शौच न जाना, व्यायाम न करना, पर्याप्त मात्रा में पानी न पीना, सिगरेट और चाय-कॉफी का बहुत ज्यादा सेवन करना और निष्क्रिय जीवन जीना आदि इसके कारणों में शामिल हैं।  

पेट साफ करने के घरेलू उपाय 

पर्याप्त मात्रा में पानी पीना:

रोजाना सही मात्रा में पानी पीने से हमारा शरीर हाइड्रेट रहता है और सुबह के समय में खाली पेट हल्का गर्म पानी पीना पेट की बीमारियों के लिए बहुत ही ज्यादा प्रभावशाली माना जाता है। इसको नियमित खाली पेट पीने से पेट अच्छी तरह साफ होता है। और इसके साथ आपको अपने पूरे दिन में पर्याप्त मात्रा में पानी को पीना चाहिए ताकि आपका पेट बीमारियों से मुक्त रहे। और आपको इस बात का ख़ास तौर पर ध्यान रखना चाहिए की खाना खान के तुरंत बाद पानी नहीं पीना चाहिए क्योकि इसके कारण गैस और कब्ज की समस्या पैदा होती है। जिसकी वजह से आप बदहजमी और दूसरी समस्याओं का शिकार हो सकते हैं 

योगासन करना 

अक्सर लोग पेट की कब्ज समस्या से परेशान रहते हैं। अगर आपका पेट कब्ज की

वजह से अच्छे तरीके से खाली नहीं हो पता है, तो आप योगासन का सहारा ले सकते हैं। जैसे ताड़ासन, तिर्यक ताड़ासन, पश्चिमोत्तानासन, बंधासन, कटिचक्रासन और त्रिकोणासन को करके आप कब्ज की समस्या से छुटकारा पा सकते हैं और इसके साथ साथ आप अपने पाचन तंत्र को भी मजबूत बना सकते हैं। 

हींग

हींग आज कल सभी के घरों में पाई जाती है और हींग में कई तरह के गुण पाए जाते हैं और ज्यादातर हींग का उपयोग पेट की समस्याओं को दूर करने के लिए किया जाता है। हींग पेट के लिए काफी फायदेमंद मानी जाती है। जो भी लोग पेट की समस्यायों से लड़ रहें हैं उनके लिए हींग का सेवन बहुत ही ज्यादा प्रभावशाली होता है। हींग का उपयोग आप एक गिलास में हल्का गर्म पानी करके उसमें थोड़ा सा हींग चूर्ण मिलाकर उसके एकमात्र सेवन से पेट पूरी तरिके से साफ़ हो जाता है। 

गुनगुना पानी और नींबू

पेट की समस्या से छुटकारा पाने के लिए आप एक गिलास गुनगुने पानी में आधा नींबू को निचोड़ लें, और फिर उसमें एक चुटकी नमक या फिर उसमें एक चम्मच शहद को मिला लें। इसको सोने से पहले पीने पर पाचन तंत्र एक्टिव और सुबह पेट बिल्कुल साफ रहता है। 

अजवाइन और सौंफ का पानी

अजवाइन और सौंफ पेट की कई तरह की बीमारियों को दूर करने में मदद करती हैं। इसका इस्तेमाल एक चम्मच अजवाइन और एक चम्मच सौंफ को एक गिलास पानी में डालकर उसको अच्छे तरीके से उबाल लें। और फिर इसके बाद इस पानी को छानकर सोने से पहले पिएं। ये तरीका पेट की गैस और अपच को दूर करने में मदद करता है और सुबह तक पुरे पेट को साफ़ करने में मदद करता है 

वामन विधि

विशेष रूप से वामन विधि पेट साफ करने का यह एक कारगर तरीका है। अगर आपको रोजाना पेट की समस्या बनी रहती है तो आप रोज सुबह उठने के बाद पेट भरकर पानी पीएं और इसके बाद कुछ मिनटों बाद उंगलियों को गले में डालकर पानी को पेट से बाहर निकालें, यह कुछ उल्टी की तरह हो सकता है। 

यह शरीर में से जहरीले पदार्थों को बाहर निकालने का एक बहुत ही बढ़िया तरीका है। अगर किसी छोटे बच्चे को पेट की समस्या है तो उस पर इस विधि का प्रयोग नहीं करना चाहिए। अगर आप इसको पहली बार करते हैं तो इस को किसी ट्रेनर की निगरानी में ही करें। 

पेट साफ ना होने के लक्षण 

. पेट में गैस का होना।

. भूख कम लगना। 

. व्यक्ति की सांसों में से बदबू आना। 

. जी का मिचलाना।

. पेट में भारीपन महसूस होना। 

. पाचन का खराब हो जाना। 

. मन न लगना (अशांत होना ) 

. पेट में मरोड़ उठना। 

. पेट में मल का सख्त होना।

. रोजाना मल त्याग न करना। 

. मल त्याग के दौरान ज्यादा जोर लगाना। 

निष्कर्ष : आज के समय में लोगों का खान पान खराब होने की वजह से लोगों को ज्यादातर पेट की परेशानी बनी रहती है। पेट की परेशानी की वजह से आपका का सारा दिन खराब जाता है, कुछ भी खाने का मन नहीं करता है और पेट साफ़ न होने की वजह से पेट में गैस बनने लगती है, जो न सिर्फ पेट दर्द बढ़ाती है, बल्कि हमारे सिरदर्द का भी कारण बनती है। ऐसे में इससे छुटकारा पाने के लिए आप अजवाइन और सौंफ का पानी, गुनगुना पानी और नींबू, हींग, योगासन करना और पर्याप्त मात्रा में पानी पीना जैसे कुछ घरेलू उपायों को कर सकते हैं इससे आपके पेट को राहत मिलेगी और पेट की समस्या ठीक हो जाएगी। अगर ऐसा करने पर भी आपके पेट की समस्या ठीक नहीं हो रही है। और आप इसका इलाज करवाना चाहते हैं, तो आप आज ही अमेरिटस हॉस्पिटल जाके अपनी अपॉइंटमेंट को बुक करवा सकते हैं और इसके विशेषज्ञों से इसके बारे में जानकारी ले सकते हैं।

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मेनोपॉज़ क्या होता है, इसके मुख्य लक्षण, कारण और कैसे किया जाता है इलाज ?

मेनोपॉज़ महिलाओं में होने वाली एक प्राकृतिक जैविक प्रक्रिया है, जो मासिक धर्म के अंत को दर्शाती है | चिकित्सीय रूप से इस समस्या का निदान तब किया जाता है, जब एक महिला को 12 महीने तक पीरियड्स न आएं, जो आमतौर पर 40 या फिर 50 की उम्र की शुरुआत में होता है | मेनोपॉज़ एक प्राकृतिक तत्व होने के बावजूद भी यह महिलाओं के शारीरिक और भावनात्मक स्थिति में बदलाव ला सकता है, जो उनके रोज़मर्रा ज़िन्दगी को बाधित कर देता है | आइये जानते है मेनोपॉज़ के कितने चरण होते है :- 

 

मेनोपॉज़ के कितने चरण होते है ? 

मेनोपॉज़ को विशेष रूप से तीन चरणों में विभाजित किया गया है, पहला है प्री-मेनोपॉज़, दूसरा है मेनोपॉज़ और तीसरा है पोस्ट-मेनोपॉज़ | 

 

  • प्री-मेनोपॉज़ :- यह मेनापॉज होने से पहले का परिवर्तनकाल होता है, जो अक्सर महिलाओं में 40 उम्र के शुरूआती चरणों में होने लग जाता है | ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब महिलाओं के अंडाशय में अंडे कम होने लग जाते है और शरीर में हार्मोन का स्तर बदलने लग जाता है तो इससे एस्ट्रोजेन का स्तर कम होने लग जाता है, जो प्री-मेनोपॉज़ होने के  मुख्य लक्षण बनते है |

    

  • मेनोपॉज़ :- यह चरण तब उत्पन्न होता है जब एक महिला को पिछले 12 महीने से पीरियड्स नहीं आये होते है | जो आमतौर पर 51 वर्ष की आयु के आस-पास महिलाओं को होता है | ऐसा तब होता है, जब अंडाशय एस्ट्रोजेन और प्रोजेस्ट्रोन का उत्पादन करना कम कर देता है, जिससे महिलाओं में मासिक प्रजनन की क्षमता समाप्त हो जाती है | 

     

  • पोस्ट-मेनोपॉज़ :- मेनोपॉज़ होने के बाद महिलाओं में पोस्ट- मेनोपॉज़ शुरू हो जाता है, जो महिलाओं के बाकि के जीवन समय तक रहता है | इस दौरान हार्मोन का स्तर काफी कम हो जाता है और मेनोपॉज़ होने के लक्षण भी धीरे-धीरे कम होने लग जाते है | हालांकि कम हार्मोन स्तर होने की वजह से स्वास्थ्य से संबंधित समस्याएं जैसे की ऑस्टियोपोरोसिस और हृदय से संबंधित समस्यों का जोखिम कारक बढ़ जाता है | इसलिए इस समस्या से पीड़ित महिलाओं के लिए यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि नियमित रूप से चिकित्सा जांच करवाते रहे | 

 

यदि आप में से कोई भी महिला ऐसी किसी परिस्थिति से गुजर रही है तो इलाज के आप एमेरिटस हॉस्पिटल के सीनियर  कंसल्टेंट डॉक्टर शुचिता बत्रा से परामर्श कर सकते है | आइये जानते है मेनोपॉज़ होने के मुख्य लक्षण और कारण क्या है :- 

मेनोपॉज़ को सरल शब्दों में समझें मुख्य तथ्य जानें

मेनोपॉज़ के मुख्य लक्षण क्या है ? 

मेनोपॉज होने के मुख्य लक्षण व्यापक रूप से बिल्कुल भिन्न होते है, जिसमें आपको हॉट फ़्लैश, रात को सोते समय पसीना आना और अनियमित रूप से मासिक धर्म चक्र होने का अनुभव हो सकता है | इसके साथ-ही मूड स्विंग, चिड़चिड़ापन और नींद में खलल जैसे लक्षण भी दिखाई दे सकते है | मेनापॉज के दौरान होने वाले शारीरिक परिवर्तन जैसे की वजन का नियमित रूप से अधिक बढ़ना, बाल का पतला होना, त्वचा में सूखापन आने जैसे लक्षण भी शामिल हो सकते है | इसके अलावा :- 

 

  • सोने में परेशानी होना 
  • मूत्र संबंधित तात्कालिक का आभास होना यानी अधिक बार पेशाब करने की इच्छा होना 
  • हृदय संबंधित समस्याएं जैसे की बीच-बीच में चक्कर आना, हृदय की धड़कन का अचानक से तेज़ होना या फिर सुन्नपन, किसी नुकीली चीज़ के चुभन का एहसास होना, झुनझुनी जैसे असामन्य अनुभूति आदि शामिल है | 
  • योनि में सूखापन, जिससे यौन संबंध बनाने के दौरान परेशानी हो सकती है | 
  • अनियमित रूप से मासिक धर्म या फिर सामान्य से ज्यादा भारी या फिर हल्का मासिक धर्म भी हो सकता है | 

 

मेनोपॉज़ कितने समय तक रहता है ? 

अधिकतर मामलों में महिलाएं लगभग 5-6 साल तक मेनोपॉज़ के लक्षणों का अनुभव कर सकती है | लेकिन कई बार कुछ महिलायें इससे भी अधिक समय तक मेनोपॉज़ के लक्षणों से गुजर सकती है | कुछ महिलाओं को तो दस साल तक इन लक्षणों से सामना करना पड़ जाता है |      

 

महिलाओं में मेनोपॉज़ क्यों होता है ? 

जैसे-जैसे महिलाओं की उम्र बढ़ने लग जाती है, उनके शरीर में मौजूद अंडाशय एस्ट्रोजेन और प्रोजेस्ट्रोन, जो मासिक धर्म को नियंत्रित करने का कार्य करते है, उनका उत्पादन करना बंद कर देता है, जिसकी वजह से उनमें प्रजनन क्षमता काफी कम हो जाती है, जो मेनोपॉज़ होने का कारण बनते है | 

 

मेनोपॉज़ का कैसे किया जाता है इलाज ? 

मेनोपॉज़ का मुख्य रूप से इलाज आपके लक्षणों और मासिक धर्म चक्र के इतिहास के आधार पर ही किया जाता है | इसके आलावा अगर स्थिति काफी गंभीर हो गयी है तो इसके इलाज के लिए सर्जिकल प्रक्रिया तक करवाने की ज़रूरत पड़ सकती है | यदि आप भी ऐसे ही समस्या से गुजर रहे है तो इस समस्या के इलाज में एमेरिटस हॉस्पिटल आपकी पूर्ण रूप से मदद कर सकता है | इस संस्था के सीनियर कंसल्टेंट डॉक्टर शुचिता बत्रा पंजाब के बेहतरीन ऑस्ट्रेटिक्स और गायकनलोजिस्ट स्पेशलिस्ट में से एक है, जो पिछले 8 सालों से मेनोपॉज़ से पीड़ित महिलाओं का सटीकता से इलाज कर रही है | इसलिए आज ही एमेरिटस हॉस्पिटल की ऑफिसियल वेबसाइट पर जाएं और परामर्श के लिए अपनी अप्पोइन्मेंट को बुक करें | इसके अलावा आप अगर चाहे तो वेबसाइट पर दिय गए नंबरों से सीधा संस्था से बात-चित भी कर सकते है |  

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डॉक्टर सुचिता बत्रा से जाने ओवेरियन सिस्ट से जुड़े कुछ मैथ्स एंड फैक्ट्स

एमेरिटस हॉस्पिटल के यूट्यूब चैनल में पोस्ट एक वीडियो में डॉक्टर सुचिता बत्रा ने यह बताया कि उनके पास आये कई महिला मरीज़ इस बात को लेकर काफी परेशानी में रहते है की क्या ओवेरियन सिस्ट के सटीक इलाज के लिए सर्जरी करवाना बेहद ज़रूरी होता है ? इसके बारे में जानने से पहले आइये जान लेते है ओवेरियन सिस्ट से जुड़े कुछ मिथ्स एंड फैक्ट्स :- 

 

ओवेरियन सिस्ट से पीड़ित महिला को यही सुझाव दया जाता है कि उन्हें ओवेरियन सिस्ट की समस्या को लेकर ज्यादा घबराना नहीं है, क्योंकि उनके पास आये कई महिला मरीज़ ओवेरियन सिस्ट की अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट को लेकर आते है और अपनी परेशानी को बताते है | आमतौर पर ओवेरियन सिस्ट 3 से 4cm तक ही होता है और वह फ्लूइड से भरा होता है, जिसे आसान भाषा में फ़क्शनल सिस्ट भी कहा जाता है | लेकिन किसी भी स्थिति को सामान्य कहने से पहले यह जान लेना बहुत ज़रूरी होता है की ओवेरियन सिस्ट से जुड़ीं कौन-कौन असामान्य स्थिति होती है और इससे पीड़ित महिला को कब इसके इलाज करवाने के लिए प्रमाणित गयनेकोलॉजिस्ट के पास जाना चाहिए | 

 

इससे जुड़ी अधिक जानकारी के लिए दिए लिंक पर क्लिक करें और इस विडियो को पूरा देखें | आप चाहे तो एमेरिटस हॉस्पिटल नामक यूट्यूब चैनल पर भी विजिट कर सकते है | यहाँ आपको इस विषय संबंधी संपूर्ण जानकारी पर वीडियो प्राप्त हो जाएगी | 

 

यदि आप में से कोई भी महिला असामान्य ओवेरियन सिस्ट की समस्या से पीड़ित है और स्थायी रूप से इलाज करवाना चाहते है तो इसके लिए आप एमेरिटस हॉस्पिटल से परामर्श कर सकते है | इस संस्था के सीनियर कंसलटेंट डॉक्टर सुचिता बत्रा ऑब्स्टट्रिशन गयनेकोलॉजिस्ट में स्पेशलिस्ट है, जो पिछले 8 सालों से ओवेरियन से पीड़ित महिलाओं का सटीक इलाज कर रही है | इसलिए आज ही एमेरिटस हॉस्पिटल नामक वेबसाइट पर जाएं और अपनी अप्पोइन्मनेट को बुक करें | इसके अलावा आप वेबसाइट में दिए गए नंबरों से भी सीधा संस्था से संपर्क कर सकते है |     

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प्रेगनेंसी के दौरान नॉज़िया या फिर वोमिटिंग क्यों होता है, जाने कैसे पाए इस समस्या से निजात ?

एमेरिटस हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट डॉक्टर सुचिता बत्रा ने अपने यूट्यूब चैनल में पोस्ट एक वीडियो में यह बताया की प्रेगनेंसी के शुरुआती कुछ हफ़्तों में नॉज़िया या फिर वोमिटिंग का अनुभव होना बेहद सामान्य बात मानी जाती है, लकिन कई मामलों में स्थिति गंभीर भी हो जाती है | अब अगर बात करें की ऐसा क्यों होता है तो प्रेगनेंसी के दौरान महिंलाओं के हार्मोन  बहुत तेज़ी से बदलते रहते है, जिस कारण नॉज़िया या फिर वोमिटिंग का अनुभव होना स्वाभाविक है | 

 

डॉक्टर सुचिता बत्रा ने यह भी बताया की वैसे नॉज़िया या फिर वोमिटिंग का प्रेगनेंसी के दौरान आना स्वाभाविक है लेकिन कुछ युक्तियों के अनुसरण से आप इस समस्या को कम करने की कोशिश ज़रूर कर सकते है | आइये जानते है ऐसे ही कुछ युक्तियों के बारे में :- 

 

  • कोशिश करें की अपने आप को हाइड्रेटेड रखें, एक बार काफी सारा पानी का सेवन बिलकुल भी न करें क्योंकि इससे वोमिटिंग आने का खतरा होता है, सिप-सिप करके ही पानी का सेवन करें |
  • पूरे दिन के तीन प्रमुख भोजन को छह भोजन में विभाजित कर दें | ऐसा करने से आप अपना भोजन पूरा खा सकेंगे और वोमिटिंग की समस्या भी कम होगी | 
  • कोशिश करें की न ही पेट को पूरा भर कर भोजन करें और न ही पेट को कभी खाली रखें, क्योंकि ऐसा करने से नॉज़िया या फिर वोमिटिंग आने का खतरा रहता है | 
  • सुबह उठने के बाद खाली पेट कुछ भी लिक्विड चीज़ों का सेवन बिलकुल न करें, कोशिश करें कि अपने दिन की शुरुआत ग्लूकोन-डी बिस्किट्स या फिर क्रैकर्स के सेवन से ही करें | 

 

इससे जुड़ी अधिक जानकारी के लिए आप दिए गए लिंक पर क्लिक करें और अपनी अप्पोइन्मेंट को बुक करें | इसके अलावा आप एमेरिटस हॉस्पिटल नामक यूट्यूब चैनल पर भी विजिट कर सकते है | इस चैनल पर इस विषय संबंधी संपूर्ण जानकारी पर वीडियो बनकर पोस्ट की हुई है | 

 

यदि आप भी प्रेगनेंसी से जुड़ी किसी प्रकार की समस्या से गुज़र रहे है तो इलाज के लिए आप एमेरिटस हॉस्पिटल से परामर्श कर सकते है |  इस संस्था के सीनियर कंसलटेंट डॉक्टर सुचित्रा बत्रा ऑब्स्टट्रिशन गयनेकोलॉजिस्ट में स्पेशलिस्ट है जो इस समस्या को कम करने में आपकी पूर्ण से मदद कर सकते है | इस लिए आज ही एमेरिटस हॉस्पिटल की वेबसाइट पर जाएं और अपनी अप्पोइन्मेंट को बुक करें | आप चाहे तो वेबसाइट पर दिए गए नंबरों से सीधा संस्था से संपर्क कर सकते है |  

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प्रीटर्म लेबर पेन क्या होता है और इस पेन के दौरान कौन से सावधानियां बरतनी बेहद ज़रूरी होती है ?

एमेरिटस हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट डॉक्टर सुचिता बत्रा ने अपने यूट्यूब चैनल में पोस्ट एक यूट्यूब वीडियो के माध्यम से यह बताया कि अगर 37 सप्ताह से पहले किसी भी गर्भवती महिला को ऐसा लगता है की उसे प्रीटर्म लेबर पेन का अनुभव हो रहा है तो जल्दबाज़ी में निर्णय बिलकुल भी न ले और सबसे पहले डॉक्टर के पास जाकर अच्छे से जाँच करवाएं | कभी-कभार क्या होता है की कई मामलों में गर्भवती महिलाओं को 37 सप्ताह से पहले ही प्रीटर्म पेन का अनुभव होने लग जाता है और वह महिला इससे लेबर पैन समझ बैठती है | 

 

जब भी आपको ऐसे ही दर्द का अनुभव हो रहा है तो सबसे पहले इस बात का सुनिश्चित करें की क्या यह प्रीटर्म लेबर पेन है कि नहीं, यदि आपको दर्द पहले कम हो रहा था लेकिन अब दर्द तीव्र होने लग गया है या फिर पहले दर्द देरी से होता है लेकिन अब हर घंटे इस दर्द से आपको गुजरना पड़ रहा है तो यह प्रीटर्म लेबर पेन हो सकता है या फिर प्रीटर्म लेबर पेन होना का खतरा हो सकता है | अब सवाल यह आता है की इस दौरान महिलों को क्या करना चाहिए और किन-किन बातों का ध्यान रखना चाहिए | 

 

डॉक्टर सुचित्रा बत्रा ने बताया की सबसे पहले इस दर्द से पीड़ित गर्भवती महिला को पूर्ण रूप से बेडरेस्ट लेना चाहिए, दरअसल इस दौरान महिलाओं के लिए सबसे ज्यादा यह महत्वपूर्ण होता है की वह अधिक से अधिक आराम करें, किसी भी तरह काम बिलकुल न करें या फिर वजनदार सामन बिलकुल भी न उठाये | दूसरी बात इस बात का सुनिक्षित करे यह दर्द उत्पन्न होने के मुख्य कारण क्या है, क्या यह दर्द इन्फेक्शन की वजह से तो नहीं हो रहा और भी ऐसे कई कारण हो सकते है | 

 

इससे जुड़ी अधिक जानकारी के लिए आप दिए गए लिंक पर क्लिक कर इस वीडियो को पूरा देखें | इसके अलावा आप एमेरिटस हॉस्पिटल नामक यूट्यूब चैनल पर विजिट कर सकते है | इस चैनल पर इस विषय संबंधी संपूर्ण जानकारी पर वीडियो बनाकर पोस्ट की हुई है | 

 

यदि आप भी प्रीटर्म लेबर पेन गुज़र रहे है और जाँच करवाना चाहते है तो इसमें एमेरिटस हॉस्पिटल आपकी पूर्ण रूप से मदद कर सकता है | इस संस्था के सीनियर कंसल्टेंट  डॉक्टर सुचिता बत्रा गयनेकोलॉजिस्ट में स्पेशलिस्ट है जो इस समस्या को कम करने में आपकी मदद कर सकते है | इसलिए आज ही एमेरिटस हॉस्पिटल नामक वेबसाइट पर जाएं और अपनी अप्पॉइंमेंट को बुक करें | आप चाहे तो वेबसाइट पर दिए गए नंबरों से भी संपर्क कर सकते है |    

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Endometriotic cyst Hindi

एंडोमेट्रिओट्रिक सिस्ट क्या है और इसका इलाज कैसे करवाएं ?

एमेरिटस हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट डॉक्टर सुचित्रा बत्रा ने अपने यूट्यूब चैनल में पोस्ट एक वीडियो में यह बताया की उनके पास आये मरीज़ ने उनसे के एक विशिष्ट प्रश्न पूछते हुए कहा किसी ने उन्हें यह बोला है की एंडोमेट्रिओट्रिक सर्जरी के बाद एंडोमेट्रिओट्रिक सिस्ट की समस्या बहुत जल्द वापिस आ जाता है और उन्हें गर्भधारण करने में भी काफी परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है तो इस स्थिति में वह क्या करें ?

अगर बात करें एंडोमेट्रिओट्रिक सिस्ट की तो यह गर्भाशय में होने वाली ऐसी समस्या होती है, जो गर्भाशय में काफी परेशानियों को उत्पन्न करने का कार्य करती है | इस स्थिति के दौरान एंडोमेट्रियल टिशुओं में असामान्य रूप से बढ़ोतरी होने लग जाती है और साथ ही यह गर्भाशय के बाहर फैलने लग जाता है | कई बार तो इस एंडोमेट्रियम की परत का गर्भाशय के बाहरी परत के अलावा अंडाशय, आंतों और दूसरे प्रजानन तक में भी फैलने का जोखिम कारक बना रहता है | यह समस्या किसी संक्रमण का ना होकर शरीर के  आंतरिक प्रणाली में आई कमी के कारण उत्पन्न होता है | आइये जानते है एंडोमेट्रिओट्रिक सिस्ट के मुख्य लक्षण होते है :-  

एंडोमेट्रिओट्रिक सिस्ट के मुख्य लक्षण कौन से है ? 

 

  • मासिक धर्म चक्र के दौरान तीव्र दर्द होना 
  • बिना पीरियड्स के श्रेणी में दर्द का अनुभव होना 
  • संभोग के दौरान दर्द का एहसास होना 
  • बांझपन की समस्या होना 
  • हर वक़्त थकन महसूस होना 

 

यदि आप भी ऐसे ही स्थिति से गुजर रहे हैं तो बेहतर है की आप किसी अच्छे गयनेकोलॉजिस्ट के पास और इस स्थिति की  अच्छे से जांच करवाएं | इसके लिए आप एमेरिटस हॉस्पिटल से परामर्श कर सकते है | इस संस्था के सीनियर डॉक्टर डॉक्टर सुचित्रा बत्रा गयनेकोलॉजिस्ट में स्पेशलिस्ट है, जो इस समस्या को कम करने में आपकी मदद कर सकते है | इसलिए आज ही एमेरिटस हॉस्पिटल नामक वेबसाइट पर जाएं और अपनी अप्पोइन्मेंट को बुक करें, ताकि इस समस्या से जल्द से जल्द आपको छुटकारा मिल सके | 

 

इससे जुड़ी अधिक जानकारी के लिए आप एमेरिटस हॉस्पिटल नामक यूट्यूब चैनल पर विजिट कर सकते है या फिर दिए गए लिंक पर क्लिक कर इस वीडियो को पूरा देखें | इस चैनल पर आपको इस विषय संबंधी संपूर्ण जानकारी पर वीडियो प्राप्त हो जाएगी |   

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एंटी-मुलेरियन हार्मोन टेस्ट क्या होता है,क्या फर्टिलिटी करवाने वाले सभी लोगों को एएमएच टेस्ट करवाना चाहिए ?

एमेरिटस हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट डॉक्टर सुचित्रा बत्रा ने अपने यूट्यूब चैनल में पोस्ट एक वीडियो में यह बताया कि उनके पास आए मरीज़ अक्सर यही सवाल करते है की क्या प्रजनन के इलाज के लिए आये सभी लोगों को एएमएच टेस्ट करवाने की ज़रुरत होती है ? ऐसा बिल्कुल नहीं है, हर व्यक्ति को जो प्रजनन का इलाज करवाने के लिए आये है उन्हें एएमएच टेस्ट यानी एंटी-मुलेरियन हार्मोन टेस्ट करवाना ज़रूरी नहीं पड़ती है |

 

यह एंटी-मुलेरियन हार्मोन टेस्ट उन लोगों को करवाने के लिए कहा जाता है, जो लोग :- 

 

  • पिछले एक साल से गर्धारण करने की कोशिश कर रहे, परन्तु हर बार कंसीव करने असफल हो जाते है |  
  • उनके मासिक धर्म अनियमित ढंग से आ रहे है | 
  • उनके परिवार में पहले से ही प्रेमीच्यूर मेनोपॉज़ की समस्या का इतिहास है |   
  • वह लोग जो आईवीएफ ट्रीटमेंट से गर्भधारण करना चाहते है |  

 

ऐसे लोगों के लिए एंटी-मुलेरियन हार्मोन टेस्ट की प्रक्रिया बेहद महत्वपूर्ण होती है | इसके साथ-साथ एलएचएफ और एफएसए के नाम के जो व्यक्ति के शरीर में मौजूद हार्मोन्स होते है, इसका टेस्ट उन लोगों को करवाना बेहद ज़रूरी होता है जिनके  मासिक धरम चक्र का में पीरियड्स का फ्लो बहुत ही कम होता है | 

 

डॉक्टर सुचित्रा बत्रा ने यह भी बताया की उनके हॉस्पिटल में हर तरह की सुविधा मौजूद है जिसकी मदद से इनफर्टिलिटी से पीड़ित व्यक्तियों का इलाज इलाज किया जाता है और साथ ही बांझपन से पीड़ित दंपत्तिओं का इलाज कर उनके माँ-बाप बनने के अधूरे सपने को पूरा किया जाता है | इस संस्था में डॉक्टर की एक्सपर्ट्स टीम हमेशा 24/7 मौजूद रहती है | 

 

यदि आप भी इनफर्टिलिटी की समस्या से गुजर रहे है और इलाज करवाना चाहते है तो इसके लिए आप एमेरिटस हॉस्पिटल नामक वेबसाइट पर जाएं और आज ही अपनी अप्पोइन्मेंट को बुक कराएं, ताकि जल्द से जल्द आपको इससे समस्या छुटकारा मिल गर्भधारण को कंसीव करने में मदद मिल सके |  

 

इससे जुड़ी अधिक जानकारी के लिए आप दिए गए लिंक पर क्लिक इस वीडियो को अंत तक ज़रूर देखें या फिर आप एमेरिटस हॉस्पिटल नामक यूट्यूब चैनल पर भी जा सकते है | इस चैंनले पर इस विषय से जुडी संपूर्ण जानकारी पर वीडियो पोस्ट की हुई है | 

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क्या आपको भी गर्भधारण करने में आ रही है मुश्किल, जानिए डॉक्टर सुचित्रा बत्रा से क्या हो सकते है इसके कारण

इनफर्टिलिटी एक ऐसा स्थिति होती है, जहाँ एक साल तक गर्भधारण की कोशिश करने के बाद भी महिलाएं गर्भवती होने में असफल हो जाती है | इसकी मुख्य वजह है बढ़ती उम्, जैसे-जैसे महिला की उम्र बढ़ती जाती है वैसे -वैसे ही उनमे मौजूद शुक्राणु और अंडे की गुणवत्ता और मात्रा में कमी आने लग जाती है, क्योंकि गर्भवती का कंसीव होना शुक्राणु और अंडे की गुणवत्ता और मात्रा पर ही निर्भर करता है | आइये जानते है डॉक्टर सुचित्रा बत्रा से क्या होती है इनफर्टिलिटी :- 

एमेरिटस हॉस्पिटल के सीनियर कंसलटेंट जो की लेप्रोस्कोपी और इनफर्टिलिटी में स्पेशलिस्ट डॉक्टर सुचित्रा बत्रा ने अपने  यूट्यूब चैनल में पोस्ट एक वीडियो के माध्यम से यह बताया कि जो महिलाएं एक साल से तक लगातार गर्भधारण करने की कोशिश करने के बाद भी गर्भवती होने में असमर्थ हो जाती है, उसे बांझपन या फिर इनफर्टिलिटी की समस्या कहा जाता है | इनफर्टिलिटी दो तरह के होते है, पहले प्राइमरी इनफर्टिलिटी और दूसरी है सेकेंडरी इनफर्टिलिटी | प्राइमरी इनफर्टिलिटी उन महिलाओं को होती है, जो पहले से ही गर्भधारण करने में असफली हो रही होती है और सेकेंडरी इनफर्टिलिटी उन महिलाओं को होती है,जिन्होंने पहले कभी गर्भधारण करने के सफलता प्राप्त की होती है, लेकिन अब उन्हें गर्भधारण करने में असफलता प्राप्त हो रही होती है | 

डॉक्टर सुचित्रा बत्रा ने यह भी बताया की इस वीडियो में आपको इस विषय से जुड़ी पूरी जानकारी दी जाएगी जैसे की इनफर्टिलिटी क्या होती है, इसके मुख्य वजह क्या है? इनफर्टिलिटी से जुड़े जोखिम कारक कौन से है ? स्त्रीलिंग इनफर्टिलिटी में कौन से टेस्ट किये जाते है ? जैसे की बेसिक और एडवांस टेस्ट , इनफर्टिलिटी का इलाज कैसे किया जाता है ? जैसे की  मेडिकल मैनेजमेंट और इसके साथ ही सर्जिकल मैनेजमेंट आदि |   

स्त्रीलिंग इनफर्टिलिटी होने के मुख्य वजह क्या है ? 

महिला में मौजूद फॉलोपियन ट्यूब ओवरी, यूटेरस, सर्विक्स और वजाइना इन चारों ऑर्गन से मिलकर बनता है | इन चारों में से किसी भी ऑर्गन में किसी प्रकार की परेशानी आती है तो जाहिर सी बात है की इसी कारणों से महिलाएं गर्भधारण करने में असमर्थ हो जाती है | 

स्त्रीलिंग इनफर्टिलिटी से जुड़े जोखिम कारक कौन से हो सकते है ?

डॉक्टर सुचित्रा बत्रा ने बताया कि अगर किसी महिला की आयु 35 वर्ष या फिर इससे भी अधिक है तो उनमे इनफर्टिलिटी का जोखिम कारक सबसे अधिक होता है सकता है | उम्र बढ़ने के साथ-साथ महिलाओं में सेहत के साथ-साथ उसके प्रजनन में भी काफी बुरा असर पड़ता है और इसके साथ ही शुक्राणु और अंडे की गुणवत्ता और मात्रा में भी कमी आ जाती है, जिस वजह से 35 वर्ष या फिर इससे भी अधिक उम्र की महिलाएं गर्भधारण करने में असमर्थ हो जाती है |

इससे संबंधित संपूर्ण जानकारी के लिए आप एमेरिटस हॉस्पिटल नमक यूट्यूब चैनल पर विजिट कर सकते है | इस चैनल पर इस विषय से जुड़ी पूरी जानकारी पर वीडियो बनाकर पोस्ट की हुई है | इसके अलावा आप सीधे एमेरिटस हॉस्पिटल से परामर्श भी कर सकते है | इस संस्था के सीनियर कंसलटेंट डॉक्टर सुचित्रा बत्रा लेप्रोस्कोपी और इनफर्टिलिटी में स्पेशलिस्ट है, जो इनफर्टिलिटी की समस्या से छुटकारा और गर्भधारण करने में आपकी मदद कर सकते है | 

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जाने डाइटिशियन से थायराइड से पीड़ित व्यक्ति को क्या खाना चाहिए और किन चीज़ों से करनी चाहिए परहेज़

थायराइड से पीड़ित व्यक्ति अक्सर अपने डाइट को लेकर काफी चिंतित में रहते है | यह एक ऐसी समस्या है जिसे खाने-पीने और व्यायाम की मदद से नियंत्रित किया जाता है | आज के दौर में थायराइड एक ऐसी समस्या बन गयी है, जिसका दर तेज़ी से बढ़ता ही जा रहा है | यह समस्या ख़राब खानपान और जीवनशैली के कारण उत्पन्न होती है |  कुछ महतवपूर्ण हार्मोन होते है जो थायराइड की समस्या के कारण बहुत ज़्यादा या फिर बहुत कम बनते है | 

थायराइड कई तरह के होते है जैसे की हाइपरथाइरॉइडिस्म, हाइपोथाइरॉइडिस्म, थाइरोइडिटिस और हाशिमोटो थाइरोइडिटिस | हाइपोथायराइड एक ऐसी स्थिति होती है जिसमें आपके शरीर का थायराइड ग्लैंड हार्मोन का सही तरीके से उत्पादन करने में असमर्थ हो जाता है | इसकी वजह से आपके शरीर का मोटापा अनियमित रूप से बढ़ने लगता है और साथ ही कई तरह की बीमारियां भी उत्पन्न हो जाती है | लेकिन घबराएं नहीं, इस समस्या को आप सही डाइट और जीवनशैली में कुछ बदलाव लाने से नियंत्रित कर सकते है | आइये जानते है डाइटिशियन द्वारा बताये गए ऐसे ही कुछ टिप्स :- 

 

थायराइड से पीड़ित व्यक्ति  को क्या नहीं खाना चाहिए ?    

एमेरिटस हॉस्पिटल के सीनियर डॉक्टर कार्तिक गोयल ने यह बताया कि थायराइड की समस्या से शरीर का मेटाबॉलिज्म काफी स्लो हो जाता है | ऐसे में आपको फैटी फ़ूड, प्रोसेस्ड फ़ूड, फ़ास्ट फ़ूड, ज्यादा मीठी वाली चीज़ों को पूरी तरह से बंद कर देना चाहिए | क्रूसिफेरस सब्जियां जैसे की पत्तागोभी, ब्रोकोली, सोया में गोइट्रोज़न काफी ज्यादा होता है, जो थायराइड से पीड़ित मरीज़ के शरीर को काफी नुक़सान पंहुचा सकता है |

 

थायराइड से पीड़ित व्यक्ति को क्या खाना चाहिए ? 

सीनियर डॉक्टर कार्तिक गोयल ने यह बताया कि थायराइड से पीड़ित व्यक्ति को फाइबर से भरपूर फाल और सब्जियों का सेवन करना चाहिए | फाइबर युक्त चीज़ों का सेवन करने से मेटाबोलिज्म को काफी बढ़ावा मिलता है | फल ओर सब्जियां ही एकमात्र ऐसे चीज़ है जिसमे माइक्रो और मैक्रो दोनों ही तरह के खाद्य पदार्थ पाए जाते है | जिसके सेवन से आपके शरीर में थायराइड फंक्शन में काफी सुधर आ जाता है | खाने में हमेशा आयोडीन नमक करना चाहिए | आप चाहे तो सीफ़ूड का भी सेवन कर सकते है | शरीर में आयोडीन की कमी से भी थायराइड की समय उत्पन्न हो सकती है | 

 

थायराइड से पीड़ित व्यक्ति के लिए कौन-से विटामिन है ज़रूरी ? 

सीनियर डॉक्टर कार्तिक गोयल ने यह बताया कि थायराइड से पीड़ित व्यक्ति को अक्सर विटामिन डी की कमी हो जाती है | इसलिए यह ज़रूरी है की आप दिन में थोड़ी देर के धुप में बैठ जाये | मरीज़ को अपने खाने में मैग्नीशियम से भरपूर चीज़ें जैसे की हरे पत्ते वाली सब्ज़ियां को शामिल कर लेनी चाहिए | इसके आलावा सेलेनियम से भरपूर चीज़ें जैसे की ब्राज़ील नट्स और दूसरे ड्राई फ्रूट्स का भी सेवन कर सकते है | 

 

थायराइड से पीड़ित व्यक्ति को क्या व्यायाम करना चाहिए ? 

सीनियर डॉक्टर कार्तिक गोयल ने यह बताया कि सबसे एहम बात यह है की थायराइड से पीड़ित व्यक्ति दिन में कम से कम 40 से 45 मिनट तक किसी भी तरह का व्यायाम ज़रूर करना चाहिए | मेटाबोलिज्म के बढ़ने से व्यक्ति का वजन काफी तेज़ी से बढ़ने लगता है, जिससे थायराइड की समस्या को बढ़ावा मिलता रहता है | 

इससे संबंधित किसी भी तरह के जानकारी के लिए आप एमेरिटस हॉस्पिटल से परामर्श कर सकते है | यहाँ के सीनियर डॉक्टर कार्तिक गोयल गैस्ट्रोएंटरोलॉजी में एक्सपर्ट है, जो इस समस्या को कम करने में आपकी मदद कर सकते है |

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मासिक धर्म चक्र के अनियमित और देरी होने के क्या कारण हो सकते है ?

मासिक धर्म चक्र का अनियमित रूप से या देरी से आना प्रेगनेंसी के अलावा और भी कई कारण हो सकते है जैसे की कठोर व्यायाम करना, तनाव में रहना, वजन को घटाने के दौरान, मोटापे की वजह से आदि | इसके आलावा कई हार्मोनल स्थिति भी होती है जिससे भी यह समस्या उत्पन्न हो जाती है | आइये जानते है इस बारे में :- 

एमेरिटस हॉस्पिटल के सीनियर कंसल्टेंट डॉक्टर सुचिता बत्रा ने अपने यूट्यूब चैनल में पोस्ट वीडियो के माध्यम से यह बताया कि मासिक धर्म चक्र का अनियमित रूप से या देरी होने के कई वजह है जैसे की 

  • पीसीओसी:- इससे पीड़ित महिलाओं के हार्मोन का स्तर काफी कम और असामान्य हो जाता है, जिस कारण अंडाशय में सिसक, मुहासे का होना, चेहरे और शरीर में अधिक बालों का उगना आदि जैसे दुष्प्रभाव दिखाई देने लग जाते है | इसके इलावा पीसीओसी अनियमित मासिक धर्म चक्र और देरी से आना की वजह भी बन सकती है | 

 

  • थाइरोइड :-  थाइरोइड की कमी या फिर इसके स्तर के बढ़ने से भी मासिक धर्म का चक्र बिगड़ सकता है | 

 

  • प्रोलैक्टिन हार्मोन का बढ़ाना :- प्रोलैक्टिन हार्मोन स्तर के बढ़ने से भी मासिक धर्म चक्र में देरी और अनियमित रूप से आने का कारन बन सकती है |  

इसके अलावा और भी ऐसे कई कारण होते है जैसे की मेनोपॉज़, टेस्टोस्टेरोन का हार्मोन्स बढ़ना एंड टुबरक्लोसिस जिससे मासिक धरम का चक्र बिगड़ सकता है |

डॉक्टर सुचिता बत्रा ने यह भी बताया कि अगर आपका मसिक धर्म चक्र एक ही बार ओवरडुए या ईरेगुलर हुआ है तो इसमें घबराने की कोई बात नहीं है, अगर इस समस्या से आप लगातार या फिर बार-बार सामना कर रहे है तो इस समस्या का सही तरीके से जांच-पड़ताल और उपचार करवाना बेहद आवश्यक होता है, अगर सही समय पर इलाज न करवाया जाये यह आगे जाकर बहुत बड़ी बीमारी का  कारण बन सकती है |  

अगर इस समस्या से जुड़ी और भी जानकारी लेना चाहते है तो आप एमेरिटस हॉस्पिटल नमक यूट्यूब चैनल पर विजिट कर सकते है, इस चैनल पर इस टॉपिक से जुड़ी एक वीडियो बना कर पोस्ट की हुई है या फिर आप एमेरिटस हॉस्पिटल से परामर्श भी कर सकते है, इस संस्था के सीनियर कंसल्टेंट डॉक्टर सुचिता बत्रा गायनोलॉजिस्ट में एक्सपर्ट है जो आपको इस समस्या से छुटकारा दिलाने में मदद करेंगे |

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ओवुलेशन क्या है ? आइये इसकी महत्वता की समझते है

ओवुलेशन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें महिला के अंडकोष में एक या एक से अधिक अंडे उत्पन्न हो जाते है या फिर उन अंडो के निकलने की प्रक्रिया को ओवुलेशन कहा जाता है | जीवन में ओवुलेशन क्रिया का बहुत महत्वपूर्ण चरण होता है, जो की महिलाओं में यह प्रक्रिया आम तौर पर मासिक धर्म में 14वें दिन के आस पास होती है, हालांकि हर महिला में ओवुलेशन की तारीख अलग-अलग होती है | 

एमेरिटस हॉस्पिटल के सीनियर डॉक्टर शुचिता बत्रा जो की गयनेकोलॉजिस्ट में एक्सपर्ट्स है उनका मानना है की महिलाओं के लिए ओवुलेशन की प्रक्रिया बहुत महत्वपूर्ण होती है, यह महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि इसके जरिये गर्भधारण होने की सम्भावना होती है | आइये जानते है ओवुलेशन की महत्वता के बारे में :- 

ओवुलेशन की महत्वता क्या है ? 

  1. ओवुलेशन के दौरान जो अंडा तैयार होता है अगर वह स्त्री के शुक्राणुओं के साथ मिलता है तो गर्भधारण हो सकता है | 
  2. इस दौरान महिला के शुक्राणु उत्पादिक ग्रंथियों द्वारा अंडे के पास पहुंचते है, इसलिए ओवुलेशन का सही समय और सही तरीके से होना बेहद ही आवश्यक है | 
  3. ओवुलेशन के उत्पन्न होने के बाद, महिला के शारीरिक और मानसिक रूप में भी काफी सुधार आ जाता है  | 

ओवुलेशन की लक्षण क्या है ?

  1. पेट के निचले हिस्से में हल्का-हल्का दर्द होना या फिर तंगी का अनुभूति होना | 
  2. पेट में अस्थायी रूप में बायीं और दायीं तरफ दर्द उठना | 
  3. वजन का बढ़ जाना | 
  4. मूड में बार-बार परिवर्तन होना, जैसे की थकान होना , चिड़चिड़ापन आ जाना, उत्सुकता होना आदि | 

ओवुलेशन की जांच कैसे की जा सकती है ? 

इस प्रक्रिया को जांच करने के कई तरीके है, आइये जानते है इस बारे में :- 

  1. बासल शारीरिक तापमान एक ऐसी तकनीक है, जो शरीर के नियमित तापमान को मापना कार्य करता है, क्योंकि ओवुलेशन के दौरान शरीर के तापमान में थोड़ी वृद्धि हो जाती है | 
  2. अल्ट्रासाउंड स्कैन में एक ऐसा उपकरण का उपयोग किया जाता है, जिसके ज़रिये महिला के अंडाशय में अंडे की स्थति की जांच की जाती है | 

अगर आप भी ओवुलेशन की जांच करवाना चाहते हो तो बेहतर यही आप किसी अच्छे डॉक्टर से जांच करवाएं, इसके लिए आप एमेरिटस हॉस्पिटल का चयन कर सकते है |

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लुधियाना में गैस्ट्रिक बैलून सर्जरी: मोटापे को कम करो कुछ पलों में

अगर पाना चाहते हो सुन्दर और आकर्षित शरीर तो मोटापे को कम करें अभी

क्या है गैस्ट्रिक बैलून सर्जरी ?

बता दे कि यह वो प्रक्रिया है जिससे आज के युवा काफी परेशान रहते हैं,जोकि मोटापा के नाम से विख्यात है | तो आज के इस लेखन में हम जानेगे की आखिर है क्या ये गैस्ट्रिक बैलून सर्जरी….,,

  • बता दे कि प्रिस्टीन केयर एक एल्यूरियन प्रोग्राम की पेशकश करता है, जिसमें एक ऐसी दवा का प्रयोग किया जाता है, जिसमें बिना ऑपरेशन के गैस्ट्रिक बैलून का निर्माण होता है।
  • और साथ ही इसे दुनिया की पहली और मोटापा कम कर, निगलने वाली बैलून कैप्सूल दवा के नाम से जाना जाता हैं और इस दवाई से 16 सप्ताह में औसतन 15% तक वजन कम किया जा सकता है |

प्रक्रिया क्या है इस सर्जरी की :

बता दे की इस सर्जरी को निम्नलिखित प्रक्रियाओं से होकर गुजरना पड़ता है जैसे……,,

  • दरअसल, इस प्रक्रिया में भूख लगने का संकेत आपके दिमाग तक नहीं पहुंचता, जिससे आपको भूख कम लगती है और मोटापे को कम किया जा सकता है |
  • और यहाँ गौरतलब करने वाली बात ये हैं कि इस प्रक्रिया में डॉक्टर आपको सेलाइन वाटर चढ़ाते हैं, ताकि आपकी भूख की क्षमता को कम किया जा सकें |
  • एक एंडोस्कोप ( पतली और लचीली ट्यूब) का उपयोग करके इस प्रक्रिया में डॉक्टर मुंह के माध्यम से और पेट में गुब्बारा विस्थापित करते है। पेट में जगह घेरने के लिए गुब्बारे को खारे पानी के घोल से भर दिया जाता है, जिससे भोजन और पेय के लिए कम जगह बचती है |

सुझाव :

 अगर आप मोटापे से है परेशान तो गैस्ट्रिक बैलून ट्रीटमेंट का करे इस्तेमाल और मोटापे से पाए निज़ात |

कौन से लोग है जो गैस्ट्रिक बैलून ट्रीटमेंट करवा सकते है :

निम्नलिखित कुछ ऐसे लोग है जो इस ट्रीटमेंट को करवा सकते है…..,,

  • पहला जिन लोगों के पेट की कोई सर्जरी न हुई हो |
  • दूसरा यदि आपका बीएमआई 27 से ऊपर है |
  • तीसरा जिन लोगों ने वजन कम करने के अनगिनत असफल प्रयास किए हो |
  • चौथा बांझपन से जूझने वाली महिलाएं।
  • पांचवा डायबिटीज वाले लोग |

गैस्ट्रिक बैलून ट्रीटमेंट करवाने के बाद किन बातों का रखे ध्यान :

निम्नलिखित कुछ बातों का ध्यान रख आप अपने आप को सुरक्षित रख सकते हैं……..

  • धूम्रपान, शराब और तंबाकू के सेवन से बचें |
  • बिना डॉक्टर के परामर्श से किसी भी दवा को शुरू या बंद न करें |
  • निर्देशित उच्च प्रोटीन वाले आहार का पालन करें |
  • चीनी, वसायुक्त और मसालेदार भोजन से बचें |
  • खूब पानी पिएं और हाइड्रेटेड रहें |

गैस्ट्रिक बैलून ट्रीटमेंट का हमारे जेब पर कितना असर पड़ सकता हैं :

 बता दे की मोटापे को कम करने के लिए हम इस ट्रीटमेंट का इस्तेमाल करते है,जिसकी लाग़त हर हॉस्पिटल में इसके उपचार की सुविधा के हिसाब से होती हैं और जिसकी लागत तक़रीबन 70,000 के आस-पास आती हैं |

क्या गैस्ट्रिक बैलून ट्रीटमेंट से हम हवा में उड़ सकते है ?

जी हां, आप पेट के इस गुब्बारे से हवा में उड़ सकते हैं क्युकि वाणिज्यिक हवाई जहाज सामान्य वायु दबाव बनाए रखते हैं, जिसका अर्थ ये है कि गैस्ट्रिक गुब्बारे के साथ उच्च ऊंचाई पर यात्रा करने में कोई समस्या नहीं है |

निष्कर्ष :

यदि आप मोटापे से अत्यधिक परेशान है तो लुधियाना में ही लुधियाना गैस्ट्रो एंड गायनी सेंटर है यहाँ आकर गैस्ट्रिक बैलून सर्जरी करवाए और मोटापे से निज़ात पाए और इसके साथ ही अगर आप, यहाँ पर आए तो एक बार गैस्ट्रिक गुब्बारा ट्रीटमेंट के स्पेस्लिस्ट डॉ. कार्तिक गोयल और डॉ. शुचिता बत्रा से इस परेशानी के बारे में जरूर सलाह ले|

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महिलाओं में बवासीर की समस्या क्या है और इस दौरान किस तरह के लक्षण नज़र आते है ?

बवासीर एक बहुत ही मुसीबत भरी बीमारी है। जिसमें व्यक्ति का उठना-बैठना तक मुश्किल हो जाता है। यह बहुत से लोगों को हो जाती है। बवासीर गुदा में अंदर की तरफ या बाहर मस्सों को पैदा कर देती है। जिसमें बहुत दर्द भी होता है और कभी तो खून भी आता है। लेकिन बवासीर का समय पर उपचार कर इससे राहत पाई जा सकती है। तो चलिए जानते है की महिलाओं में बवासीर के दौरान किस तरह के लक्षण नज़र आते है, और इस समस्या से वह कैसे खुद का बचाव आसानी से कर सकती है, इसके बारे में चर्चा करेंगे ;

बवासीर की समस्या क्या है ?

  • बवासीर को पाइल्स भी कहते है। यह एक तकलीफ से भरी बीमारी है। इसमें गुदा के अंदर की तरफ और बाहर की तरफ सूजन की समस्या आ जाती है। बवासीर गुदा नहर में एक तरह की रक्त वाहिकाएं होती है। यह फैल भी जाती है।
  • बवासीर में गुदा के अन्दर और बाहर मस्से हो जाते है। और वहीं बवासीर दो तरह की होती है। आंतरिक बवासीर और बाहरी बवासीर। 60% लोगों में यह जीवन में कभी ना कभी होती ही है।
  • बाहरी बवासीर में गुदा बाहर होती है जो त्वचा से ढकी होती है। बाहरी बवासीर को देखा जा सकता है।
  • आंतरिक बवासीर गुदा नहर के अंदर होती है। जिसे देख नहीं सकते है आंतरिक बवासीर से खून बहने की संभावना अधिक होती है। स्थिति गंभीर होने पर यह बढ़ भी जाती है।

महिलाओं में बवासीर के दौरान किस तरह के लक्षण नज़र आते है ?

  • गुदा क्षेत्र में खुजली होती है और तेज जलन भी होती है। इसके साथ ही लालीपन की समस्या भी उत्पन्न हो जाती है।  
  • मरीजों को शौचालय जाने के बाद भी ऐसा लगता है जैसे फिर से मल त्याग करने की आवश्यकता हो।
  • शौच करने के दौरान जलन के साथ खून का आना।
  • गुदा के आसपास दर्द का होना। और कभी-कभी यह दर्द असहनीय भी हो जाता है।
  • गुदा के आसपास सूजन का आना और सख्त गांठ का बन जाना।
  • अंडरवियर में या टॉयलेट पेपर पर गुदा को पोंछने के बाद घिनौना बलगम का जमा होना।
  • शौच करने में अत्यधिक दर्द का महसूस होना। 
  • बवासीर से पीड़ित मरीज को शौच करने में बहुत परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

महिलाओं में बवासीर के कारण क्या है ?

  • जो लोग गुदा मैथुन करते है उनमें पाइल्स की बीमारी देखी जाती है।
  • डिलीवरी में गुदा क्षेत्र पर दबाव पड़ने की वजह से महिलाओं को बवासीर होने का खतरा हो जाता है। इसलिए कुछ महिलाओं को प्रसव के बाद बवासीर की समस्या होती है।
  • अत्यधिक धूम्रपान और शराब शरीर के लिए हानिकारक होता है इसका ज्यादा सेवन करना बवासीर का कारण बनता है। यह शरीर में और भी बिमारियों को पैदा करने का कारण बनती है।
  • बवासीर की सबसे बड़ी वजह है कब्ज। कब्ज में मल कठोर हो जाता है। जिसकी वजह से मलत्याग करने में जोर लगाना पड़ता है और मस्से बाहर आ जाते है।
  • अधिकतर मोटी महिलाओं में भी पाइल्स होने का जोखिम रहता है। मोटापा भी इसका एक प्रमुख कारण है। मोटापे को कम करने के लिए रोज एक्सरसाइज करे।
  • महिला बवासीर का एक कारण यह भी होता है की जिन महिलाओं का काम लम्बे समय तक खड़े रहने का है उनमें भी यह समस्या पायी जाती है।
  • अक्सर भारी वजन उठाने की वजह से भी बवासीर की समस्या हो जाती है। तो अगर आप भी भारी वजन उठाने का काम करती है तो सावधानी बरते।
  • जो महिलाएं लगातार बैठी रहती है आलस करती है उनमें भी बवासीर से पीड़ित होने की संभावना ज्यादा रहती है।
  • अधिक तला एवं मसाले युक्त भोजन करने से भी बवासीर की समस्या हो जाती है।
  • भोजन का हमारे शरीर पर बहुत प्रभाव पड़ता है, अगर फाइबर युक्त भोजन नहीं किया जाये तो बवासीर की समस्या हो सकती है। इसलिए अपने खाने में फाइबर से युक्त भोजन शामिल करें।
  • गर्भावस्था के समय प्रोजेस्टेरोन हार्मोन में वृद्धि हो जाती है। यह नसों को आराम देने का काम करते है। जिससे नसों में सूजन आ जाती है। इससे प्रेग्नेंट महिला को कब्ज की समस्या हो जाती है और कब्ज की वजह से पाइल्स की समस्या उत्पन्न होती है।

अगर कब्ज की समस्या की वजह से बवासीर की समस्या का आपको सामना करना पड़ रहा है, तो इससे बचाव के लिए आपको लुधियाना में गैस्ट्रो डॉक्टर का चयन करना चाहिए।

बवासीर का इलाज घर पर कैसे किया जा सकता है ?

  • कब्ज से परेशान लोगों को मल को नरम करने के लिए ओटीसी फाइबर पूरक का उपयोग करना चाहिए। साइलियम और मिथाइलसेलुलोज दो सामान्य फाइबर पूरक है इसलिए बवासीर से बचाव के लिए खूब फाइबर का सेवन करें।  
  • इसमें घरेलू उपचार भी आपकी मदद करेंगे, जैसे ;
  • रोज स्नान के दौरान गुदा स्थान को गर्म पानी से साफ करें। सिर्फ पानी से साफ़ करें साबुन का उपयोग ना करें। साबुन से बवासीर बढ़ सकता है।
  • गुदा पर ठंडे सेक का भी उपयोग करें। इससे बवासीर की सूजन कम हो जाएगी। दर्द से मुक्ति पाने के लिए इबुप्रोफेन, एस्पिरिन खा सकते है।
  • पानी खूब पिएं रोज और 10 से 12 ग्लास पानी तो जरूर से पिएं। पानी शरीर से टॉक्सिन्स को बाहर कर देता है जिससे बीमारियां कम होती है।
  • विशेष रूप से योग और व्यायाम करें और एक जगह पर ज्यादा देर तक बैठे से बचे।
  • अगर दर्द ज्यादा हो रहा है तो प्रतिदिन 10 मिनट के लिए गर्म पानी के टब में बैठे। बाहरी बवासीर से राहत पाने के लिए गर्म पानी की बोतल पर बैठना भी लाभदायक होता है। यदि दर्द ज्यादा ही हो रहा है जो की असहनीय है तो ओवर-द-काउंटर सपोसिटरी का उपयोग करें। यह ऑनलाइन या फिर दुकानों में मिल जाएंगे।
  • वहीं अगर घरेलू उपचार करने पर भी आराम नहीं मिल रहा है तो डॉक्टर से इलाज करवाएं। डॉक्टर रबर बैंड बंधाव से इसका इलाज करते है। इसके अलावा इंजेक्शन थेरेपी या स्क्लेरोथेरेपी से भी इलाज किया जाता है। डॉक्टर एक रसायन को सीधे रक्त वाहिका में इंजेक्ट करते है। जिससे की बवासीर का आकार छोटा हो जाता है।

पंजाब में बवासीर का उपचार अनुभवी डॉक्टरों की मदद से आसानी से किया जा सकता है।

बवासीर के इलाज के लिए बेस्ट सेंटर !

अगर बवासीर की समस्या आपकी काफी बढ़ते जा रहीं है तो इससे बचाव के लिए आपको लुधियाना गैस्ट्रो एन्ड गयने सेंटर का चयन करना चाहिए। इसके अलावा महिलाओं में इस तरह की समस्या क्यों होती है इसके बारे में भी आपको हम उपरोक्त बता चुके है, तो कृपया उपरोक्त्त बातों को ध्यान में रखें अगर बवासीर की समस्या से खुद का बचाव करना चाहती है। 

निष्कर्ष :

महिलाओं में बवासीर की समस्या का होना काफी गंभीर बात है इसलिए इससे बचाव के लिए आपको जरूरी है की जितना जल्दी हो सकें इस समस्या से खुद का बचाव करें और किसी भी तरह की समस्या आने पर डॉक्टर का चयन करें।

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बवासीर को कैसे घरेलु उपायों की मदद से ठीक कर सकते है ?

बवासीर जिसे हेमरॉइड्स के नाम से भी जाना जाता है, ये गुर्दा नहर वाले हिस्से में सूजी हुई नसें होती है। अपनी सामान्य अवस्था में, वे मल के मार्ग को नियंत्रित करने के लिए आरामदायक गद्दे की तरह काम करती है। बवासीर की समस्या का सामना महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों को ज्यादा करना पड़ता है। और इस समस्या को लेकर पुरुष वर्ग काफी परेशान भी रहते है क्युकी इसकी वजह से उन्हें काफी एलोपैथिक दवाइयों का सेवन करना पड़ता है। पर आज के लेख के माध्यम से हम आपको बताएंगे की आप कैसे घरेलु उपचार की मदद से खुद का बचाव आसानी से कर सकते है ;

बवासीर होने के कारण क्या है ? 

  • बवासीर के कारणों का पता लगाना थोड़ा मुश्किल है, क्युकि इसका कोई स्पष्ट कारण सामने प्रस्तुत नहीं है। लेकिन कई महान विशेषज्ञों का कहना है कि बवासीर होने का कारण आपके खान-पान से जुड़ा होता है। अगर आप गरिष्ठ आहार लेते है, चावल की पीठी खाते है, तीखे और तेल युक्त पदार्थ का सेवन करते है, मांस, कफ पैदा करने वाले आहार और पेट में कब्ज एवं जलन पैदा करने वाले खाद्य का सेवन करते है, तो आपको बवासीर होने का खतरा हमेशा बना रहता है।  
  • इसके अलावा और भी कई भौतिक कारण है जो बवासीर के लिए जिम्मेदार माने जाते है। जैसे की गुदा क्षेत्र पर दबाव का बनना या लगातार एक ही जगह लंबे समय तक बैठे या खड़े रहना। 
  • वहीं बवासीर को पूर्ण रूप से सही करने के लिए आपको अपने खान-पान में बहुत ज्यादा सकारात्मक बदलाव लाना चाहिए।

बवासीर किसी न किसी आंतरिक समस्या के कारण होता है, इसलिए जरूरी है की अपनी समस्या के बारे में जानने के लिए आपको लुधियाना में गैस्ट्रो डॉक्टर का चयन करना चाहिए।

बवासीर के प्रकार क्या है ?

बवासीर मुख्यतः दो प्रकार के होते है, और इन प्रकारों के आधार पर आप जान सकते है की किस तरह के बवासीर का खतरा सबसे ज्यादा होता है ;

  • खूनी बवासीर :

इस प्रकार के बवासीर में गुदा मार्ग में मस्से आ जाते है जो रक्त और म्यूक्स से भरे होते है। मल त्याग करते समय इनसे खून टपकता है। और कई बार जब मस्से बाहर आ जाते है तो इन्हें दबाने के बावजूद भी यह अंदर नहीं जाते है। जिससे व्यक्ति की परेशानी और बढ़ जाती है।

  • बादी बवासीर :

यह पूरी तरह से दर्द का स्रोत माना जाता है, इस प्रकार के बवासीर में मरीज को बार-बार खुजली और जलन की समस्या महसूस होती है। कब्ज होने पर या अन्य पेट संबंधी समस्या होने पर यह कष्टदायक हो जाते है, और चलने-फिरने या उठने बैठने में पीड़ा का सामना करना पड़ता है।

बवासीर के दौरान दिखने वाले लक्षण किस तरह के होते है ?

  • गुदा वाले हिस्से में खुजली की समस्या का सामना करना। 
  • गुदा वाले हिस्से में दर्द, खासकर लंबे समय तक बैठे रहने पर। 
  • आपके गुदा वाले हिस्से के पास एक या ज़्यादा सख्त, कोमल गांठ का निकलना। 
  • आपके मलाशय से खून का रिसना। यह शौच के बाद मल, टॉयलेट पेपर या टॉयलेट बाउल में चमकीले लाल खून के धब्बों का दिखाई देना। 
  • मल त्याग करते समय दर्द और परेशानी का बढ़ना।

बवासीर के लक्षण दिखने पर आपको पंजाब में बवासीर का उपचार करवा लेना चाहिए। 

बवासीर के लिए कौन-से घरेलु उपचार है सहायक ?

सिट्ज बाथ: 

गर्म पानी से नहाना, बवासीर के कारण होने वाली जलन को शांत करता है। वहीं बवासीर में आपको सिटज़ बाथ इस्तेमाल करना चाहिए। क्युकि सिट्ज़ बाथ एक ऐसी विधि है, जिसमें एक छोटे प्लास्टिक के टब का उपयोग किया जाता है जो टॉयलेट सीट पर फिट हो जाता है ताकि आप प्रभावित हिस्से को बस उसमें डुबो सकें। इस पानी में बीटाडीन का घोल या डॉक्टर द्वारा सुझाए गए अन्य एंटीसेप्टिक घोल का उपयोग किया जा सकता है। 

आइस पैक को लगाना: 

एक बार में कम से कम 15 मिनट तक सूजन से राहत पाने के लिए गुदा वाले हिस्से पर आइस पैक या कोल्ड कंप्रेस लगाएं। बड़े, दर्द करने वाले बवासीर के लिए ये कोल्ड कंप्रेस दर्द से निपटने का एक बेहद असरदार उपाय है।

नारियल का तेल: 

नारियल के तेल में मज़बूत एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते है जो त्वचा लाल होने और सूजन को कम कर सकते है। इसमें एनाल्जेसिक (दर्द निवारक) गुण होते है, जो बवासीर के कारण होने वाली परेशानी को कम करने में मदद कर सकते है। इसमें एंटीबैक्टीरियल (जीवाणु को मारने वाले) गुण भी होते है, जो बवासीर के लक्षणों को कम करने में मदद करते है।

व्यायाम: 

बवासीर के लक्षणों को असरदार तरीके से प्रबंधित करने के लिए घर पर व्यायाम करना एक शानदार उपाय हो सकता है। नियमित पेल्विक फ्लोर एक्सरसाइज़ करना बवासीर के लिए एक बेहतरीन उपाय है। अपनी पेल्विक फ्लोर की माँसपेशियों को मज़बूत करने से, बिना ज़्यादा दबाव डाले अपनी आंत को खाली करने में आपकी मदद मिल सकती है।

तनाव प्रबंधन करना और अच्छी नींद लेना: 

आराम करने और तनाव को असरदार तरीके से प्रबंधित करने के लिए एक कड़ा प्रयास करने से आंतों को अच्छी आदतें अपनाने में मदद मिलती है। रात में भरपूर नींद लेने से भी पाचन स्वास्थ्य अच्छा बनाए रखने में मदद मिलती है। ऐसा होने पर, आँतों से मल भी आसानी से होकर जा पाता है।

हाइड्रेशन: 

भरपूर पानी और फलों के रस जैसे अन्य स्वस्थ तरल पीने से आपकी आंत कम शुष्क होती है। जब आपका शरीर अच्छी तरह से हाइड्रेटेड होता है, तो आपका पाचन स्वास्थ्य बेहतर होने लगता है, जिससे आपको मल त्याग के दौरान दबाव कम डालना पड़ता है।

ज़्यादा फाइबर वालें आहार: 

भरपूर मात्रा में अघुलनशील और साथ ही घुलनशील फाइबर वाला संतुलित आहार लेने से आपको नियमित रूप से मलत्याग करने में मदद मिलेगी। अघुलनशील फाइबर आपके मल का वज़न बढ़ाते है, जिससे आपको मल त्यागने के दौरान ज़ोर कम लगाना पड़ता है। फाइबर को आंतों को स्वस्थ रखने में मदद करने के लिए भी जाना जाता है।

लहसुन का उपयोग :

  • लहसुन में पाए जाने वाले एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-बैक्टीरियल गुण बवासीर के चलते होने वाले दर्द को और सूजन को कम करते है। इसे इस्तेमाल करना बेहद आसान है और इसे दो तरह से इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर बवासीर गुदा मार्ग के बाहर है तो आप लहसुन की चार कलियों को कूटकर एक गिलास पानी में मिलाएं, अब इस पानी को आप गैस पर तब तक उबालें जब तक पानी का रंग पूरी तरह से बदल न जाए। 
  • फिर अब आप एक सूती कपड़े को इस पानी में भिगो दें और उस कपड़े को अपने मस्से वाले स्थान पर 15 मिनट के लिए लगाकर छोड़ दें, ऐसा दिन में आप दो बार कर सकते है।
  • वहीं अगर बवासीर गुदा मार्ग के भीतर या गुदा मार्ग में ही है, तो आपको लहसुन की कुछ कलियों से ज्यूस निकालना है और उस ज्यूस को गुदा मार्ग के भीतर सोने से पहले डालना है। ऐसा करने से दर्द और सूजन काफी हद तक कम हो जाते है।

बवासीर के इलाज के लिए बेस्ट सेंटर !

आप अगर चाहते है की आपको बवासीर का इलाज मिल सके तो इसके लिए आपको लुधियाना गैस्ट्रो एन्ड गयने सेंटर का चयन करना चाहिए। पर साथ ही आपको क्यों इस सेंटर का चयन करना चाहिए, इसके बारे में जानना भी जरूरी है, जैसे ;

अनुभवी डॉक्टर :

जी हां इस सेंटर में मरीजों का इलाज अनुभवी डॉक्टरों के द्वारा किया जाता है, जिससे मरीज को अपनी समस्या का समाधान भी आसानी से मिल जाता है। 

आधुनिक उपकरण का चयन करना :

इस सेंटर में मरीजों की जाँच या फिर उनके इलाज के लिए उपयोग किए जाने वाले उपकरण बिलकुल सही और सुचारु रूप से कार्य करते है। 

दवाई में छूट का मिलना :

जी हां, अगर आप इस सेंटर से अपना इलाज करवाते है, तो आपको 30 प्रतिशत तक की छूट भी मिलती है अपने इलाज को लेकर। 

निष्कर्ष :

बवासीर का इलाज करने के लिए कई घरेलू इलाज मौजूद है। वहीं मरीज बिना किसी हिचकिचाहट के इनका इस्तेमाल कर सकते है, लेकिन इस्तेमाल करने से पहले उन्हें अपने डॉक्टर या वैद्य से इस बारे में अवश्य परामर्श लेना चाहिए। क्युकी अपने मन मुताबिक किसी भी घरेलू उपाय का इस्तेमाल करना खतरनाक साबित हो सकता है।

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पुरुषों में बवासीर के क्या है – लक्षण, कारण, इलाज और बचाव के तरीके ?

बवासीर जिसे पाइल्स भी कहा जाता है, जोकि गुदा या नीचे मलाशय में सूजी हुई नसें होती है, जो असुविधा और दर्द का कारण बन सकती है। महिलाओं की तुलना में पुरुषों में बवासीर होने की संभावना अधिक होती है, विशेष रूप से 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में। तो आज के लेख में जानेंगे की बवासीर की समस्या से हम कैसे खुद का बचाव कर सकते है, इसके लक्षण क्या है, किन कारणों से ये समस्या होती है और कैसे इससे खुद का बचाव कर सकते है ;

पुरुषों में बवासीर की समस्या क्या है ?

  • पाइल्स, जिसे बवासीर के नाम से भी जाना जाता है, एक ऐसी स्थिति है जो गुदा और निचले मलाशय में नसों को प्रभावित करते है। वे मल त्याग के दौरान असुविधा, दर्द और रक्तस्राव का कारण बन सकते है। पुरुषों में पाइल्स एक आम स्थिति है, जो खासकर 50 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में पाई जाती है।
  • वहीं समय पर अगर इसका इलाज न किया गया तो हालात और बिगड़ सकते है और प्रभावित हिस्से से खून भी बह सकता है। आंतरिक और बाहरी दो प्रकार के बवासीर होते है, जो पुरुषों को प्रभावित कर सकते है।
  • आंतरिक बवासीर जो मलाशय के अंदर होता है और बिना दर्द के रक्तस्राव को उत्पन्न करता है। वे मल त्याग के दौरान जुड़े गुर्दे से बाहर निकल सकते है और असुविधा या जलन पैदा कर सकते है।
  • दूसरी ओर बाहरी बवासीर, गुदा के बाहर विकसित होते है और गंभीर दर्द, खुजली और परेशानी पैदा कर सकते है। वे मल त्याग के दौरान रक्तस्राव भी कर सकते है।
  • एक आदमी के लिए एक ही समय में आंतरिक और बाहरी दोनों बवासीर होना भी संभव है। यदि आप बवासीर के किसी भी लक्षण का अनुभव करते है, तो चिकित्सकीय ध्यान देना आवश्यक है, क्योंकि विभिन्न उपचार विकल्पों के साथ उनका प्रभावी ढंग से इलाज किया जाना जरूरी है।

पुरुषों में बवासीर के कारण क्या है ?

पुरुषों में पाइल्स की समस्या होने का कोई सटीक कारण बताना थोड़ा मुश्किल है। लेकिन गुदा में मौजूद रक्त वाहिकाओं और ऊतकों के ऊपर बढ़ते दबाव से बवसीर होने की संभावना बढ़ जाती है। वहीं इसके कुछ निम्निलिखित कारण है जिसके कारण बवासीर की समस्या उत्पन्न होती है :

  • यदि आपके द्वारा कम फाइबर वाले आहार का सेवन किया जाता है, तो इससे ये समस्या उत्पन्न होती है, क्युकी फाइबर का सीमित सेवन आपके मल को सख्त बना देते है, जिससे मल त्याग के दौरान अधिक तनाव की समस्या उत्पन्न होती है। इससे मलाशय और गुर्दे की नसों पर दबाव बढ़ जाता है।
  • पुरुषों में बवासीर के सबसे सामान्य कारणों में से एक कारण ये भी है की मल त्याग के दौरान बहुत अधिक जोर लगाना है। इसकी संभावना तब ज़्यादा होती है जब कब्ज या दस्त हो।
  • जो पुरुष लंबे समय तक बैठे रहते है, जैसे ट्रक ड्राइवर या ऑफिस वर्कर, उनमें बवासीर होने की संभावना अधिक होती है। लंबे समय तक बैठने से गुदा क्षेत्र में नसों पर दबाव पड़ता है, जिससे उनमें सूजन आ जाती है।
  • जो पुरुष नियमित रूप से भारी सामान उठाते है, उन्हें भी बवासीर होने का खतरा होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि सामान उठाने के कारण गुर्दे की नसों में सूजन आ सकती है।
  • पुरुषों की उम्र बढ़ने के साथ बवासीर अधिक आम हो जाती है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि गुदा क्षेत्र में ऊतक उम्र के साथ कमजोर हो जाते है, जिससे उनमें सूजन होने की संभावना हो जाती है।

अगर आप बवासीर की समस्या से बहुत परेशान है, तो पंजाब में बवासीर का उपचार मिलना आसान है, इसलिए इसका इलाज यहाँ से जरूर करवाए।

बवासीर में पुरुषों को किस तरह के खाने की चीजों का सेवन करना चाहिए !

  • उच्च फाइबर वाले खाद्य प्रदार्थो का सेवन पुरुषों को बवासीर में करना चाहिए, क्युकि इस तरह का भोजन मल को नरम करने और कब्ज को कम करने में मददगार साबित होता है, जो बवासीर को बढ़ा सकता है। इन खाद्य पदार्थों में साबुत अनाज, फलियाँ, फल, सब्जियाँ, मेवे, बीज और चोकर शामिल है।
  • अगर आप बवासीर की समस्या को कम करना चाहते है, तो इसके लिए विटामिन सी से भरपूर खाद्य पदार्थ का सेवन करना चाहिए, विटामिन-सी वाले खाद्य प्रदार्थ जैसे – खट्टे फल, शिमला मिर्च और ब्रोकली, अपने आहार में शामिल करने के लिए अच्छे विकल्प है।
  • भोजन में पौधों के यौगिक फ्लेवोनोइड्स होते है, जो सूजन को कम कर सकते है और बवासीर के लक्षणों को कम कर सकते है। खट्टे फल, जामुन और डार्क चॉकलेट ऐसे खाद्य पदार्थों के उदाहरण है।
  • बवासीर की समस्या से छुटकारा पाने के लिए आपको अपने आहार में दही को शामिल करना चाहिए। इसमें अच्छे बैक्टीरिया होते है, जो आंत के स्वास्थ्य में सुधार कर सकते है और मल त्याग को नियंत्रित कर सकते है, अंततः कब्ज और बवासीर के लक्षणों के विकास की संभावना को कम कर सकते है।  
  • अगर आप आंत, फेफड़े या पेट संबंधित समस्या से छुटकारा पाना चाहते है, तो इसके लिए आपको लुधियाना में गैस्ट्रो डॉक्टर का चयन करना चाहिए।

पुरुषों में बवासीर का पता किससे लगाया जा सकता है ?

  • डिजिटल रेक्टल एग्जामिनेशन, की मदद से पुरुष बवासीर का पता लगाना। 
  • एनोस्कोपी, की मदद से बवासीर के ग्रेड की जांच की जाती है।
  • कोलोनोस्कोपी, की मदद से डॉक्टर आपके संपूर्ण आंत की जाँच करते है, जिससे बवासीर की समस्या का पता लगाया जा सकता है।
  • बवासीर की समस्या होने पर मलाशय के निचले हिस्से की जांच को ‘सिग्मायोडोस्कोपी’ की मदद से आसानी से किया जा सकता है, जिससे बवासीर का पता आसानी से लगाया जा सकता है।

 

पुरुषों में बवासीर के दौरान किस तरह के लक्षण नज़र आते है ?

  • बवासीर में गुदा और मलाशय की नसों में सूजन के कारण मल त्यागते समय तेज दर्द का होना।
  • सूजन वाली नसों की उपस्थिति के कारण गुदा क्षेत्र में खुजली या जलन की समस्या का उत्पन्न होना।
  • बवासीर में सूजी हुई नसों के फटने से मल त्याग के दौरान या बाद में रक्तस्राव का होना।
  • पाइल्स में नसों के बाहर निकलने के कारण गुदा के आसपास गांठ या सूजन हो सकती है।
  • बवासीर आपके अंदर अधूरे मल त्याग की भावना पैदा कर सकते है, जो मल के सामान्य मार्ग को बाधित करता है।
  • गुर्दे और मलाशय में सूजी हुई नसों पर दबाव पड़ने पर बैठने में असुविधा का सामना करना।

बवासीर की समस्या होने पर किस तरह से खुद का बचाव करें ? 

  • स्वस्थ और फाइबर से भरपूर भोजन मल त्याग को नियंत्रित करने और कब्ज को रोकने में मदद करते है, जो गुदा और मलाशय में नसों पर दबाव डाल सकता है, जिससे बवासीर का निर्माण होता है।
  • आहार और व्यायाम के माध्यम से स्वस्थ वजन बनाए रखने से गुदा और मलाशय में नसों पर दबाव कम करने और बवासीर के विकास के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।
  • नियमित व्यायाम भी कब्ज को रोकने और रक्त प्रवाह में सुधार करने में मदद कर सकता है, जिससे बवासीर के खतरे को कम किया जा सकता है।
  • मल त्याग के दौरान जोर लगाने से गुदा और मलाशय में नसों पर दबाव पड़ सकता है, जिससे बवासीर हो सकता है। इसे रोकने के लिए, समय निकालना महत्वपूर्ण है और बाथरूम का उपयोग करते समय कृपया जल्दबाजी न करें।
  • भारी सामान उठाने से जितना हो सकें बचें, क्युकि भारी सामान आपके गुर्दे और मलाशय की नसों पर दबाव डाल सकते है, जिससे बवासीर की समस्या उत्पन्न होती है। 

पुरुषों में बवासीर का इलाज कैसे किया जाता है ?

बवासीर का शुरू में पता लगने पर इसका इलाज आप कुछ रोकथाम करके कर सकते है, लेकिन जब इसकी स्थिति गंभीर हो जाए तो इसके लिए आपको सर्जरी का सहारा लेना पड़ सकता है, जैसे ;

हेमोराहाइडेक्टोमी : 

यह आपके अंदर उत्पन्न आंतरिक या बाहरी बवासीर को हटा देता है, जो आगे बढ़ गया है।

स्टेपल्ड हेमोराहाइडेक्टोमी : 

एक स्टेपलिंग उपकरण आंतरिक बवासीर को गुदा में वापस खींचता है या उन्हें पूरी तरह से हटा देता है।

पाइल्स के लिए लेजर सर्जरी : 

एक सर्जन बवासीर में रक्त की आपूर्ति को काटने के लिए लेजर का उपयोग करते है, जिससे बवासीर सिकुड़ जाती है। और व्यक्ति को बवासीर की समस्या से निजात आसानी से मिल जाता है।

ध्यान रखें :

बवासीर की समस्या पुरुषों में काफी गंभीर समस्या है, इसलिए इससे बचाव करना बहुत जरूरी है। वहीं इसकी स्थिति गंभीर होने पर आपको सर्जरी का सहारा लेना चाहिए और आप चाहें तो इस सर्जरी को लुधियाना गैस्ट्रो एन्ड गयने सेंटर से भी करवा सकते है। 

निष्कर्ष :

पुरुषों में बवासीर की समस्या एक गंभीर बीमारियों में से एक है, जो उनके जीवन शैली पर काफी गहरा गलत छाप छोड़ती है। बवासीर की समस्या से बचाव करना बहुत जरूरी है, इसलिए आप इस समस्या से बचाव के लिए किसी बेहतरीन हॉस्पिटल, सेंटर या डॉक्टर का चयन करें जो आपको आपकी समस्या से आसानी से छुटकारा दिला सकें।

 

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पेट में जलन और सूजन की समस्या को नज़रअन्दाज़ करना जानिए कितना खतरनाक हो सकता है !

गैस्ट्राइटिस आजकल एक काफ़ी आम प्रॉब्लम बनती जा रही है, वहीं लोग इसे महज़ एसिडिटी समझकर इसे नज़रअंदाज़ करते है, और जब दिक्कत बहुत ज़्यादा बढ़ जाती है तो इसको जल्दी से ठीक नहीं किया जा सकता है, जिससे लोगों की दिक्कतें और बढ़ जाती है। पर आज के लेख के माध्यम से हम जानेगे की हम कैसे पेट में ही रहें जलन और सूजन की समस्या से खुद का बचाव कर सकते है ;

पेट में गैस्ट्राइटिस या सूजन की समस्या क्या है ?

  • गैस्ट्राइटिस का मतलब होता है पेट में सूजन का आना है और ये समस्या का एक ऐसा समूह है जिसमें पेट के अंदर की परत कमज़ोर होने लगती है। 
  • वहीं परत कमज़ोर होने के कारण पेट में जो एसिड और अन्य पदार्थ बनते है, उनसे पेट में सूजन और जलन की समस्या उत्पन्न हो जाती है। 
  • इसके अलावा ये आजकल एक बहुत आम समस्या है, तो वहीं अगर गैस्ट्राइटिस का सही समय पर इलाज न किया जाए तो इससे आगे जाकर पेट में छाले, ज़ख्म या कुछ मामलों में कैंसर की समस्या भी उत्पन्न हो सकती है।

पेट में किसी भी तरह की समस्या होने पर आपको लुधियाना में गैस्ट्रो डॉक्टर का चयन करना चाहिए।

पेट में जलन और सूजन के क्या कारण है ?

  • सबसे पहला कारण है, खाने-पीने का ध्यान न रखना, जिसकी वजह से आपको पेट से संबंधित समस्या का सामना करना पड़ सकता है। 
  • वहीं बहुत ज्यादा तली या तीखी चीज़ें खाने से आपको गैस्ट्राइटिस की शिकायत हो सकती है। और तो और जंक फ़ूड से तो ये दिक्कत और बढ़ जाती है। 
  • फिजिकल एक्टिविटी की कमी और स्ट्रेस भी कारण हो सकते है, पेट में जलन और सूजन के कारण।  
  • बहुत ज्यादा स्मोकिंग, और शराब पीने से गैस्ट्राइटिस की समस्या हो सकती है। 
  • बहुत ज़्यादा पेन किलर या एंटीबायोटिक खाने से भी पेट में सूजन हो सकती है। 
  • कुछ बीमारियों के कारण भी ऐसा होता है, जैसे – HIV और ऑटोइम्यून गैस्ट्राइटिस, वहीं आपको बता दें की इस बीमारी में शरीर पेट के अंदर की परत को ख़ुद नुकसान पहुंचाने लगता है।

पेट की अंधरुनि समस्या को जानने के लिए आपको डॉक्टर के सलाह पर लुधियाना में कोलोनोस्कोपी से इसकी जाँच को करवाना चाहिए।

पेट में जलन और सूजन के दौरान कौन-से लक्षण नज़र आते है ?

  • इसके लक्षणों में आपको पेट के ऊपरी हिस्से या लेफ्ट साइड में दर्द हो सकता है।
  • ये दर्द पीछे कमर में भी आपको महसूस हो सकता है। 
  • पेट में जलन का महसूस होना। 
  • पेट का फूला हुआ या टाइट महसूस होना। 
  • पेट का भरा-भरा लगना। 
  • बिना ज्यादा खाए डकार का आना। 
  • उल्टी जैसा महसूस होना। 
  • एसिड ऊपर आने के कारण सीने में जलन का महसूस होना। 
  • भूख में कमी का आना।  
  • अगर पेट में अल्सर (छाले) या कैंसर हो गया है तो काफ़ी ज़्यादा दर्द आपको महसूस हो सकता है। 
  • भूख का न लगना और वज़न का बहुत ज़्यादा कम हो जाना। 
  • उल्टी की समस्या और मल में खून का आना।

पेट में जलन की समस्या से कैसे करें खुद का बचाव ?

  • अगर आप पेट में जलन की समस्या से खुद का बचाव करना चाहते तो इससे बचाव के लिए आपको खाना-खाने के बाद तुरंत नहीं लेटना चाहिए, क्युकी खाने के बाद तुरंत लेटने से एसिड रिफ्लक्स जैसी पाचन संबंधी दिक्कतें सामने आने लगती है। 
  • खाना-खाने के बाद कम से कम आपको 1000 स्टैप्स चलना चाहिए, ऐसा करने से डाइजेस्टिव सिस्टम, ब्लड शुगर लेवल और आपकी सेहत अच्छी रहती है।

पेट में जलन और सूजन की समस्या का इलाज क्या है ?

  • गैस्ट्राइटिस से निपटने के लिए कई दवाइयां उपलब्ध है, ये दवाइयां एसिड को बनाना बंद कर देती है, इससे पेट की परत काफ़ी हद तक ठीक हो जाती है। 
  • हिस्टामिन ब्लॉकर भी एसिड को कम करने में काफी मदद करते है, लिक्विड एंटासिड अंदर के बने एसिड को न्यूट्रलाइज करते है, इसके बाद भी समस्या ठीक नहीं होती तो डॉक्टर से सलाह आपको लेनी चाहिए। 
  • गैस्ट्राइटिस का इलाज अगर सही समय पर न किया जाए तो अल्सर और कैंसर तक की समस्या का आपको सामना करना पड़ सकता है। इसलिए अगर उपरोक्त बताए गए लक्षण आपको महसूस हो रहे है, तो केवल एसिडिटी की दवा न लें, बल्कि डॉक्टर को ज़रूर दिखाएं। 

सुझाव :

पेट की समस्या को नजरअंदाज करना मतलब मौत के मुँह में खेलने के सामान है। इसलिए जरूरी है की अगर आप पेट से जुडी किसी भी तरह की समस्या का सामना कर रहें, तो इससे बचाव के लिए आपको लुधियाना गैस्ट्रो एन्ड गयने सेंटर का चयन करना चाहिए। 

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प्रेगनेंसी के दौरान पीलिया के लक्षण दिखने पर कैसे करें इसका इलाज ?

प्रेगनेंसी एक ऐसा स्टेज है, महिलाओं की ज़िन्दगी में की इस अवस्था में उन्हे अपना खास ध्यान रखना चाहिए, लेकिन कई बार ध्यान रखने के बाद भी अगर महिलाओं को पीलिया की परेशानी हो जाए तो ऐसे में वो कैसे खुद का बचाव कर सकती है इसके बारे में आज के लेख में चर्चा करेंगे

प्रेगनेंसी के दौरान पीलिया की समस्या क्या है ?

  • प्रेगनेंसी में पीलिया लिवर की समस्या की वजह से होता है। प्रेगनेंसी में लिवर संबंधी विकार बेहद ही कम होता है, लेकिन इसके होने की वजह से बच्चे और मां दोनों को कई अन्य रोग होने की संभावना बढ़ जाती है। 
  • प्रेगनेंसी में लगभग तीन प्रतिशत महिलाओं को ये समस्या गंभीर रूप से परेशान कर सकती है। पीलिया होने पर महिलाओं की आंखों का रंग पीला हो जाता है। दरअसल जब लिवर में बिलीरुबिन बनने की प्रक्रिया बढ़ जाती है, तो ये रोग हो जाता है। 
  • प्रेगनेंसी में महिलाओं को पित्त की पथरी, कोलेस्टेसिस, हाई बीपी होने की वजह से लिवर का कार्य प्रभावित हो जाता है, इसकी वजह से भी पीलिया होने की संभावना बढ़ जाती है।
  • अगर आप भी प्रेगनेंसी के दौरान पीलिया की समस्या का सामना कर रहीं है तो इससे बचाव के लिए आपको गायनोलॉजिस्ट डॉक्टर का चयन करना चाहिए।

प्रेगनेंसी के दौरान पीलिया में कौन-से लक्षण नज़र आते है ?

  • जी मिचलाना व उल्टी आने की समस्या का सामना करना। 
  • पीले रंग के पेशाब का आना। 
  • आंखों के रंग का पीला होना। 
  • कमजोरी महसूस होना। 
  • बुखार की समस्या का सामन करना। 
  • वहीं इसके अन्य लक्षणों में ;
  • वजन का तेजी से कम होना।   
  • भूख का न लगना। 
  • पेट में दर्द का होना। 
  • हल्के रंग के मल का आना।  
  • कब्ज की शिकायत होना, आदि।  
  • अगर आपमें पीलिया के ऐसे लक्षण नज़र आ रहें है, तो डिलीवरी के दौरान पेनलेस नार्मल डिलीवरी होने की संभावना बहुत कम रह जाती है। इसलिए पीलिया के लक्षण नज़र आने पर जल्द डॉक्टर का चयन करें।

प्रेगनेंसी के दौरान पीलिया का इलाज कैसे किया जाता है ?   

  • प्रेगनेंसी में एनीमिया की वजह से होने वाले पीलिया का इलाज आयरन युक्त आहार से किया जा सकता है। इसके अलावा पीलिया के मुख्य कारण के आधार पर ही उसका इलाज किया जाता है। इसकी पहचान होने के बाद डॉक्टर इलाज शुरु कर देते है।  
  • हेपेटाइटिस की वजह से होने वाले पीलिया में डॉक्टर मरीज को स्टेरॉयड की दवाएं देते है, ताकि मरीज़ को जल्दी फ़ायदा मिल सकें।  
  • कई बार कुछ दवाओं के इस्तेमाल से भी व्यक्ति को पीलिया हो सकती है, ऐसे में डॉक्टर सबसे पहले उन दवाओं के सेवन को बंद कर देते है।  
  • पीलिया के संक्रमण से जुड़ी समस्याओं के लिए डॉक्टर कई बार एंटी बायोटिक्स दवाएं देते है। जिसका किसी भी तरह का कोई नुकसान व्यक्ति को नहीं होता है।  

इसके अलावा आप चाहें तो गर्भवती महिला के पीलिया का इलाज लुधियाना गैस्ट्रो एन्ड गयने सेंटर से भी करवा सकते है।

पीलिया में गर्भवती महिलाएं किन खाने की चीजों का रखें खास ध्यान !

  • गन्ने का जूस पिएं ताकि पीलिया की समस्या से बचाव हो सकें। 
  • ऐसी अवस्था में पीलिया होने पर जितना हो सके व्यक्ति को अपने शरीर को हाइड्रेट रखना चाहिए। 
  • जितना हो सकें पीलिया के मरीज को छाछ या फिर दही का सेवन करना चाहिए।
  • मूली के रस को पिएं। 
  • नीम की पत्तियों का सेवन करें आदि।

पीलिया होने पर गर्भवती महिलाएं किन चीजों का करें परहेज ?

  • डॉक्टर के द्वारा हमेशा पीलिया के मरीजों को मसालेदार चीजों का सेवन न करने की सलाह दी जाती है। इसके अलावा, जंक फूड से भी परहेज करना चाहिए। क्युकि इनमें मसालों का अधिक इस्तेमाल किया जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए नुकसान भी साबित होता है, खास करके गर्भवती महिलाओं के लिए।
  • फिर चाय और कॉफी का सेवन भी नहीं करना चाहिए। 
  • पीलिया के मरीजों को अचार का सेवन नहीं करना चाहिए। इसके अलावा नमक से भी परहेज करना चाहिए। तो वहीं मीट, चिकन और अंडे का सेवन भी नहीं करना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न !

गर्भावस्था के दौरान पीलिया होने के क्या कारण है ?

प्रेग्नेंसी के दौरान इंफ़ेक्शन या वायरल हेपेटाइटिस, पीलिया की सबसे आम वजह में शामिल है। हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी, या ई इन सभी वायरस से वायरल हेपेटाइटिस जैसा गंभीर इंफ़ेक्शन हो सकता है। 

अगर गर्भवती महिला को पीलिया हो जाए तो क्या होगा ?

प्रेगनेंसी के दौरान लिवर से जुड़ी कई बीमारियों का जोखिम रहता है। जिसमें पीलिया मतली उल्टी और पेट में दर्द शामिल है। गर्भावस्था के दौरान लिवर से जुड़ी बीमारी न सिर्फ मां बल्कि बच्चे की जान के लिए भी ख़तरनाक साबित हो सकती है।

कौन-से फल पीलिया को कम करते है ?

गाजर और चुकंदर का जूस पीलिया के मरीजों के लिए रामबाण इलाज है। अगर नियमित रूप से इन दोनों फलों का सेवन इनके द्वारा किया जाता है, तो पीलिया की समस्या से ये छुटकारा पा सकते है।  

क्या पीलिया में खरबूजा खा सकते है ?

बिलकुल खा सकते है, इसके अलावा पपीता भी पीलिया से राहत देने में मदद करते है।

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गर्भवती महिलाओं को टाइप 1 डायबिटीज में किस तरह की सावधानियों को बरतना चाहिए !

गर्भावस्था एक ऐसा पड़ाव है हर महिला की ज़िन्दगी में की इस पड़ाव से तो हर महिला होकर गुजरती ही है, पर गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को कई तरह की समस्या का भी सामना करना पड़ सकता है, तो वहीं गर्भावस्था में कई महिलाएं टाइप 1 डायबिटीज की समस्या का भी सामना करती है, तो चलिए जानते है की इस तरह की समस्या से कैसे वो खुद का बचाव कर सकती है, और साथ ही किन बातों का उन्हे इस दौरान खास ध्यान रखना चाहिए;

महिलाओं में डायबिटीज की समस्या क्या है ?

  • डायबिटीज लंबे समय तक चलने वाली एक गंभीर स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍या है। वहीं इस बीमारी को ठीक करना मुश्किल है, लेकिन इसके लक्षणों को कंट्रोल किया जा सकता है। वहीं महिलाओं में डायबिटीज का असर प्रेग्‍नेंसी पर भी देखने को मिलता है। 
  • इसके अलावा अगर माँ डायबिटीज की बीमारी से परेशान है, तो इसका नुकसान उनके बच्‍चे को भी उठाना पड़ सकता है।

गर्भवती महिलाओं में टाइप 1 डायबिटीज के क्या लक्षणा नज़र आते है ?

  • असामान्य प्यास का लगना। 
  • लगातार पेशाब का आना। 
  • पेशाब में शुगर की मात्रा का बढ़ना। 
  • थकान या उल्टी की समस्या। 
  • धुंधली दृष्टि की समस्या।
  • योनि में संक्रमण का भय। 
  • मूत्राशय और त्वचा में संक्रमण की समस्या का सामना करना।

अगर आपमें भी गर्भावस्था के दौरान टाइप 1 डायबिटीज के इस तरह के लक्षण नज़र आए या किसी भी तरह की समस्या नज़र आए तो इससे बचाव के लिए आपको बेस्ट गायनोलॉजिस्ट के संपर्क में आना चाहिए। 

प्रेग्नेंसी के दौरान डायबिटीज से ग्रस्त महिलाएं किन बातों का रखें ध्यान !

  • अगर ​डायबिटीज से ग्रस्त महिलाओं की डिलीवरी होती है, तो उन्हे जन्‍म के समय बच्चे के अधिक वजन के होने पर खास ध्यान रखना चाहिए। 
  • टाइप 1 डायबिटीज से ग्रस्‍त मांओं के बच्‍चों में जन्‍मजात बीमारियां या विकार होने का खतरा ज्‍यादा रहता है। हार्ट डिजीज, हाथ-पैरों में विकलांगता और रीढ़ की हड्डी में कोई विकार हो सकता है। इसके अतिरिक्‍त शिशु के विकास और नसों से संबंधित कई समस्‍या भी आ सकती है।
  • डायबिटीक मां के शिशु में हाइपोग्लाइसीमिया या लो ब्‍लड ग्‍लूकोज भी हो सकता है। जन्‍म से पहले ब्‍लड शुगर को कंट्रोल करने के लिए प्रयास करने की वजह से ऐसा हो सकता है। इसमें बच्‍चे का ब्‍लड शुगर तेजी से घटता है और ब्रेन डैमेज होने जैसी जटिलताएं आ सकती है।
  • डायबिटीज से ग्रस्‍त मां के नवजात शिशु में ‘रेस्पिरेट्री डिस्‍ट्रस सिंड्रोम’ (सांस लेने में तकलीफ का सामना करना) की समस्या हो सकती है। डायबिटीज भ्रूण के फेफड़ों को प्रभावित कर सकता है और फेफड़ों के विकास को धीमा कर सकता है। इससे शिशु को रेस्पिरेट्री डिस्‍ट्रेस सिंड्रोम हो सकता है। 

अगर आप अपनी गर्भावस्था की अवधि पूरी करने के बाद पेनलेस नार्मल डिलीवरी की चाहत रखती है तो इसके लिए आपको डायबिटीज के शुरुआती लक्षणों को जानकर इसका इलाज जरूर करवाना चाहिए।

टाइप 1 डायबिटीज से ग्रस्त महिलाएं कैसे रखें अपने खाने का खास ध्यान ?

  • हर दिन लगातार मात्रा में भोजन करने और निर्देशानुसार इंसुलिन लेने से रक्त शर्करा के स्तर में काफी सुधार हो सकता है। यह मधुमेह से संबंधित जटिलताओं, जैसे कोरोनरी धमनी रोग, गुर्दे और नेत्र रोग, और तंत्रिका क्षति के जोखिम को भी कम कर सकता है। 
  • इसके अलावा, ये उपाय शरीर के वजन प्रबंधन पर भी प्रभाव डालते है।
  • हाई शुगर और तली भुनी चीजों का सेवन करने से आपको बचना चाहिए। 
  • प्रयाप्त मात्रा में आपको सब्जियों और फलों का सेवन करना चाहिए।

सुझाव :

टाइप 1 डायबिटीज से ग्रस्त गर्भवती महिलाओं को लुधियाना गैस्ट्रो एन्ड गयने सेंटर का चयन करना चाहिए। और इस दौरान उन्हें हर तरह की समस्या से बचाव के लिए डॉक्टर के संपर्क में आना चाहिए।

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गर्भवती महिला के लिए कैसे जरूरी है डबल मार्कर टेस्ट (Double Marker Test), जानिए क्या है इसकी प्रक्रिया, परिणाम व लागत

गर्भावस्था के दौरान मां और बच्चे के बेहतर भविष्य और स्वास्थ्य को देखते हुए कई प्रकार के मेडिकल टेस्ट का सहारा लिया जाता है। वहीं इन मेडिकल टेस्ट को दो वर्गों में बांटा जाता है। पहले वर्ग में वो सभी टेस्ट आते है, जो जच्चे और बच्चे की सेहत के लिहाज से बेहद जरूरी माने गए है। 

वहीं, दूसरे वर्ग में उन टेस्ट को शामिल किया गया है, जिन्हें डॉक्टर भविष्य में आने वाली किसी परेशानी की आशंका के मद्देनजर कराने की सलाह देते है और डबल मार्कर टेस्ट भी इसी लिए ही करवाए जाते है, तो आज के लेख में भी हम इस टेस्ट के बारे में तमाम जानकारी आपके साथ सांझी करेंगे ;

क्या है डबल मार्कर टेस्ट (Double Marker Test) ?

  • डबल मार्कर टेस्ट की बात करें, तो यह गर्भधारण की पहली तिमाही पर किया जाने वाला रक्त परीक्षण है। खास यह है कि डबल मार्कर टेस्ट नॉन-इनवेसिव स्क्रीनिंग यानि की बिना किसी कट मार्क के किया जाने वाला परीक्षण है। 
  • वहीं इस टेस्ट के जरिए डाउनग्रेड सिंड्रोम, एडवर्ड सिंड्रोम और पटाउ सिंड्रोम जैसे क्रोमोसोम (गुणसूत्र) का पता लगाया जाता है। क्रोमोसोम में किसी प्रकार की कमी होने पर भ्रूण के विकास में बाधा आ सकती है या फिर जन्म के बाद भविष्य में शिशु को किसी प्रकार की स्वास्थ्य समस्या का सामना करना पड़ सकता है। 
  • वहीं कई सारे जीन के समावेश को क्रोमोसोम यानी गुणसूत्र के नाम से भी जाना जाता है।

यदि आप डबल मार्कर टेस्ट करवाने के बारे में और विस्तार से जानना चाहते है तो इसके लिए आपको बेस्ट गायनोलॉजिस्ट डॉक्टर का चयन करना चाहिए।

किन्हे होती है डबल मार्कर टेस्ट की जरूरत ?

  • गर्भवती महिलाएं जो एक विशेष प्रकार के खतरे के अंतर्गत आती है, उन्हें पहले ट्राइमेस्टर में प्रेग्नेंसी डबल मार्कर टेस्ट से होकर गुजरना पड़ सकता है। 
  • इसके अलावा जिन महिलाओं में निम्न बातें नज़र आए उसके लिए उन्हें डबल मार्कर टेस्ट को जरूर कराना चाहिए, जैसे –
  • अगर कोई महिला 35 वर्ष या इससे अधिक उम्र के बाद गर्भवती हुई है, तो उन्हे इस टेस्ट का चयन करना चाहिए। 
  • पिछला शिशु जो गुणसूत्रीय समस्या के साथ पैदा हुआ हो। 
  • अनुवांशिक दोष भी आपको इस टेस्ट को करवाने की तरफ लें जा सकते है।  
  • टाइप-1 डायबिटीज से संबंधित इंसुलिन की समस्या का सामना कर रहीं महिलाएं को भी इस टेस्ट का चयन करना चाहिए।
  • बहुत सी महिलाओं के मन में ये बात बैठी हुई है की डबल मार्कर टेस्ट में काफी पीड़ा का सामना करना पड़ सकता है जिसके चलते वो इस टेस्ट को करवाने से मना कर देती है लेकिन आपको बता दें की ये टेस्ट पेनलेस टेस्ट की कैटेगरी में शामिल है।

डबल मार्कर टेस्ट की प्रक्रिया क्या है ?

  • यह एक ऐसा ब्लड टेस्ट है, जिसे गर्भावस्था के दौरान होने वाले अल्ट्रासाउंड के साथ किया जाता है। 
  • इस टेस्ट की सहायता से चिकित्सक गर्भवती महिला के खून की जांच करके उसमें उपस्थित हार्मोन और प्रोटीन की जांच करते है। 
  • बता दें कि इस जांच में जिस हार्मोन की जांच की जाती है, उसे फ्री बीटा एचसीजी के नाम से संबोधित किया जाता है। 
  • वहीं, जांच में शामिल किए जाने वाले प्रोटीन की बात की जाए, तो इस टेस्ट के दौरान ग्लाइकोप्रोटीन और पीएपीपी-ए (प्रेगनेंसी एसोसिएटेड प्लाज्मा प्रोटीन) का परीक्षण किया जाता है।

डबल मार्कर टेस्ट की लागत क्या है ?

  • इसकी शुरुआती लागत की बात करें तो ये 2,500 से लेकर 3,500 के आस-पास आती है। 
  • वहीं इसकी लागत इस बात पर भी निर्भर करती है कि आप कहाँ रहते है और कौन-से हॉस्पिटल का चयन करते है।

डबल मार्कर टेस्ट के क्या परिणाम है ?

  • डबल मार्कर टेस्ट के परिणाम भविष्य में होने वाले डाउन सिंड्रोम से संबंधित गंभीर जोखिमों को दर्शाते है। इन्हें कुछ इस तरह से समझा जा सकता है, जैसे अगर की गई जांच में फ्री बीटा एचसीजी की मात्रा सामान्य सीमा से अधिक पाई जाती है, तो इसे पॉजिटिव मार्कर माना जाता है। इसका मतलब यह हुआ कि गर्भवती में डाउन सिंड्रोम होने की आशंका अधिक हैं। 
  • वहीं, दूसरी स्थिति में पीएपीपी-ए की मात्रा सामान्य से कम मापी जाती है, तो यह स्थिति भी डाउन सिंड्रोम के लिए पॉजिटिव परिणाम के तौर पर देखी जाती है।

सुझाव :

आप चाहे तो डबल मार्कर टेस्ट की जाँच को लुधियाना गैस्ट्रो एन्ड गयने सेंटर से भी करवा सकते है। 

निष्कर्ष :

डबल मार्कर टेस्ट को करवाना हर गर्भवती महिला के लिए बहुत जरूरी है, वहीं इस जाँच को डॉक्टर के सलाह पर ही करवाए, और खुद की मर्ज़ी से ऐसी अवस्था में इस जाँच का चयन आपको नहीं करना चाहिए।

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एंडोस्कोपी कराने के क्या है – कारण, तरीके, फायदे और नुकसान ?

एंडोस्कोपी आपके शरीर के आंतरिक अंगों की अच्छे से जाँच करके आपकी बीमारी के बारे में पता करती है और साथ ही आपके परेशानी का हल भी करती है पर क्या है आप जानते है की एंडोस्कोपी के फायदे के साथ इसके कुछ नुकसान भी है। इसके अलावा एंडोस्कोपी को किन कारणों से करवाया जाता है, इसके बारे में चर्चा करेंगे ;

क्या है एंडोस्कोपी ?

  • एंडोस्कोपी जिसका खासतौर पर अर्थ होता है चिकित्सीय कारण और एंडोस्कोप की मदद से शरीर के अन्दर देखना। एंडोस्कोप एक ऐसा उपकरण है, जिसका प्रयोग शरीर के खोखले अंग अथवा छिद्रों के अन्दर जाँच करने के लिए किया जाता है।
  • शरीर के आंतरिक अंगों और उतकों को विस्तार से देखने के लिए शरीर में एक लंबा और पतला ट्यूब सीधे प्रवेश कराया जाता है, इस प्रक्रिया को एंडोस्कोपी कहते है। इस प्रक्रिया से शरीर में चीरा लगाए बिना शरीर के अंगों में उत्पन्न हो रही बीमारियों और समस्याओं का पता लगाया जाता है। 
  • एंडोस्कोपी एक पतला और लचीला ट्यूब होता है जिसके ऊपर कैमरा लगा होता है। 
  • इस उपकरण को मरीज के मुंह और गले से गुजारकर भोजन नली में प्रवेश कराया जाता है। 

अगर आपको अपने शरीर के आंतरिक अंगों की जाँच को करवाना है तो इसके लिए आप लुधियाना में गैस्ट्रो डॉक्टर का चयन भी कर सकते है।

एंडोस्कोपी का चयन क्यों किया जाता है ?

  • पेट दर्द के कारणों का पता लगाने के लिए।
  • अल्सर, गैस्ट्रिटिस और कुछ निगलने में कठिनाई होने पर।
  • पाचन तंत्र में ब्लीडिंग होने पर।
  • गंभीर रूप से डायरिया और कब्ज होने पर।
  • कोलन में पॉलिप्स या उभार हो जाने पर।
  • पेट के अल्सर, पित्ताशय की पथरी और ट्यूमर को निकालने के लिए।
  • पैन्क्रियाटिटिस और पेट में सूजन होने पर।
  • अल्सरेटिव कोलाइटिस के निदान के लिए।
  • योनि से असामान्य रूप से ब्लीडिंग होने पर।
  • पेशाब में खून आने पर।
  • पाचन तंत्र से जुड़ी बीमारियां होने पर।
  • हार्निया के निदान के लिए।
  • संक्रमण होने पर।

एंडोस्कोपी किन तरीकों से किया जाता है !

  • डॉक्टर उस मॉनीटर पर मरीज के सांस की गति, ब्लड प्रेशर और ह्रदय गति की निगरानी करते है। इसके बाद डॉक्टर मरीज को दवा देते है। 
  • यह दवा बांह की नस में दी जाती है जो एंडोस्कोपी के दौरान मरीज को दर्द से राहत दिलवाती है।
  • इसके बाद डॉक्टर मरीज के मुंह में एनेस्थेटिक स्प्रे छिड़कते हैं। यह दवा गले को सुन्न कर देती है और इससे लंबे समय तक एक लचीला ट्यूब या एंडोस्कोप गले में प्रवेश कराये रखने में मदद मिलती है। 
  • मुंह को खुला रखने के लिए मरीज के मुंह में एक प्लास्टिक माउथ गार्ड पहना दिया जाता है। इसके बाद एंडोस्कोप को गले के अंदर डाला जाता है और डॉक्टर मरीज को गले के नीचे एंडोस्कोप को खिसकाने के लिए कहते है। इस दौरान मरीज को गले में हल्का दबाव महसूस होता है लेकिन उसे दर्द नहीं होता है।

यदि आपको बड़ी आंत में किसी तरह की परेशानी है तो इससे बचाव के लिए आपको लुधियाना में कोलोनोस्कोपी का चयन करना चाहिए।

एंडोस्कोपी के क्या फायदे है ?

  • एंडोस्कोपी कराने का सबसे बड़ा फायदा यह है कि अन्य टेस्ट के बजाय यह कम आक्रामक होता है।
  • यह टेस्ट कराने के लिए कम से कम तैयारी की जरूरत पड़ती है और समय भी कम लगता है।
  • हालांकि इस एंडोस्कोपी टेस्ट कराने के अंतिम रात के बाद कुछ खाना मना होता है जिससे पेट खाली रहता है और रोग का पता सही तरीके से चल पाता है।

एंडोस्कोपी टेस्ट के नुकसान क्या है ?

  • एंडोस्कोपी के बाद मरीज के शरीर में ऐंठन और शरीर में सूजन हो सकती है।
  • एनेस्थेसिया दिए जाने के कारण मरीज का गला कई घंटों तक सुन्न रह सकता है।
  • परीक्षण वाले स्थान पर संक्रमण होने का खतरा बना रहता है।
  • जिस जगह पर एंडोस्कोपी की जाती है वहां लगातार दर्द बना रह सकता है।
  • एंडोस्कोपी कराने के बाद मरीज को आंतरिक ब्लीडिंग भी हो सकती है।
  • मरीज के मल का रंग अधिक गहरा हो सकता है आदि।

एंडोस्कोपी की जाँच के लिए बेस्ट सेंटर !

आप चाहे तो एंडोस्कोपी की जाँच लुधियाना गैस्ट्रो एवं गयने सेंटर से भी करवा सकते है।

निष्कर्ष :

शरीर की आंतरिक समस्या के बारे में जानने के लिए आप समय-समय पर एंडोस्कोपी की जाँच को करवाते रहें ताकि आपको किसी भी तरह की समस्या का सामना न करने पड़े।

 

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पेट, या लीवर रोग में कैसे सहायक होंगे गैस्ट्रोएंटरोलॉजी डॉक्टर !

पेट, या लीवर रोग की समस्या का सामना करना कोई बड़ी बात नहीं है, इस प्रदूषण भरे वातावरण में और लोगों के द्वारा बरती गई लापरवाही की वजह से। वहीं पेट या लिवर संबंधी समस्या क्या है, और इसके लिए मरीज़ को किस तरह के हॉस्पिटल या सेंटर का चयन करना चाहिए और पेट संबंधी समस्या को ठीक करने में गैस्ट्रोएंटरोलॉजी का क्या सहयोग है इसके बारे में हम निम्न में चर्चा करेंगे ;

कौन होते है गैस्ट्रोएंटरोलॉजी डॉक्टर ?

  • गैस्ट्रोएंटरोलॉजी चिकित्सा का एक क्षेत्र है जो पाचन तंत्र, या जठरांत्र संबंधी मार्ग और यकृत के स्वास्थ्य पर केंद्रित है। गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट चिड़चिड़ा आंत्र सिंड्रोम से लेकर हेपेटाइटिस-सी तक हर चीज का इलाज कर सकते है।
  • गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट भी एक डॉक्टर होते है। इनमें पेट, आंतों, कोलोन, अग्न्याशय, अन्नप्रणाली, पित्ताशय, पित्त नलिकाओं और लिवर के विकार शामिल होते है। यद्यपि गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल अंगों से संबंधित अधिकांश समस्याओं का इलाज करने के लिए उपयुक्त माने जाते है।

यदि आपको पाचन तंत्र, या जठरांत्र संबंधी समस्याओं का इलाज करवाना है, तो इसके लिए आपको लुधियाना में गैस्ट्रो डॉक्टर का चयन करना चाहिए।

गैस्ट्रोएंटरोलॉजी डॉक्टर का काम क्या-क्या है ?

  • डॉक्टर चाहे किसी भी बीमारी से जुड़े हुए क्यों न हो उनका पहला काम अपने मरीजों से मिलना और उनका आकलन करना होता है।
  • कोलोन और पाचन तंत्र के भीतर देखने के लिए कॉलोनोस्कोपी और एंडोस्कोपी करना भी उनका एक काम है।
  • एक्स-रे, एमआरआई, सीटी स्कैन और अल्ट्रासाउंड का उपयोग करके परीक्षण करना।
  • सर्जरी के लिए मरीजों को रेफर करना और सर्जरी के बाद उनका इलाज जारी रखना।
  • इरिटेबल आंत्र सिंड्रोम, कोलाइटिस, गैस्ट्रिटिस, बवासीर, क्रोहन रोग, लैक्टोज इनटोलरेंस, हार्टबर्न, गैस्ट्रोएसोफेजियल रिफ्लक्स डिसीज, अल्सर, सीलिएक डिसीज, पित्ताशय की बीमारी और कुछ कैंसर जैसी स्थितियों के लिए रोगियों का इलाज इनके द्वारा किया जाता है।
  • चिकित्सा कर्मचारियों के साथ बैठक करना और व्यावसायिक निर्णयों में योगदान देना आदि सब इनके कार्यो में शामिल है।

अगर पेट से जुडी आंतरिक समस्याओं से आप भी ग्रस्त है, तो इसके लिए आपको लुधियाना में कोलोनोस्कोपी से अपनी जाँच को करवाना चाहिए।

पेट या लिवर संबंधी रोग कौन-से है ?

  • पेट में संबंधित रोग की बात करें तो इसमें सिरदर्द, बुखार, एसिडिटी, बदहजमी, चक्कर आना व उल्टी-दस्त आदि से लेकर पीलिया हेपेटाइटस, फैटी लीवर आदि शामिल है। 
  • लिवर संबंधित रोगों की बात करें तो इसमें हेपेटाइटिस-ए, हेपेटाइटिस-बी, हेपेटाइटिस-सी शामिल है। 
  • इसके अलावा लंबे समय तक शराबबंदी के कारण लिवर का ख़राब होना, जिगर में वसा का निर्माण, पहले चरण के स्क्लेरोजिंग चोलैंगाइटिस, लिवर ट्यूमर, पित्त की नली का कैंसर आदि लिवर रोग है।

पेट और लिवर रोग के इलाज के लिए बेस्ट सेंटर !

  • अगर आप पेट या लिवर संबंधित समस्याओं का सामना कर रहें है, तो इससे बचाव के लिए आपको लुधियाना गैट्रो एवं गयने सेंटर के अनुभवी डॉक्टर, “डॉ कार्तिक गोयल” से जरूर मुलाकात करनी चाहिए। और लिवर के गंभीर रोग से निजात पाने के लिए अपने डॉक्टर को अपनी जाँच की रिपोर्ट जरूर दिखाए ताकि वो आपके बीमारी को जानकर आपका इलाज अच्छे से कर सकें।
  • वहीं खास बात इस सेंटर की ये है, की यहाँ पर मरीज का इलाज आधुनिक उपकरणों की मदद से किया जाता है, और इन उपकरणों से इलाज अनुभवी डॉक्टर ही करते है।

सुझाव :

  • यदि आप पेट या लिवर संबंधी समस्या का सामना कर रहें है तो इसके लिए आपको उपरोक्त सेंटर का चयन करना चाहिए और साथ ही आपको अपने खान-पान का भी खास ध्यान रखना चाहिए, जैसे पेट से जुड़े विकार में आपको तली, भुनी, ज्यादा चटपटी चीजे और खास कर बाहर की चीजों को खाने से परहेज करना चाहिए। 
  • वहीं लिवर के विकार में आपको शराब या अन्य ऐसी नशीली चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए जिससे आपका लिवर ख़राब हो।
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डिलीवरी के बाद कैसी डाइट लेने से जच्चे और बच्चे में आएगी तंदरुस्ती ?

अकसर डिलीवरी के बाद हर महिला का एक सवाल होता है की वो ऐसा क्या खाएं की उनके साथ उनका बच्चा भी सेहतमंद रहें, तो अगर आपका भी इसी से मिलता जुलता सवाल है तो इस सवाल का जवाब हम आज के लेख में प्रस्तुत करेंगे ;

डिलीवरी के बाद कैसे रखें खुद का और बच्चे का ध्यान ?

  • डिलीवरी के कुछ दिन बाद आपको अपने बच्चे को बदलते मौसम से बचाना चाहिए और बच्चा अगर ठंड के मौसम में हुआ है, तो उसको अच्छे से गर्म कपडे डाले और गर्मी के रुत में हुए बच्चे को लू से बचाकर रखना चाहिए। 
  • बच्चे को बेवक़्त न नहलाए बल्कि बच्चा जबतक एक महीने का न हो जाए, तब तक उसे नेहलाने की बजाए हल्के गर्म पानी में सूती के कपडे को भिगोकर उसका मुँह हाथ अच्छे से साफ़ करें और खुद भी बेवक़्त नहाने से बचें। 

डिलीवरी के बाद जच्चे और बच्चे को और किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, इसके बारे में जानने के लिए आप गायनोलॉजिस्ट डॉक्टर का चयन जरूर करें।

डिलीवरी के बाद जच्चे की डाइट में किन चीजों को करें शामिल ?

  • डिलीवरी के बाद एक महिला या बच्चे की माँ को अपनी डाइट में लहसुन, हरी पत्तेदार सब्जियां, दलिया जरूर खाना चाहिए। क्युकि इससे ब्रेस्‍ट मिल्‍क ज्‍यादा बनने में सहायता मिलती है।
  • आप दिन में एक बार हरी पत्तेदार सब्‍जी और एक बार दलिया खाएं। इसके अलावा गाजर, ब्राउन राइस, तिल और तुलसी भी लें और हल्‍का भोजन करें। भारी भोजन करने से बचें और दूध, दही और सब्जियां सही मात्रा में लें।
  • डिलीवरी के बाद आपको अंडे का भी सेवन करना चाहिए, क्युकी अंडे में बहुत ज्यादा प्रोटीन होता है जो आपके मांसपेशियों में हो रहें दर्द को कम करने में काफी सहायक माना जाता है। वहीं अगर आप शाकाहारी है तो ऐसे में आप दूध से बने प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल भी कर सकती है। 
  • मेथीदाना भी डिलीवरी के बाद इस्तेमाल करने से काफी फ़ायदा मिलता है, क्युकि इसमें प्रचुर मात्रा में कैल्शियम, आयरन, विटामिन और मिनरल्स मौजूद होते है, जो आपके ब्रेस्ट मिल्क को बढ़ाते है और आपकी सेहत का भी काफी अच्छे से ध्यान रखते है, अगर आप चाहे तो मेथी के लड्डू बनाकर डिलीवरी के बाद कुछ दिन तक खाएं इससे आपको फ़ायदा मिलेगा। 
  • बादाम, ओट्स, घी, खजूर का सेवन भी आप कर सकती है, जिससे डिलीवरी के बाद आई आपके अंदर कमजोरी को ठीक किया जा सकता है।

डिलीवरी के बाद महिलाओं को क्या नहीं खाना चाहिए ?

  • वैसे पेनलेस नार्मल डिलीवरी होने पर महिलाओं को खानपान में ज्‍यादा परहेज बरतने की जरूरत तो नहीं होती है। लेकिन फिर भी आपको मसालेदार चीजें कम खाना है और साथ ही कब्‍ज एवं खांसी पैदा करने वाले पदार्थों से भी दूर रहें।
  • वहीं अगर आपकी डिलीवरी सी-सेक्‍शन से हुई है, तो डॉक्‍टर आपको शुरुआती दिनों में हल्‍का भोजन करने की सलाह दे सकती है। 
  • और आप इस समय कब्‍ज और खांसी करने वाली चीजें तो बिलकुल न खाएं। ऐसा कोई काम न करें जिससे आंखों पर प्रेशर पड़ता हो। अगर आपको सिजेरियन डिलीवरी के बाद कब्‍ज है या आपको अक्‍सर कब्‍ज रहती है, तो पपीता और दूध लें। 
  • खट्टी चीजें न खाएं और हेल्‍दी चीजों को भी सीमित मात्रा में ही खाएं। 
  • कोई भी चीज न तो बहुत ज्‍यादा खाएं और न ही बहुत कम।

सुझाव :

  • यदि आप और विस्तार से जानना चाहती है की आपको डिलीवरी के बाद और किन बातों का ध्यान रखना चाहिए तो इसके लिए आप लुधियाना गैस्ट्रो एन्ड गयने सेंटर के अनुभवी डॉक्टर के सम्पर्क में आ सकते है। 

निष्कर्ष :

उम्मीद करते है की आपको पता चल गया होगा की डिलीवरी के बाद आपको कैसे अपनी सेहत का ध्यान रखना चाहिए और किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, तो अगर आप खुद के और अपने बच्चे के अच्छी सेहत के लिए चिंतित है तो इसके लिए उपरोक्त बातों का अच्छे से ध्यान रखें।

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यदि नार्मल डिलीवरी की है चाहत तो इन बातों का रखें ध्यान !

गर्भावस्था एक ऐसी स्टेज होती है जिसमे महिलाएं अपने संतान की प्राप्ति के लिए काफी खुश होती है। इसके अलावा डिलीवरी को लेकर महिलाओं के द्वारा बहुत से सवाल पूछे जाते है, जिनमे से सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न नार्मल डिलीवरी को लेकर होता है, इसलिए आज के लेख में हम गर्भावस्था के दौरान संतान की प्राप्ति नार्मल डिलीवरी से कैसे कर सकते है इसके बारे में बात करेंगे ;

क्या है नार्मल डिलीवरी ?

  • पेनलेस नार्मल डिलीवरी एक वह प्रक्रिया है जिसमें शिशु का जन्म प्राकृतिक तरीके से महिला के वजाइना से होता है। इसमें किसी तरह की कोई चीरफाड़ की जरूरत नहीं पड़ती है। प्रेगनेंसी के दौरान किसी तरह की परेशानी न होने पर महिला को नार्मल डिलीवरी होती है। यह शिशु के जन्म का सबसे आम तरीका है।
  • नाॅर्मल डिलीवरी के दौरान आपकी ग्रीवा पतली होकर खुलती है। आपका गर्भाशय संकुचित होता है, ताकि शिशु प्रसव नलिका में नीचे खिसक सके और योनि के जरिये जन्म ले सके।
  • शिशु का जन्म नाॅर्मल डिलीवरी से ही कराया जाता है, मगर यदि आपकी गर्भावस्था या प्रसव के दौरान जटिलताएं हो तो सिजेरियन डिलीवरी करवाने की जरुरत पड़ सकती है।

नार्मल डिलीवरी करवाने के लिए किन बातों का ध्यान रखें ?

  • डिलीवरी से पहले अच्छी देखभाल रखें और ऐसी डाॅक्टर का चयन करें, जिनके साथ आप सहज महसूस कर सके।
  • पौष्टिक (हरी सब्जियां, अंडा, जूस) आहार खाने पर खास ध्यान रखें और गैर सेहतमंद भोजनों से बचें साथ ही कैफीन के सेवन को कम करें।
  • गर्भावस्था में कोशिश करें कि आपका वजन स्वस्थ रहें।
  • सक्रिय एवं क्रियाशील रहें, उचित व्यायाम से अपनी ताकत बढ़ाएं। श्रोणि क्षेत्र की मांसपेशियों को मजबूत करने के लिए व्यायाम करें।
  • सुनिश्चित करें कि आप पर्याप्त नींद लें और आराम करें। आप योग स्ट्रेचिंग और गहन श्वसन व्यायाम भी आजमा सकती है।
  • डिलीवरी के समय परिवार के साथ जरूर रहें। 
  • तनाव से दूर रहें। 
  • उठते और बैठते समय आपको खास ध्यान रखना चाहिए। 
  • किसी भी तरह की बात का चिंतन न करें।
  • शरीर के निचले हिस्से की मालिश करें। 
  • पेरेनियल मालिश करें और इसमें आप बादाम या नारियल का तेल ले सकती है मालिश करने के लिए। 

नार्मल डिलीवरी के लिए और किन बातों का ध्यान रखना चाहिए इसके बारे में जानने के लिए आपको बेस्ट गायनोलॉजिस्ट डॉक्टर का चयन करना चाहिए।

नार्मल डिलीवरी के लिए किन चीजों का सेवन न करें !

कच्चे अंडे, कच्चा पपीता, कच्ची अंकुरित चीजे, शराब, सिगरेट, कैफीन, मछली, कच्चा मांस, घर पर बनी आइसक्रीम, जंक फ़ूड, फ़ास्ट फ़ूड, ज्यादा तेल व मसालेदार आदि चीजों से आपको परहेज करना चाहिए।

नार्मल डिलीवरी होने के संकेत क्या नज़र आते है ! 

  • इसमें आपको पहला संकेत तो ये नज़र आएगा जैसे आपका बच्चा नीचे की तरफ़ आ रहा हो। 
  • बार-बार बाथरूम जाने की ज़रूरत भी आपको महसूस हो सकती है। 
  • जैसे ही आपका बच्चा नीचे की तरफ आएगा वैसे ही आपको लोअर बैक में पैन होना शुरू हो जाएगा। 
  • बच्चे के सिर की वजह से वेजाइनल पर प्रेशर पड़ने लगता है और इससे म्यूकस प्लग निकल जाता है, जिससे भारी मात्रा में वेजाइनल डिस्चार्ज होने लगता है, ऐसा होने का मतलब बिल्कुल साफ़ है की आपके डिलीवरी का समय आ चुका है, वहीं इस डिस्चार्ज की बात करें तो यह पिंक, सफ़ेद या फिर थोड़ा-सा खून से सना हो सकता है। 
  • वॉटर ब्रेक होना मतलब लेबर आने और नार्मल डिलीवरी होने का साइन है, वॉटर बैग का ब्रेक होना मतलब एम्नियोटिक झिल्ली का फट जाना, जिसका मतलब साफ़ है कि अब लेबर शुरू हो चुका है। और नार्मल डिलीवरी किसी भी समय हो सकती है।

नार्मल डिलीवरी के लिए बेस्ट हॉस्पिटल या सेंटर !

यदि आप नार्मल डिलीवरी करवाना चाहते है, तो इसके लिए आप लुधियाना गैस्ट्रो एन्ड गयने सेंटर से जरूर संपर्क करें।

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पेट में सुई जैसी चुभन किन बीमारियों का है संकेत !

पेट में सुई की तरह दर्द को अक्सर लोगों के द्वारा नजरअंदाज किया जाता है। लेकिन, असल में ये शरीर से जुड़ी कई समस्याओं का संकेत भी हो सकता है। दरअसल, पेट में सुई की तरह दर्द इस बात का भी संकेत है कि पेट की आंतरिक परत में सबकुछ ठीक नहीं है। इसके अलावा ये किडनी और लिवर जैसे अंगों के सही नहीं होने का भी संकेत हो सकता है। तो, आइए जानते है पेट में सुई की तरह दर्द क्यों होता है ;

पेट में सुई जैसी चुभन के क्या कारण है ?

  • पेट में सुई जैसी चुभन भोजन न पचने की वजह से होता है। इसके अलावा पाचन शक्ति कमजोर होने पर पेट में चुभन और दर्द की परेशानी हो सकती है। दरअसल, जब पाचन कमजोर होता है, तो खाने को पचाने में काफी ज्यादा परेशानी खड़ी करता है। ऐसे में व्यक्ति को एसिडिटी, कब्ज, पेट में दर्द, जलन इत्यादि की समस्या होने की संभावना काफी ज्यादा बढ़ जाती है।
  • वायरल संक्रमण की वजह से भी पेट में चुभन की परेशानी हो सकती है। पेट में वायरल इंफेक्शन के कारण चुभन के साथ-साथ जी मिचलाना, पेट में दर्द, डायरिया, सिरदर्द इत्यादि परेशानी होती है। इस तरह के लक्षणों के साथ-साथ मरीजों को शारीरिक रूप से थकान, कमजोरी इत्यादि भी महसूस हो सकती है। 
  • मांसपेशियों में खिंचाव भी पेट में चुभन का कारण है। वहीं इसके कारण पेट में दर्द की परेशानी भी देखी गई है। इस स्थिति में मरीज को पेट की मालिश करने से काफी आराम महसूस होता है। पेट की मांसपेशियों में खिंचाव आने पर मरीज को हिलने-डुलने में भी परेशानी हो सकती है।
  • अपेंडिक्स (आंतों में इन्फेक्शन, कब्ज, पेट में पलने वाले खराब बैक्टीरिया) की समस्या पेट के दाएं निचले हिस्से में होती है। ऐसे में अगर आपके पेट के दाहिने हिस्से में चुभन की परेशानी हो रही है, तो यह अपेंडिक्स की ओर इशारा कर सकता है। इस स्थिति को इग्नोर करने के बजाय तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। ताकि गंभीर स्थितियों से बचा जा सके।
  • पेट में चुभन की शिकायत गॉल ब्लैडर में पथरी की वजह से भी हो सकती है। इस स्थिति में मरीज को पेट के ऊपरी दाहिने हिस्से में दर्द और चुभन की परेशानी महसूस होती है। कभी-कभी यह दर्द काफी तेजी से बढ़ता है। इस परेशानी से ग्रसित मरीजो को पेट में चुभन के साथ-साथ उल्टी, पीलिया और काफी ज्यादा कमजोरी का अनुभव भी होता है। 

किन कारणों से पेट में सुई जैसी चुभन हो रहीं है इसके बारे में जानने के लिए लुधियाना में गैस्ट्रो डॉक्टर का चयन करें।

क्या है पेट में दर्द की समस्या ?

  • पेट में दर्द कई चीजों के कारण हो सकता है, जिनमें अपच, पेट के वायरस, ख़राब खाना, गैस, खाद्य एलर्जी, कब्ज, एंडोमेट्रियोसिस, क्रोहन रोग, सीलिएक रोग, चिड़चिड़ा आंत्र सिंड्रोम और कुछ दवाएं शामिल है।
  • अगर आपके पेट में भी दर्द की समस्या बनी हुई है तो इससे निजात पाने के लिए आप लुधियाना में कोलोनोस्कोपी से भी अपनी जाँच करवा सकते है।

पेट की जाँच व इलाज के लिए बेस्ट हॉस्पिटल या सेंटर !

अगर आप भी पेट में अत्यधिक दर्द और पीड़ा का आभास कर रहें है तो इससे बचाव के लिए आपको लुधियाना गैस्ट्रो एन्ड गयने सेंटर का चयन करना चाहिए। क्युकि कई दफा ऐसा हो जाता है की हमें पेट में दर्द के कारण सर्जरी का सहारा भी लेना पड़ सकता है। 

सारांश :

पेट की समस्या चाहे छोटी हो या बड़ी काफी खतरनाक मानी जाती है, इसलिए जरूरी है की आप अगर इस तरह की समस्या से निजात पाना चाहते है तो इसके लिए समय-समय पर अपने पेट की जाँच को करवाते रहें ताकि आपकी बीमारी ज्यादा न बढ़ सकें। 

वहीं पेट की समस्या आपको गंभीर रोगी बना सकती है इसलिए जरूरी है की पेट की समस्या को कृपया नज़रअंदाज़ न करें।

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आंतों से जुडी बीमारी के संकेतों को जानकर कैसे करें खुद का बचाव

आंत को शरीर में मष्तिष्क के रूप में भी जाना जाता है, वही आंत का हमारे शरीर में बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान होता है क्युकि हमारे द्वारा जो भी खाया जाता है उसे पचाने का काम आंत ही करती है, वही आंतों से जुडी बीमारियां क्या होती है और लक्षणों के माध्यम से कैसे हम अपने आंतों की रक्षा कर सकते ही इसके बारे में आज के लेख में चर्चा करेंगे ;

आंत क्या होते है ?

  • आंत जोकि सामान्यतः दो तरह के होते है, जिसमे पहला प्रकार छोटी आंत का होता है और दूसरा प्रकार बड़ी आंत का होता है। 
  • वही आंत की बात करें तो ये हमारे शरीर में हम जो भी खाते है उन्हें पचाने का काम करती है। 
  • आंत हमारे द्वारा खाए भोजन में से स्‍वस्‍थ और पौष्टिक चीजों को शरीर के अंदर रखती है और विषाक्‍त पदार्थ को बाहर करती है। हलाकि जब आंतों के द्वारा अपना काम ठीक तरह से नहीं किया जाता तो कब्ज समेत कई रोगों का जन्म होने लगता है।
  • आंतों की बात करें तो बड़ी आंत में पानी को अवशोषित किया जाता है जबकि छोटी आंत मिनरल, विटामिन और दूसरे तत्वों का अवशोषण करती है।

आंतों से जुडी बीमारियां कौन-कौन सी होती है ?

  • आंत जोकि सामान्यतः दो तरह के होते है, बड़ी आंत और छोटी आंत,
  • छोटी आंत की बीमारी में शामिल आंतशोथ, कार्बोहाइड्रेट असहिष्णुता, शरीर में आवश्यक एंजाइमों की कमी, नाड़ी और छोटी आंतों की एलर्जी संबंधी बीमारियां, व्हाइपल का रोग और अन्य. अनुचित पोषण या विशिष्ट दवाइयां लेने के कारण, छोटी आंतों में चिपचिपा झिल्ली के अखंडता या जलन के उल्लंघन के कारण उनमें से सभी अपना विकास शुरू करते है। 
  • बड़ी आंत के रोगों में बृहदांत्रशोथ, अल्सर, क्रोहन रोग, डिवर्टक्यूलोसिस और बृहदान्त्र, ट्यूमर और अन्य बीमारियों के अन्य परेशानियां शामिल है।

यदि आप अपनी बड़ी और छोटी आंत के अंदर की बीमारी के बारे में जानना चाहते है तो इसके लिए आप लुधियाना में कोलोनोस्कोपी से अपनी जाँच करवाए।

आंतों की खराबी के क्या संकेत है ?

  • एक महीने या इससे ज्यादा समय तक कब्ज का रहना। 
  • मल त्यागते समय पेट और एनस (गुर्दे) में दर्द का होना। 
  • पेट से ब्लोटिंग और भारीपन का महसूस होना। 
  • बैचेनी, पेट में जलन, दर्द और मरोड़ महसूस करना। 
  • हर दूसरे दिन कब्ज की समस्या का होना और पेट के बीच में दर्द का होना। 
  • मल के साथ खून का आना। 
  • तेजी से वजन का घटना। 
  • मुंह और शरीर से दुर्गंध का आना। 
  • भूख में कमी का महसूस करना।

अगर आप आंत या पेट से जुडी किसी भी तरह की समस्या का सामना कर रहें है तो इससे बचाव के लिए आपको लुधियाना में गैस्ट्रो डॉक्टर का चयन करना चाहिए।

आंतों की बीमारी का इलाज क्या है ?

  • रोजाना व्यायाम करें। 
  • फाइबर युक्त खाद्यपदार्थ का सेवन करें। 
  • पानी की पर्याप्त मात्रा ले और खुद को हाइड्रेट रखें। 
  • विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने की कोशिश करें। 
  • प्रोबायोटिक्स आंतों को स्वास्थ्य रखने में एहम भूमिका निभाते है इसलिए इनकी मात्रा शरीर में बनाए रखने के लिए ज्यादा से ज्यादा डेयरी उत्पादों का सेवन करें।   
  • आराम करें और खुद का ध्यान रखें। 
  • नियमानुसार कुछ न कुछ खाए लेकिन लगातार नहीं।

आंतों की बीमारी के लिए बेस्ट हॉस्पिटल या सेंटर !

आंत में किसी भी तरह की गंभीर बीमारी का होना काफी खतरनाक माना जाता है, क्युकि इससे हमारे शरीर का पाचन क्रिया का सिस्टम जुड़ा होता है इसलिए जरूरी है की इनमे किसी भी तरह की अगर परेशानी आ जाए तो कैसे हम इससे खुद का बचाव कर सकते है वो भी लुधियाना गेस्ट्रो एन्ड गयने सेंटर की मदद से।

निष्कर्ष :

आंतों में किसी भी तरह की बीमारी आने पर जल्द डॉक्टर के संपर्क में आए।

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आंतों में गांठ पड़ने के क्या है लक्षण और इन्हे नज़रअंदाज़ करना कैसे पड़ सकता है भारी ?

आंतों में गांठ का पड़ना काफी खतरनाक समस्या मानी जाती है, क्युकी हमारे आंत का ख़राब होना मतलब की हमारा पूरा शरीर ख़राब होने के कगार पर आ जाता है। वहीं आंतो में गांठ की समस्या से कैसे हम खुद का बचाव कर सकते है, और कौन-से लक्षण हमारी मदद करेंगे आंतों की समस्या को जानने में इसके बारे में आज के आर्टिकल में चर्चा करेंगे, तो शुरुआत करते है आर्टिकल की और जानते है आंतों में समस्या के बारे में ; 

क्या है आंतों में गांठ की समस्या ?

  • खराब आंत आपके स्वास्थ्य को बिगाड़ने का काम करती है और जब आंतों में दिक्कत होने लगे तो आपका संपूर्ण स्वास्थ्य प्रभावित होता है। 
  • वही आंतों में गांठ का पड़ना अपने आप में ही परेशानी वाली बात है और जब ये दिक्कत बढ़ जाती है तो आपका पूरा शरीर खराब होने लगता है। 
  • इसके अलावा आंतों में गांठ की वजह से पेट फूलना, कब्ज, दस्त और पेट में दर्द जैसी परेशानियां आपकी आंतों के बिगड़ने का संकेत है। 
  • हलाकि ऐसा बिल्कुल नहीं कहा जा सकता है कि आपकी आंतों में एकदम से ही खराबी आ सकती है, बल्कि जब आपके आंत में खराबी आती है तो ये समय से पहले ही कुछ न कुछ संकेत देने लग जाते है, जिन्हें नजरअंदाज करना आपके लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है। 

आपके आंत में गांठ की समस्या है या नहीं इसके बारे में जानने के लिए लुधियाना में कोलोनोस्कोपी की मदद ले।

आंतों में गांठ पड़ने के संकेत क्या है ?

आंतों में गांठ पड़ने के संकेतो को आप निम्न माध्यम से आसानी से जान सकते है, जैसे ;

  • जब आपके आंतों में गांठ की समस्या होती है, तो आपका मन बहुत ज्यादा मीठा खाने का करेगा, और मीठे में ब्रेड या फिर बहुत ज्यादा डेरी प्रोडक्ट खाने का मन भी कर सकता है, इसलिए आपको अगर ज्यादा मीठा खाने का दिल करें तो आप जल्द लुधियाना में गैस्ट्रो डॉक्टर का चयन करें। 
  • यदि आपका वजन लगातार बढ़ या फिर घट रहा है तो इसे नज़रअंदाज़ न करें, क्युकि वजन का बढ़ना और घटना भी आपके आंतों में समस्या को उत्पन्न कर सकता है। 
  • कहा जाता है की आपकी आंतों और दिमाग के बीच सीधा संबंध होता है और आंतों को ही शरीर का दूसरा मस्तिष्क भी कहा जाता है। वही अगर आप अच्छा महसूस करना चाहते है, तो कुछ अच्छा खाएं लेकिन जब आपका मूड अपनी पसंदीदा चीज को भी खाने का न करे या फिर आपका मूड हमेशा खराब ही रहे तो ये आंतों में गांठ पड़ने का एक संकेत हो सकता है।
  • जब आपके आंतों में खराबी होगी तो आपको सोचने समझने में परेशानी का सामना करना पड़ सकता वही जब हमारे द्वारा ज्यादा डिप्रेशन या फिर ज्यादा सोचा जाता है तो भी ये समस्या हो सकती है।
  • पेट का सुबह के समय ठीक से साफ़ न होना भी आपमें आंतों में गांठ की समस्या को उत्पन्न कर सकता है। 

तो अगर आपको उपरोक्त में से कोई भी संकेत आपमें नज़र आए तो कृपया इसे नज़रअंदाज़ न करें और समय रहते किसी अनुभवी डॉक्टर का चयन करें।

आंतों में गांठ की समस्या से निजात दिलवाने के लिए बेस्ट हॉस्पिटल या सेंटर !

यदि आप भी आंतों में गांठ की समस्या से काफी परेशान है तो इससे निजात पाने के लिए आपको लुधियाना गैस्ट्रो एन्ड गयने सेंटर का चयन करना चाहिए। इसके अलावा अगर आप शुरुआती दौर में इस समस्या को जान कर इसका इलाज करवाते है तो आपको किसी भी तरह की समस्या का सामना नहीं करना पड़ता।

निष्कर्ष :

आंतों में गांठ की समस्या को कृपया नज़रअंदाज़ न करें बल्कि समय रहते इसके लक्षणों को जान कर इसका इलाज करवाने के बारे में जरूर सोचें।

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महिलाओं को अपने शरीर में होने वाले दिक्कतों को क्यों नहीं करना चाहिए नज़रअंदाज़ ?

महिलाएं जो अक्सर घर के काम-काज में इतना व्यस्त हो जाती है की उन्हें कई दफा अपने शरीर में आए बदलाव का भी ध्यान नहीं रह जाता है जिसके चलते उन्हें आगे चल के काफी परेशानियों का भी सामना करना पड़ सकता है, तो वहीं कुछ महिलाओं को पता ही नहीं होता की उन्हें किस तरह की परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा आज के लेख में हम बात करेंगे की कौन-सी समस्याएं महिलाओं के शरीर में उत्पन्न होती है जिन्हे वे अकसर नज़रअंदाज़ कर देती है ;

महिलाओं के शरीर में बीमारियां कौन-सी हो सकती है ?

निम्न में हम कुछ ऐसी महिलाओं की बीमारियां के बारे में बात करेंगे, जिससे वो अक्सर नज़रअंदाज़ रहती है, जैसे-

  • एनीमिया की समस्या। 
  • पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम या पॉलीसिस्टिक ओवरी डिजीज की समस्या आम-तौर पर तब होती है, जब कोई महिला गर्भवती होने की कोशिश कर रही होती है, और वही ये एक हार्मोनल इंबैलेंस है, जिसका प्रभाव मेटाबोलिक हेल्थ पर पड़ता है। 
  • मेनोपॉज एक महत्वपूर्ण हार्मोनल चेंज है, जो सभी महिलाओं में होता है, इसमें फीमेल हार्मोन यानी एस्ट्रोजन कम हो जाता है। जिससे दिल की बीमारी के खिलाफ इसकी प्रोटेक्टिव एक्टविटी भी कम हो जाती है। 
  • महिलाओं में हड्डियों का स्वास्थ्य यानी बोन हेल्थ 30 के दशक में बिगड़ना शुरू हो जाता है, इसलिए हड्डियों की मजबूती बनाए रखने के लिए पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम के सेवन के साथ-साथ एक्सरसाइज करना जरूरी है। वही डेयरी प्रोडक्ट कैल्शियम का सबसे अच्छा विकल्प माना जाता है, जैसे दूध, दही, पनीर आदि।

अगर आपको अपने शरीर में इस तरह की बीमारियां नज़र आ रहीं है, तो इससे बचाव के लिए आपको बेस्ट गायनोलॉजिस्ट का चयन करना चाहिए।

कौन-सी दिक्कतों को महिलाएं न करें नज़रअंदाज़ !

  • पीरियड्स के दौरान दर्द का होना, तो कुछ महिलाओं को पीरियड्स के दौरान बहुत तेज दर्द होता है, इसे डिसमेनोरिया कहा जाता हैं। यदि इस दर्द की वजह से महिलाएं अपना काम नहीं कर पा रही हैं और इससे उनके जीवन में काफी परेशानियां हो रही है, तो उन्हें इसकी जांच करानी चाहिए। वही इलाज शुरू करने से पहले इसके लिए क्लीनिकल जांच और पेल्विक सोनोग्राफी की आवश्यकता होती है। 
  • दूसरी दिक्कत वेजाइनल इंफेक्शन या वेजाइना के मुख के पास की त्वचा में फोड़े होने के कारण हो सकता है, वही यह समस्या कभी-कभी वेजाइनल डिस्चार्ज या खुजली भी हो सकती है। 
  • कई दफा मूत्र रिसाव की परेशानी के कारण महिलाएं काफी शर्मिंदगी महसूस करती है, यही वजह है की, अधिकांश महिलाओं को मूत्र रिसाव के बारे में खुल कर बात करने में कठिनाई होती है। यह आमतौर पर खांसते या छींकते या एक्सरसाइज करते समय होता है।
  • सेक्स के दौरान ब्लीडिंग या तेज दर्द का होना जिसे महिलाओं के द्वारा अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, जो बाद में चल कर उनके सेहत पर काफी बुरा प्रभाव डालती है।

यदि महिलाएं इन समस्याओं को ध्यान में रखें तो उन्हें आगे चल कर किसी भी तरह की समस्या का सामना नहीं करना पड़ता वही गर्भावस्था के दौरान उनकी पेनलेस नार्मल डिलीवरी भी होती है।

सुझाव :

 इसके अलावा महिलाओं को अपनी समस्या को महिला डॉक्टर के सामने खुल कर बताना चाहिए ताकि उन्हें किसी भी तरह की समस्या का भविष्य में चल कर सामना न करना पड़े।  

निष्कर्ष :

महिलाओं को अपनी समस्या को खुल कर बताने में शर्माना नहीं चाहिए फिर चाहें डॉक्टर महिला हो या पुरुष।

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पेट में सूजन के क्या है लक्षण, कारण और घरेलू उपचार ?

पेट जोकि हमारे समस्त पाचन क्रिया के साथ जुड़ा होता है, अगर इसमें किसी भी तरह की समस्या आ जाए तो हमारे पूरे शरीर की कार्य करने की क्षमता अस्त-व्यस्त हो जाती है। इसके अलावा पेट का सूजन व्यक्ति में किस तरह की समस्या को उत्पन्न करता है, और कैसे इसके लक्षणों को जानकर हम घरेलू उपचार की मदद से पेट में सूजन की समस्या से निजात पा सकते है के बारे में आज के आर्टिकल में चर्चा करेंगे ;

पेट की सूजन क्या है ?

  • पेट की सूजन तब होती है जब पेट का क्षेत्र सामान्य से बड़ा होता है। इसे कभी-कभी एक विकृत पेट या फूला हुआ पेट के रूप में भी जाना जाता है। 
  • फूले हुए पेट के कई संभावित कारण होते हैं और यह एक सामान्य घटना है। अधिकांश लोग विभिन्न कारणों से किसी बिंदु पर सूजन का अनुभव करते है। 
  • इसके अलावा पेट सूजने पर ऐसा महसूस होता है कि पेट फैल गया है और खिंच गया है, जो असहज हो सकता है।

अगर आपके पेट में भी सूजन की समस्या बनी रहती है तो इसके लिए आपको लुधियाना में गैस्ट्रो डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

पेट में सूजन के कारण क्या है ?

  • वजन का बढ़ना या मोटापे की समस्या। 
  • पेट में द्रव का निर्माण होना। 
  • फाइबर में उच्च खाद्य पदार्थ खाने से आंतों में गैस। 
  • संवेदनशील आंत की बीमारी। 
  • आंशिक आंत्र में रुकावट। 
  • गर्भावस्था के कारण आदि।

पेट में सूजन के लक्षण क्या है ?

  • जी मिचलाने की समस्या का सामना करना। 
  • उल्टी होने की समस्या। 
  • भूख में कमी। 
  • सख्त मल का त्यागना। 
  • मल के कलर में बदलाव का होना। 
  • खून की उल्टी का होना आदि।

पेट में सूजन के लिए डॉक्टर के पास कब जाए ?

  • जब आपको भूख नहीं लगती हो। 
  • पुरानी या लगातार कब्ज, दस्त या उल्टी की समस्या। 
  • लगातार सूजन, गैस या सीने में जलन का होना। 
  • आपके मल में खून या बलगम का आना। 

कौन-से घरेलु उपायों की मदद से पेट के सूजन को कम किया जा सकता है ?

  • टहलें, क्योंकि शारीरिक गतिविधि आंतों को अधिक नियमित रूप से स्थानांतरित करने का कारण बन सकती है, जो अतिरिक्त गैस और मल को बाहर निकालने में मदद कर सकती है।  
  • अदरक में अविश्वसनीय गैस निष्कासन गुण होते हैं और ये अपच को बहुत जल्दी ठीक कर सकते है।
  • वही नींबू के रस के छींटे के साथ एक गिलास गर्म पानी पीने से आपको पेट की सूजन से काफी आसानी से छुटकारा मिल सकता है।
  • स्वास्थ्य पूरक के रूप में सेब के सिरके को सुबह-सुबह एक गिलास गर्म पानी में मिलाकर दिन में एक बार पिया जा सकता है।
  • दही को हमेशा हाइपरएसिडिटी के लिए रिफ्रेशिंग फूड माना गया है। दही आंत में खराब बैक्टीरिया को प्रतिस्थापित करते है और पाचन में सुधार करते है।

अगर आपको पेट या आंत से जुडी किसी भी तरह की समस्या है तो आप लुधियाना में कोलोनोस्कोपी से अपनी जाँच करवाए।

पेट की सूजन से निजात दिलवाने के लिए बेस्ट हॉस्पिटल व सेंटर !

यदि आपके पेट या आंत में किसी भी तरह की सूजन आ गई है तो इससे बचाव के लिए आप लुधियाना गेस्ट्रो एन्ड गयने सेंटर का चयन जरूर करें। क्युकी पेट की समस्या को अगर शुरुआती दौर में ही ठीक कर लिया जाए तो गंभीर बीमारी से बचा जा सकता है।

निष्कर्ष :

उम्मीद करते है आपको पता चल गया होगा की अगर पेट में सूजन आ जाए तो आपको किस तरीके से खुद का बचाव करना चाहिए।

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हॉस्पिटल की कौन-सी 5 सुविधाएं आपकी डिलीवरी को बनाएगी सफल!

 गर्भवती होने के बाद जो डिलीवरी का समय होता है वो हर महिला व उसके परिवार जनो के लिए खुशी का मंजर होता है, इसलिए इस खुशी में किसी भी तरह की बाधा न आए इसके लिए आपको महिला के डिलीवरी से पहले ही हॉस्पिटल की जाँच पड़ताल कर लेनी चाहिए और जिन डॉक्टरों ने डिलीवरी करनी है उनके अनुभव के बारे में भी जानकारी हासिल करना चाहिए। इसके अलावा आज के लेख में हम बात करेंगे की डिलीवरी के दौरान इमरजेंसी के वक़्त हर हॉस्पिटल में कौन-सी पांच चीजे होना बहुत ही महत्वपूर्ण है ;

डिलीवरी से कितने दिन पहले हॉस्पिटल की जाँच करना शुरू करें !

  • जब आपको पता चल जाए की महिला के डिलीवरी को कुछ हफ्ते या महीने रह गए है तो आपको हॉस्पिटल की जाँच शुरू कर देनी चाहिए, और आपको इस बात का ख़ास ध्यान रखना है की आप उस ही हॉस्पिटल का चयन करें जहा वह सब सुविधाएं मौजूद हो जो डिलीवरी के बाद जच्चे और बच्चे दोनों को जरूरत होती है।

इसके अलावा डिलीवरी के दौरान या उससे पहले महिला को कोई परेशानी आ जाए तो इसके लिए महिला को बेस्ट गायनोलॉजिस्ट के सम्पर्क में आना चाहिए।

डिलीवरी के लिए हॉस्पिटल या नर्सिंग होम में कौन-सी पांच सुविधाएं मौजूद होनी चाहिए ?

  • अगर आप हॉस्पिटल चुनने जा रहें है, तो इसके लिए सबसे पहले आपको ये देखना चाहिए की हॉस्पिटल में “मेड‍िकल सुव‍िधा” है या नहीं, क्युकी हॉस्‍प‍िटल में सही मेड‍िकल सुव‍िधा ही जच्चे और बच्चे दोनों को सुरक्षित रख सकती है। इसके अलावा हॉस्‍प‍िटल में साफ-सफाई का प्रबंधन अच्छे से है या नहीं, इस बात का भी ध्यान रखें।
  • आपको हॉस्‍प‍िटल चुनने से पहले उस जगह की “मेड‍िकल टीम” के बारे में भी जानना चाह‍िए। क्युकि बहुत से ऐसे अस्‍पताल भी है, जहां डॉक्‍टर उतने ट्रेन्‍ड में नहीं होते, ज‍िसके चलते ड‍िलीवरी के समय कई तरह की समस्‍याओं का सामना महिलाओं को करना पड़ता है।
  • आप ज‍िस हॉस्‍प‍िटल का चयन करें उसमें इस बात का खास ध्यान रखे की वहां पर “एनआईसीयू” की फैस‍िल‍िटी जरूर हो, क्‍योंक‍ि जन्‍म के बाद नवजात श‍िशु में कई तरह की समस्‍याएं होती है, जैसे सांस लेने में द‍िक्‍कत, प्रीमैच्‍योर ड‍िलीवरी के कारण लो बर्थ वेट आद‍ि।
  • ड‍िलीवरी की स्‍थि‍त‍ि में “हॉस्‍प‍िटल की लोकेशन” बहुत ही ज्यादा मायने रखती है, क्‍योंक‍ि ड‍िलीवरी के समय क‍िसी भी वक़्त अस्‍पताल जाने की जरूरत पड़ सकती है। तो ऐसे में अगर अस्‍पताल दूर है तो आपको परेशानी हो सकती है। इसलिए जरूरी है की आप अपने आसपास के नर्स‍िंग होम और हॉस्‍प‍िटल के संपर्क में रहें।
  • हॉस्‍प‍िटल का चयन करने से पहले इस बात का ध्यान रखें की उस हॉस्पिटल में “हाई र‍िस्‍क प्रेगनेंसी” की सुव‍िधा जरूर होनी चाह‍िए। वही हाई र‍िस्‍क प्रेगनेंसी की स्‍थ‍ित‍ि में इमरजेंसी ब्‍लड की जरूरत पड़ सकती है इसके अलावा हाई र‍िस्‍क प्रेगनेंसी के वार्ड नॉर्मल वॉर्ड से बिल्कुल अलग होते है।

अगर आप उपरोक्त बातो का ध्यान रखे है, तो आपकी पेनलेस नार्मल डिलीवरी होने की संभावना और ज्यादा बढ़ जाती है।

सुझाव :

  • यदि आप डिलीवरी के लिए किसी अच्छे सेंटर या हॉस्पिटल का चयन कर रहें है तो इसके लिए आप लुधियाना गेस्ट्रो एन्ड गयने सेंटर का चयन कर सकते है। वही आपको बता दे की इस सेंटर में “हाई र‍िस्‍क प्रेगनेंसी वार्ड” और अन्य “वार्ड” भी मौजूद है।
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पेट का अच्छे से ध्यान रख कर कैसे बच सकते है, पेट की बीमारियों से ?

एक अच्छी पाचन क्रिया व स्वास्थ्य पेट का होना आज के समय में मुश्किल होता जा रहा है क्युकी लोगों के द्वारा स्वास्थ्य खान-पान पर ध्यान नहीं दिया जाता जिस वजह से उनके पेट में कई सारी परेशानियां जन्म ले लेती है, और पेट की अच्छी तरीके से सफाई न करने की वजह से व्यक्ति को कई तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ता है, इसके अलावा पेट में जमी गंदगी की वजह से किस तरह की बीमारी उत्पन्न होती है और इन बीमारियों से कैसे हम खुद का बचाव कर सकते है इसके बारे में हम आज के लेख में बात करेंगे ;

पेट में जमी गंदगी क्या है ?

  • हमारे द्वारा जो खाना-खाया जाता है, और जब ये खाना हमारे मलाशय से नहीं निकल पाता, तो कोलोन में ही जमा हो जाता है।
  • कोलन, जिसे बड़ी आंत के रूप में भी जाना जाता है, वही कोलन पाचन तंत्र का एक हिस्सा है। 
  • आप जो भोजन खाते है वह पेट और छोटी आंत में अवशोषित होता है। कोलन शरीर के पानी को पुनः प्राप्त करने और बचे हुए भोजन में पोषक तत्वों को अवशोषित करने में मदद करता है। 
  • वही यदि आपका पेट ठीक प्रकार से साफ नहीं होता तो, आपको कोलोन इंफेक्शन होने का भी खतरा हो सकता है। 
  • इसके अलावा यह वेस्‍ट मटीरियल यदि लंबे समय तक पेट में पड़ा रहे तो टॉक्‍सिक हो सकता है और आपकी हेल्‍थ को नुकसान पहुंचा सकता है।

आपके पेट में गंदगी के कारण कई तरह की बीमारियां उत्पन्न हुई है या नहीं के बारे में जानने के लिए आपको लुधियाना में कोलोनोस्कोपी से अपनी जाँच जरूर करवानी चाहिए।

कोलन या बड़ी आंत साफ़ रहने के फायदे !

  • आपके समग्र मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार आता है।
  • प्रतिरक्षा प्रणाली के कामकाज में सुधार का आना।
  • पेट के कैंसर के जोखिम को कम करने में मदद मिलती है।

किन तरीको को अपनाकर पेट की गन्दगी को बाहर निकाला जा सकता है ?

  • एल्कोहल, धूम्रपान और कैफीन लेने से बचें।
  • पानी अधिक मात्रा में पिएं। इससे बॉडी हाइड्रेट रहेगी और पेट भी आसानी से साफ होगा।
  • खाना खाने के बाद वॉक जरूर करें।
  • खाना खाते ही लेटने या बैठने से बचे। 
  • रोज सुबह खाली पेट गुनगुना पानी से गंदगी को साफ किया जा सकता है।
  • सेब का जूस पिए। 
  • लेमन को एक ग्लास हल्के गर्म पानी में गर्म करें और उसमे एक चम्मच शहद और एक चम्मच नींबू का रस डाल कर पीने से पेट की समस्या से आराम मिलेगा।
  • दही का सेवन करने से भी पाचन की समस्‍या दुरुस्‍त होती है।

उपरोक्त तरीकों को अपनाने के बाद भी अगर आपके पेट में किसी न किसी तरह की परेशानी ने जन्म ले लिया है तो इससे बचाव के लिए आपको गैस्ट्रो डॉक्टर लुधियाना का चयन करना चाहिए।

पेट की समस्या से निजात पाने के लिए बेस्ट हॉस्पिटल या सेंटर ?

  • अगर आपके पेट की सामान्य समस्या ने किसी भयंकर रोग का रूप धारण कर लिया है तो इससे बचाव के लिए आपको लुधियाना गेस्ट्रो एन्ड गयने सेंटर का चयन करना चाहिए। क्युकी इस हॉस्पिटल में अनुभवी डॉक्टरों के द्वारा आधुनिक उपकरणों की मदद से मरीजों का इलाज किया जाता है। 

निष्कर्ष :

पेट व पाचन क्रिया का हमारे शरीर में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है क्युकि इनके साथ ही हमारे शरीर का पूरा सिस्टम चलता है इसलिए अगर इनमे किसी भी तरह की परेशानी आ जाए तो समय रहते आपको किसी बेहतरीन डॉक्टर का चयन करना चाहिए।

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डिलीवरी के बाद बढ़े हुए वजन को कैसे किया जा सकता है कम ?

डिलीवरी के बाद कैसे वजन को घटाएं इसको लेकर हर महिला के मन में ये सवाल गूंजता रहता है। इसके अलावा अक्सर आपने देखा होगा की जिन महिलाओं की डिलीवरी होती है उनके पेट का निचला हिस्सा लटक जाता है जिसके कारण उन्हें कई बार काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है

तो वही कुछ महिलाएं इस समस्या से निपटने के लिए मालिश का सहारा लेती है, तो कोई डाइटिंग करके अपने आप को इस समस्या से छुटकारा दिलवाना चाहती है पर अब आपको तरह-तरह के उपायों को करने की जरूरत नहीं है बल्कि आपको हम कुछ उपाय बताएंगे जिसका सहारा लेकर आप इस समस्या से खुद का बचाव कर सकती है, तो चलते है और वजन कम करने के आर्टिकल की शुरुआत करते है ;

डिलीवरी के बाद बढ़े हुए वजन को कैसे करें कम ?

  • डिलीवरी के बाद महिलाओं को भूख अधिक लगती है जिस वजह से वह कुछ भी खाना शुरू कर देती हैं। ऐसे में जरूरी है कि भूख लगने पर केवल हेल्दी खाने को प्राथमिकता दे साथ ही क्रैश डाइट का सहारा न लें। वही अगर आप हेल्दी चीजे खाते है तो आप दिन की केवल 500 कैलोरी कम करके एक हफ्ते में आधा किलोग्राम वजन कम कर सकती है।
  • आजकल ज्यादातर महिलाएं आत्म निर्भर (सेल्फ डिपेंडेंट) होने की वजह से वह आफिस के काम में व्यस्त रहती हैं। जिस कारण उन्हें थोड़ी-थोड़ी देर में बच्चे को ब्रेस्टफीड कराने का समय नहीं मिल पाता, जिसका नतीजा वेट गेन या ब्रेस्ट प्रॉब्लम हो सकती है। इसलिए जो महिलाएं डिलीवरी के बाद अपना वेट कम करना चाहती हैं तो उन्हें अपने बच्चे को ब्रेस्टफीड कराना चाहिए। 
  • डिलीवरी के बाद आपको ध्यान रखना है कि आप अधिक कैलोरी वाला भोजन न करें। 
  • दिनभर डिलीवरी के बाद महिलाओं को एक्टिव रहना चाहिए और एक्टिव रहने के लिए आप दिनभर में जितना काम खुद से कर पाएं उतना करें। डिलीवरी के बाद शरीर कमजोर हो जाता है इसलिए आपके शरीर में जितना बल है उसके हिसाब से आप रोजाना 10 से 15 मिनट का वॉक जरूर करें। वही अगर आपको नहीं पता चल रहा है कि वजन कम करने के लिए किन बातो का ध्यान रखना चाहिए तो इसके लिए आपको लुधियाना में गायनेकोलॉजिस्ट का चयन करना चाहिए।

डिलीवरी के बाद किन बातों का रखें ध्यान ?

  • आमतौर पर डिलीवरी के बाद वजन कम करने के लिए खाने के साथ-साथ हेल्दी स्नैक्स को लेते रहें।
  • दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी जरूर पिएं। 
  • अपने खानपान में एडेड शुगर और सोडा कम ले। 
  • फलों के जूस पीने के बजाय सादे फल (Fruits) खाने की कोशिश करें। 
  • तला-भुना खाने से बिल्कुल परहेज करें। तो वही तला-भुना खाने से अगर आपके पेट में दिक्कत हो जाती है तो इसके लिए आपको गैस्ट्रो डॉक्टर लुधियाना से मिलना चाहिए।

सुझाव :

अगर डिलीवरी के बाद आपका वजन भी बहुत ज्यादा बढ़ गया है तो इससे निजात पाने के लिए आपको उपरोक्त बातों को ध्यान में रखना है और इसके लिए आप लुधियाना गैस्ट्रो एन्ड गयने सेंटर से सम्पर्क करें और यहाँ के डॉक्टरों के द्वारा बताए गए वजन कम करने वाले नियमों के बारें में अच्छे से जानकारी हासिल करें।  

 

निष्कर्ष :

उम्मीद करते है कि आपको पता चल गया होगा की कैसे डिलीवरी के बाद आप अपने वजन को कम कर सकते है पर इन उपायों या किसी भी तरह की दवाइयों को प्रयोग में लाने से पहले डॉक्टर से जरूर सलाह ले।

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गैस्ट्रिक समस्या से आप भी है परेशान तो आजमाए इसके सहायक प्रक्रिया व उपचार ?

एक मनुष्य का पूरा शरीर उसके सही पाचन क्रिया पर निर्भर करता है। अगर सोचो पेट या पाचन क्रिया ही न सही हो व्यक्ति की, और उसको गैस्ट्रो, अपच जैसी परेशानी का सामना करना पड़ जाए तो। साथ में ही हम आज के इस लेख में इसी के बारे में जानकारी आपके सामने प्रस्तुत करेंगे की कैसे गैस्ट्रो की समस्या उत्पन होने पर हम इससे कैसे निजात पा सकते है।

गैस्ट्रो की समस्या क्या है ?

गैस्ट्रो की समस्या के बारे में हम निम्न में बात करेंगे ;

गैस्ट्रिक की समस्या आपके ऊपरी पेट में जलन या दर्द से शुरू होता है और कभी-कभी अन्नप्रणाली में भी होता है, जो खाने से या तो खराब या बेहतर हो सकता है। मतली, उल्टी, या खाने के बाद आपके पेट के ऊपरी हिस्से में भरा हुआ महसूस होना, पेट में भारीपन या थकान का होना गैस्ट्रिक दर्द के साथ ही शामिल हैं।

गैस्ट्रिक की समस्या पैदा होने पर कौन-सी बीमारी उत्पन होती है ?

इस समस्या के उत्पन होने पर निम्नलिखित समस्या उत्पन हो सकती है, जैसे;

  • कुछ एक्सपर्ट्स का मानना हैं कि गैस की समस्या बनने पर बहुत सी बीमारियां उत्पन होती है जैसे, बवासीर, वजन का कम होना, कब्ज की समस्या का उत्पन होना, डायरिया और उल्टी या मतली जैसी गंभीर समस्याओं के कुछ कारण बन सकते है इस बीमारी के।

गैस्ट्रो के दौरान यदि बीमारियां उत्पन हो जाए, तो आपको गैस्ट्रो डॉक्टर लुधियाना के संपर्क में आना चाहिए।

गैस्ट्रो की समस्या के क्या कारण है ?

इसके कारणों को जान कर आप इस समस्या का अंदाजा लगा सकते है, जैसे ;

  • अगर आप कुछ भी पीते और चबाते है, तो उस समय हवा को साथ में निगल जाना।
  • गैस बनाने वाले पदार्थों का सेवन करना।
  • आंतों में संक्रमण जैसे पाचन संबंधी समस्याएं।
  • कुछ दवाएं भी गैस्ट्रो के कारण को दर्शाती है।
  • बैक्टीरियल या वायरस संक्रमण।

गैस्ट्रिक समस्याओं की कैसे करे पहचान ?

निम्न तरह के टेस्ट करवा कर ;

  • इमेजिंग परीक्षण करवाना।
  • एंडोस्कोपी से जांच करवाना।
  • रक्त परीक्षण को करवाना।
  • श्वास टेस्ट को करवाना।

यदि आप गैस्ट्रो समस्या की जाँच करवाना चाहती है, वो भी एंडोस्कोपी से तो पंजाब में एंडोस्कोपी की कीमत के बारे में एक बार जरूर से जानना।

उपचार क्या है गैस्ट्रिक बीमारी से निजात पाने का ?

इसका उपचार डॉक्टर मरीज़ के हिसाब से करता है, जिसको हम निम्न में प्रस्तुत कर रहे है ;

  • आंतों की गैस के लिए उपचार की पहली पंक्ति दर्द से राहत देना है। आपका स्वास्थ्य सेवा प्रदाता किसी भी उपचार की पेशकश करने से पहले आपके स्वास्थ्य का विश्लेषण करेगा और आपकी समग्र स्थिति की जांच अच्छे से करेगा।
  • आपका डॉक्टर गैस समस्या के मूल कारण का इलाज करने के लिए एक व्यक्तिगत उपचार योजना तैयार करेगा। जिनमे से पहला है-
  • दवाई का उपयोग करना।
  • अंतर्निहित पाचन समस्या का उपचार करना।
  • जीवनशैली में बदलाव का आना।
  • इसके इलावा यदि उपचार बीच में छोड़ दिया जाए, तो आंतों में गैस की जटिलताओं के कई कारण बन सकते है। इनमें सीने में दर्द, हृदय संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ना और अपच संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ना शामिल है।

आप भी अगर पेट के अंदरूनी समस्या से परेशान है, तो इसका उपचार लुधियाना गैस्ट्रो एन्ड गयने सेंटर से जरूर से शुरू करवाए।

निष्कर्ष :

पेट की समस्या कोई मामूली समस्या नहीं है। इसलिए कोई भी परेशानी यदि आपको उपरोक्त में से आपमें नज़र आए तो कृपया इसे नज़रअंदाज़ न करे।